लोकतंत्र में एक अकेला सब पर भारी नहीं होता
Election Results: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देते हुए जो जो बातें कहीं थी, मौजूदा चुनाव नतीजों का उन बातों से सीधा ताल्लुक है| इंडी एलायंस को चुनौती देते हुए उन्होंने कहा था कि मोदी अकेला सब पर भारी है| दूसरी बात उन्होंने कही थी कि भाजपा अकेले 370 सीटें जीतेगी और एनडीए की सीटें चार सौ पार होंगी|
उनके ये तीनों ही डायलॉग उन पर भारी पड़ गए| देश की जनता ने जवाब दिया कि उसे एक अकेला सब पर भारी वाला तानाशाह नहीं चाहिए, उन्हें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जो सबको साथ लेकर चल सके| लोकतंत्र में जब जब कोई एक सब पर भारी पड़ा है, जनता ने उसके बढ़ते कदम रोक दिए| यही भारत के लोकतंत्र की खासियत है, जो किसी को तानाशाह बनने से रोक देती है|

मोदी ने पिछले दस सालों में लाख अच्छे काम किए होंगे, लेकिन उनकी तानाशाह बनने की प्रवृति लोगों को पसंद नहीं आई| 370 तो बहुत दूर की बात है, भाजपा को 270 के भी लाले पड़ गए हैं|
हालत यह है कि चुनावों के आख़िरी दिनों में एनडीए में लौटे तेलुगु देशम और जेडीयू के कारण ही भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है| ये दोनों बिदक गए तो एनडीए की नहीं, इंडी एलायंस की सरकार बन सकती है| ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल के दावों के विपरीत भारतीय जनता पार्टी की 64 सीटें कम होने को पांच कारणों से परिभाषित किया जा सकता है|

गठबंधन के सहयोगियों की उपेक्षा
2014 और 2019 में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद नरेंद्र मोदी ने समझ लिया था कि भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प बन चुकी है| 1989 से लेकर 2014 तक चली गठबंधन की राजनीति का अंत हो गया है| इसलिए गठबंधन के सहयोगियों से विचार विमर्श बिलकुल बंद हो गया था| प्रधानमंत्री ने उनकी उपेक्षा शुरू कर दी थी|
पहले 2018 में तेलुगू देशम छोड़कर गई थी, फिर 2019 के बाद चार बड़े क्षेत्रीय दल शिवसेना, जेडीयू, अकाली दल और अन्ना द्रमुक छोड़कर गए| नरेंद्र मोदी और अमित शाह को याद रखना चाहिए था कि 2004 में जब द्रमुक जैसे बड़े घटक दल एनडीए छोड़कर गए थे, तो भाजपा को हिन्दी पट्टी में भी नुकसान हो गया था| ये दल एनडीए को छोड़ कर जा रहे थे, तो उन्हें मनाने की कोशिश नहीं की गई| भाजपा ने जब एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाना कबूल कर लिया, तो उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने में क्या दिक्कत थी|
एनडीए के संयोजक भी नीतीश कुमार या किसी अन्य सहयोगी दल के नेता को बनाने के बजाए खुद अमित शाह बन गए| ऐसा लग रहा था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने एनडीए को खत्म करने का मन बना लिया है, क्योंकि 2019 के बाद एनडीए की बैठक ही नहीं बुलाई गई| एक बैठक बुलाई भी गई, तो उनकी बात सुनने के बजाए उन्हें प्रवचन दिया गया|
शिवसेना, जेडीयू को कमजोर करने की नरेंद्र मोदी की रणनीति को भांपते हुए ही इन दोनों दलों ने एनडीए छोड़ा था| नरेंद्र मोदी को एनडीए की याद तब आई, जब जून 2023 में इंडी एलायंस बन रहा था| यह अलग बात है कि अपने अपने प्रदेशों की स्थानीय राजनीति के चलते तेलुगु देशम और जेडीयू एनडीए में वापस आ गए| आज चुनाव नतीजे देखते हैं तो साफ़ है कि इन्हीं दोनों दलों के भरोसे एनडीए सरकार बनने की स्थिति बनी है| लेकिन इनका साथ कब तक टिका रहेगा, यह बहुत कुछ मोदी और अमित शाह के व्यवहार पर निर्भर करेगा।
हिंदुत्व बिखर गया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस विकास के मुद्दे के साथ चुनाव प्रचार की शुरुआत की थी, उसे वह ज्यादा देर बरकरार नहीं रख सके| पहले दौर की कम वोटिंग से घबरा कर उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम करना शुरू कर दिया| जिसके जवाब में इंडी एलायंस के नेताओं ने रणनीति बनाई, तो अखिलेश यादव ने कहा कि अगर वह हिन्दू मुस्लिम करके ध्रुवीकरण की कोशिश शुरू कर रहे हैं, तो हमें भी संविधान और आरक्षण की बात करनी चाहिए, जिस पर इंडी एलायंस में सहमति बनी और फ्रंट फुट पर खेल रहे मोदी और अमित शाह बैकफुट पर आ गए| अखिलेश यादव और राहुल गांधी की इस रणनीति से हिंदुत्व की राजनीति तार तार हो गई, और जिस जातिवाद को तोड़ कर 2014 और 2019 में भाजपा जीती थी, उस पर जातिवाद की राजनीति हावी हो गई|
मोदी और अमित शाह को सफाई देनी पड़ी कि वे न तो संविधान बदलेंगे, न आरक्षण खत्म करेंगे, लेकिन दलितों और ओबीसी को डराने के लिए संघ और भाजपा नेताओं के पुराने बयान भुनाए गए, जिनमें आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही थी| इस प्रचार का दलित समुदाय पर खासकर असर हुआ और उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में बसपा का सारा वोट बैंक इंडी एलायंस की तरफ शिफ्ट हो गया| भाजपा को मायावती को कमजोर करने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा| यूपी में अब दलित वोट बैंक का नया भाजपा विरोधी मसीहा पैदा हो गया है|
सामूहिक नेतृत्व का अभाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा की सामूहिक नेतृत्व वाली पुरानी नीति को किनारे करके सारी पार्टी को दब्बू बना दिया था| प्रदेश अध्यक्षों और प्रदेशों के महामंत्री ही नहीं प्रदेश कार्यकारिणी सदस्यों की नियुक्ति भी दिल्ली से होने लगी थी| यहाँ तक कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी कोई फैसला बिना अमित शाह और प्रधानमंत्री की सलाह लिए नहीं कर रहे थे| संसदीय बोर्ड भी पंगु बन कर रह गया था|
सारी परंपराओं को तोड़कर पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी को संसदीय बोर्ड से बाहर कर दिया गया| पिछले पांच सालों से पार्टी के भीतर नियुक्तियों पर सारा नियन्त्रण मोदी और शाह के हाथ में था| पहले संगठन पर संघ से भेजे गए संगठन महामंत्रियों की पकड़ रहती थी, लेकिन जब से अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने तब से न सिर्फ राष्ट्रीय संगठन महामंत्री, बल्कि राज्यों के संगठन महामंत्री भी किनारे कर दिए गए|
जनसंघ और भाजपा के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल ने संघ में वापस जाने की इच्छा जाहिर की और संघ ने उन्हें वापस बुला लिया| अन्यथा संघटन महामंत्रियों को लग्जरी लाईफ का चस्का लग जाता है और वापस जाने का नाम तक नहीं लेते|
हाल के चुनावों के बीच पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने न जाने किसके कहने पर यह कह दिया कि पार्टी आत्मनिर्भर हो गई है| संघ इससे खफा हुआ और संगठन महामंत्रियों को वापस बुलाने पर विचार कर रहा है| कर्नाटक के संगठन महामंत्री को वापस बुलाने से इसकी शुरुआत हो गई है| यह क्यों नहीं माना जाना चाहिए कि संघ ने इस बार के चुनाव में मन से काम नहीं किया, क्योंकि संघ में व्यक्ति पूजा नहीं होती, जबकि नरेंद्र मोदी ने पिछले दस सालों में अपना कद संघ और भाजपा से बड़ा बना कर पेश किया, जब उन्होंने मोदी की गारंटियां बांटनी शुरू की, तो उसे संघ में ठीक नहीं माना गया|
क्षत्रपों को किनारे लगाना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के क्षत्रप येदियुरप्पा, महाराष्ट्र के क्षत्रप देवेन्द्र फडनवीस, राजस्थान की क्षत्रप वसुंधरा राजे, मध्यप्रदेश के क्षत्रप शिवराज सिंह चौहान और हरियाणा में जातोय समीकरणों के चलते क्षत्रप बन चुके मनोहर लाल खट्टर को उनके राज्यों की राजनीति से दूर करने का खामियाजा भी भुगता है| मध्यप्रदेश को छोड़कर इन सभी राज्यों में भाजपा को कांग्रेस के हाथों मार खानी पड़ी है| महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़ कर उद्धव ठाकरे से उनके पिता की विरासत छीनने में भाजपा पूरी तरह नाकाम रही| शरद पवार की पार्टी तोड़ने का फैसला भी गलत साबित हुआ, उद्धव ठाकरे और शरद पवार को सहानुभूति का लाभ मिला और उसका फायदा कांग्रेस को हुआ|
भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी
भाजपा नेतृत्व को यह बड़ी गलतफहमी हो गई है कि वह अब काडर बेस पार्टी नहीं रही, मास बेस पार्टी बन गई है| इसलिए काडर की कोई जरूरत नहीं रही| 370 खत्म होने और रामजन्म भूमि मन्दिर बनने के बावजूद भाजपा काडर अपने नेता से खफा था। इसका बड़ा कारण यह था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पार्टी संगठन पर हावी होने के बाद संगठन और विचारधारा से जुड़े नेताओं को किनारे कर के बाहरी लोगों को भारी तादाद में टिकट दिए गए, खासकर ब्यूरोक्रेट्स और अन्य पार्टियों से आए दलबदलुओं को नेता बनाकर संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ताओं से उनके लिए काम करने को कहा गया|
जिस काडर ने पीढी दर पीढी विचारधारा के लिए काम करते हुए भाजपा को इस स्थिति तक पहुंचाया था, उन्हें बिलकुल किनारे कर दिया गया था| इस बार ऐसे अनेक कार्यकर्ता और नेता घर बैठ गए। भाजपा को इसका भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications