यूपी से ही निकलेगा देश का जनादेश या बिहार, महाराष्ट्र से आएगा नया संदेश?
Lok Sabha Chunav: लोकसभा चुनाव 2024 के लिए पांच चरणों का मतदान हो चुका है। आने वाले दिनों में शेष दो चरणों का मतदान होना है। उसके बाद देश को एक नई सरकार मिल जाएगी। लेकिन देश में किसकी सरकार बनेगी और किसकी नहीं यह काफी हद तक देश के चार राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल और बिहार की वोटिंग से ही तय होगा।
शायद इसीलिए इन चार राज्यों को बैटल ग्राउंड स्टेट्स भी कहा जाता है। इन राज्यों में भाजपा के सामने अपना पुराना दबदबा कायम रखने की चुनौती है, वही इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दल भाजपा को शिकस्त देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। 210 सीटों वाले बैटल ग्राउंड स्टेट्स को बचाने की बेचैनी दोनों तरफ है।

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की राजनीति एक मिथक भी है और यथार्थ भी। मिथक इसलिए कि वह हिंदू धर्म के तीन बड़े तीर्थ स्थलों का केंद्र है और सबसे बड़ा प्रदेश होने के नाते भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र भी वही बनता है। मुद्दा भले ही कश्मीर या मणिपुर बने लेकिन निर्णायक जनादेश उत्तर प्रदेश से ही आता है। सोमनाथ की यात्रा अयोध्या में आकर ही खत्म होती है और मां गंगा के बुलावे पर मोदी भी बनारस ही जाते हैं। उत्तर प्रदेश का एक यथार्थ यह भी है कि वह जिसे चाहेगा वही देश का प्रधानमंत्री बनेगा या जिसे प्रधानमंत्री बनना हो उसे उत्तर प्रदेश आना ही होगा।
पिछले 2019 के आम चुनाव में प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में 62 सीटें भारतीय जनता पार्टी तथा दो उसके सहयोगी अपना दल को मिली थी। बसपा को 10 सीट, समाजवादी पार्टी को 5 सीट जबकि कांग्रेस ने एकमात्र रायबरेली की सीट पर जीत हासिल की थी। उसके पहले 2014 के चुनाव में भाजपा ने राज्य की 71 सीटें जीती थी। भाजपा ने अबकी चुनाव में 400 पार का नारा दिया है। इस लिहाज से देश के सबसे बड़े प्रदेश में आधिकाधिक जीतने का दावा पार्टी के नेता कर रहे हैं।
लेकिन कहते हैं इतिहास बार-बार लौट कर वहीं आता है जहां से कभी शुरू होता है। 2014 के चुनाव में बेरोजगारी और महंगाई बड़ा मुद्दा था जिसे मोदी ने उठाया था। 2024 में घूम-फिर कर इसी मुद्दे ने उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को प्रभावित किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस ध्रुवीकरण के सहारे भाजपा चुनावी बाजी मारती रही है, अबकी ध्रुवीकरण का कोई नजारा मतदान केद्रों पर नहीं दिखा।
मालूम हो कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने अपने दल से अधिकांश मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था तथा उन्हें जिताकर लखनऊ विधानसभा ले गई थी। इसका असर वहां के लोगों में सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रत्यक्ष पड़ा था। इसे लेकर लोगों में नाराजगी भी थी, तब भारतीय जनता पार्टी और खासकर संघ के लोगों ने इस सूत्र को पकड़ा तथा ध्रुवीकरण को हवा दी।
2014, 2017, 2019 के चुनाव में ध्रुवीकरण सिर चढ़कर बोला भी। लेकिन व्यापक किसान आंदोलन के बाद वहां की परिस्थितियों में बदलाव आया है। खाई पूरी तरह से भले न पट पाई हो लेकिन जो समरसता की जमीन तैयार हुई है, वह मतदान केन्द्रों पर दिखी। प्रधानमंत्री मोदी का रसूख बरकरार है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनाव खामोश चुनाव है। 3 महीने पहले तक जिन सीटों पर बीजेपी की जीत पक्की मानी जा रही थी, अब वहां भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं। राजपूत मतदाताओं की नाराजगी का असर यह रहा कि वे विरोध में सामने नहीं आये लेकिन वोट देने बूथ तक भी नहीं गए। संघ के कार्यकर्ता भी मतदाताओं को बूथ तक ले जाने के लिए उत्साहित नहीं नजर आए।
इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक बनारस को छोड़ दें तो लगभग सारी सीटों पर पेंच फंसा हुआ है। सलेमपुर की सीट पर लोग प्रत्याशी से नाराज हैं तो बलिया सीट पर प्रत्याशी के चयन से। घोसी सीट पर ओमप्रकाश राजभर का बड़बोलापन जीत के आड़े आ रहा है। गाजीपुर, आजमगढ़, लालगंज, चंदौली, मिर्जापुर, मछलीशहर की सीटें हाथ से निकलती हुई दिख रही है। महंगाई बेरोजगारी, पेपर लीक और आवारा पशु की समस्याओं ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदल दी है। इसलिए अधिकांश जानकार यह मान रहे हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 50 से 55 के आसपास ही सीटें मिल पायेंगी।
महाराष्ट्र: महाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें है। पिछले चुनाव में भाजपा 23, शिवसेना 18, एनसीपी 4, एआईएमआईएम 1, अमरावती सीट से निर्दलीय तथा चंद्रपुर की सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। अबकी महाराष्ट्र में सब कुछ गडमगड्ड है। शिवसेना दो भागों में बट चुकी है। एनसीपी के दो फाड़ हो गए हैं। पिछली बार प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी का दल मिलकर चुनाव लड़े थे अबकी दोनों अलग-अलग लड़ रहे हैं। मतदाताओं में उहापोह है। नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता है। धर्मसंकट भी है। नेताओं ने तो पाला बदल लिया। अब कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ है कि वे किधर जाएं।
यही कारण है कि वहां चुनाव का स्थानीयकरण हो गया है। वहां कमोबेश सभी सीटों पर स्थानीय मुद्दों और प्रत्याशियों के चेहरों पर चुनाव लड़ा जा रहा है। नेताओं से नाराजगी इस कदर है कि लोग वोट देने के लिए बूथ तक नहीं जा रहे हैं। पूरे देश में चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा जा रहा है लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा नहीं है। वहां किस प्रत्याशी का रसूख और कौन सा स्थानीय मुद्दा कारगर साबित होगा यह 4 जून को मतगणना में ही पता चल पाएगा। इसीलिए इस बार महाराष्ट्र में भारी उलट फेर की संभावना व्यक्त की जा रही है।
पश्चिम बंगाल: पश्चिम बंगाल में कुल 42 सीटें है। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस 22, भाजपा 18, तथा कांग्रेस पार्टी ने बहरामपुर और मालदा की दो सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार पश्चिम बंगाल में सीधा मुकाबला भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच है। शांति और सुरक्षा का मामला उठाते हुए भाजपा पूरे राज्य में ध्रुवीकरण कर आधिकाधिक सीटों पर जीत हासिल करने का दावा कर रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने महंगाई, बेरोजगारी, राज्यों की स्वायत्तता को मुख्य मुद्दा बनाया है।
इंडिया गठबंधन का राज्य में अस्तित्व नहीं है। कांग्रेस पार्टी तीन-चार सीटों पर अच्छा चुनाव लड़ रही है, लेकिन मजेदार बात यह है कि कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी खुलेआम मतदाताओं से अपील कर रहे हैं कि जो लोग कांग्रेस को वोट ना दें वह लोग बीजेपी को भले वोट दे दें, तृणमूल को नहीं दें।
इसी तरह लेफ्ट के लोग भी बीजेपी की जीत में ही अपना भविष्य तलाश रहे हैं। यही कारण है कि खुद भारतीय जनता पार्टी भी पश्चिम बंगाल को अपने लिए अधिक मुफीद मानकर चल रही है। लेकिन वहां के जानकार लोगों का कहना है तो बहुत उलट फेर की गुंजाइश नहीं है। मामला आधे आधे का है। बीजेपी मजबूती से वहां लड़ रही है तो टीएमसी भी अपने लाव लश्कर के साथ अपना दबदबा बनाए रखने के लिए दृढ़ता के साथ डटी हुई है।
बिहार: बिहार में कुल 40 सीट है। पिछली बार एनडीए गठबंधन को 39 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस पार्टी ने राज्य की किशनगंज सीट पर जीत दर्ज की थी। 2024 के चुनाव में बीजेपी अपना 2019 का रिकॉर्ड दोहराने की स्थिति में नहीं है। इंडिया गठबंधन के राज्य में प्रमुख घटक राजद ने बेरोजगारी के मामले को इस कदर तूल दिया है कि 2014 की यादें ताजा हो जा रही हैं। जिस तरह 2014 में अखिल भारतीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया था उससे भी तीव्र गति से तेजस्वी यादव ने बिहार में इस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचा दिया है।
इसका असर बिहार से सटे अन्य राज्यों की सीटों पर भी पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। हालांकि भाजपा ने नीतीश कुमार के जदयू को अपने साथ मिलाकर इंडिया गठबंधन की ताकत को कमजोर करने की कोशिश की है लेकिन जमीन पर नीतीश का असर अब पहले जैसा नहीं है। नीतीश की पार्टी को 16 सीट देकर भाजपा ने अपना हाथ पहले ही काट लिया है। जिन 16 सीटों पर नीतीश की पार्टी चुनाव लड़ रही है उन सब सीटों पर इंडिया गठबंधन मजबूत स्थिति में है।
यहां यह भी तथ्य है कि नीतीश की पार्टी का वोट भाजपा और चिराग पासवान की पार्टी को ट्रांसफर हो जा रहा है लेकिन सहयोगी दलों का वोट जदयू को नहीं मिल पा रहा है। भाजपा के अन्य सहयोगी दलों की भी स्थिति बहुत साफ नहीं है। उपेंद्र कुशवाहा की काराकट सीट मशहूर गायक पवन सिंह के खड़े हो जाने से बुरी तरह फंस गई है। वहीं कांग्रेस पार्टी किशनगंज, कटिहार, समस्तीपुर, भागलपुर के साथ-साथ मुजफ्फरपुर में भी दमदारी से मुकाबले में है और जीत का दावा कर रही है।
पिछली बार इन चार राज्यों की 210 सीटों में से भाजपा गठबंधन ने 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अब जबकि मोदी ने 400 पार का नारा दिया है तब इस संख्या में वृद्धि की जरूरत पड़ेगी लेकिन इन राज्यों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक यह आंकड़ा 162 से घटकर 125 से 130 के बीच रह जाने की संभावना है। देखना दिलचस्प होगा कि देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश मिथक में फंस कर देश को इस बार भी भरमाएगा या यथार्थ की जमीन पर उतरकर कोई नया संदेश देगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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