Leadership change in BJP: भाजपा में होने वाला है दिल्ली से भोपाल तक बदलाव
अगर गुजरात फार्मूले को दोहराया जाता है, तो एमपी में टिकटें उसी तरह थोक में कटेंगी, जैसे गुजरात में कटी थीं। भाजपा नेताओं का मानना है कि सरकार-विधायकों की एंटी इनकम्बेंसी को वक्त पर रोकना ही चुनाव जीतने की चाबी है।

भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों पर बारीकी से मंथन कर लिया है| दोनों ही राज्यों के चुनाव नतीजों का एक ही कारण निकला है| वह यह है कि सरकार और विधायकों की एंटी इनकम्बेंसी को वक्त पर रोकना ही चुनाव जीतने की चाबी है| गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश का संगठन महामंत्री, मुख्यमंत्री और सारा मंत्रिमंडल बदल दिया गया| चुनाव में भाजपा के 45 विधायकों का टिकट काट दिया गया, तो उसके सकारात्मक नतीजे निकले| हिमाचल प्रदेश में मंडी लोकसभा उपचुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री नहीं बदले गए, तो नतीजा सब के सामने है|
अब अगले साल पूर्वोतर के चार राज्यों और कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान विधानसभाओं के चुनाव हैं| इन चारों ही राज्यों में पिछली बार भाजपा हारी थी, लेकिन दलबदल के बाद मध्यप्रदेश और कर्नाटक में दुबारा सरकार बनाने में कामयाब हो गई| कर्नाटक में जुलाई 2021 में मुख्यमंत्री बदल दिया गया था, येदुदरप्पा की जगह बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया था, हालांकि अब उनके खिलाफ भी पार्टी में असंतोष है| हो सकता है चुनाव से पहले उन्हें भी बदला जाए| अब बचा है मध्यप्रदेश, जहां बीच के छोटे से कार्यकाल को छोड़ कर शिवराज सिंह चौहान 2005 से मुख्यमंत्री हैं|
हिमाचल प्रदेश की हार से सबक लेकर मध्यप्रदेश में गुजरात जैसा प्रयोग दोहराने की चर्चा शुरू हो गई है| गुजरात की जीत और हिमाचल की हार का कारण मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री थे| गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने का फायदा हुआ, हिमाचल में नहीं बदलने का नुकसान हुआ| लेकिन दोनों ही राज्यों में मुख्यमंत्रियों के हाथ में चुनाव की कमान नहीं थी| भाजपा के चुनावों की कमान कभी भी मुख्यमंत्री के हाथ में नहीं होती, चुनाव संगठन लड़ता है, मुख्यमंत्री का सिर्फ चेहरा होता है| गुजरात में चुनाव की कमान खुद अमित शाह ने संभाली थी, उनके साथ प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटिल और संगठन मंत्री रत्नाकर की तिकड़ी थी|
हिमाचल प्रदेश की कमान भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने संभाली थी, उनके साथ प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कश्यप और संगठन महामंत्री पवन राणा की तिकड़ी थी| गुजरात में अमित शाह, प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटिल और संगठन महामंत्री रत्नाकर की तिकड़ी टिकट कटने वाले बागियों को समझाने में कामयाब रहे|

हिमाचल में नड्डा, कश्यप और राणा की तिकड़ी फेल हुई| चुनाव के बाद हुई समीक्षा में पाया गया कि भाजपा का कार्यकर्ता इन तीनों से नाराज था, इसलिए वह उस तरह काम में लगा ही नहीं, जैसे लगना चाहिए था। इसकी सारी जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री की थी| इसलिए अब प्रदेश अध्यक्ष के अलावा संगठन महामंत्री को भी जल्द ही बदला जाएगा|
पहले यह माना जा रहा था कि नड्डा 2024 के लोकसभा चुनाव तक राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे, लेकिन अब इस फैसले पर पुनर्विचार हो रहा है| हालांकि चुनाव की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, लेकिन जैसे 2019 में अमित शाह के इस्तीफे के बाद जे.पी. नड्डा को अध्यक्ष बना दिया गया था, उसी तरह किसी दिन इस्तीफे और नई नियुक्ति की खबर आ सकती है| गुजरात के प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटिल, केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और भूपेन्द्र यादव का नाम चर्चा में है|
गुजरात के नतीजे आने के बाद, मध्यप्रदेश की मैहर विधानसभा सीट के भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को एक चिठ्ठी लिखी है| जिसमें चुनावों से पहले एंटी इनकम्बेंसी दूर करने के लिए सरकार और संगठन दोनों में आमूल चूल परिवर्तन की मांग की गई है|
वैसे मध्यप्रदेश में इसी साल मार्च में संगठन महामंत्री बदल दिया गया है, सुहास भगत की जगह हितानंद शर्मा को संघटन महामंत्री बनाया गया है| विष्णु दत्त शर्मा को फरवरी 2020 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था, उनका कार्यकाल दो महीने बाद खत्म हो रहा है| उनकी पुनर्नियुक्ति गुण दोष के आधार पर होगी|
लेकिन सब से बड़ा सवाल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी पर है, चर्चा चल रही है कि जैसे विप्लव देव को त्रिपुरा के मुख्यमंत्री पद से हटा कर उन्हें संसद में लाया गया है, उसी तरह शिवराज सिंह चौहान को केंद्र में लाकर केबिनेट मंत्री बनाने पर विचार हो रहा है|
सवाल यह है कि जैसे भाजपा ने त्रिपुरा, असम और कर्नाटक में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया है, क्या मध्यप्रदेश में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, या भाजपा के ही किसी पुराने नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा|
जिन तीन राज्यों में गैर संघी मुख्यमंत्री बनाए गए हैं, उन राज्यों और मध्यप्रदेश में बुनियादी फर्क यह है कि मध्यप्रदेश संघ की कर्मभूमि है, मध्य प्रदेश वह राज्य है जहां भाजपा अस्सी के दशक में अपने बूते पर सत्ता में आ गई थी| इसलिए ज्योतिरादित्य को मुख्यमंत्री बनाने का विरोध हो रहा है| असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह तीखे तेवरों के कारण गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की लोकप्रियता प्रदेश स्तर पर बढी है, उन्हें भी शिवराज सिंह के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है|
अगर गुजरात को पूरी तरह दोहराया जाता है, तो मध्य प्रदेश में टिकटें भी उसी तरह थोक में कटेंगी, जैसे गुजरात और हिमाचल प्रदेश में कटी थीं| गुजरात में 45 और हिमाचल प्रदेश में 22 टिकट कटे थे| गुजरात फार्मूले के शोर में मध्यप्रदेश के विधायकों की टिकटों पर तलवार लटकी है|
भाजपा के एक बड़े नेता ने बड़ी तादाद में टिकट काटने का संकेत कुछ इस तरह दिया, जब उन्होंने कहा कि "हमें कृषि के लिए जमीन तैयार करने और नए बीज बोने से पहले बासी जड़ों को हटाने के लिए खेतों की जुताई करने की जरूरत है, जिसे हम मौजूदा राजनीतिक सेट-अप में गुजरात फॉर्मूला कह सकते हैं।" इसी गुजरात फार्मूले पर चर्चा करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि न सिर्फ मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे देश में गुजरात फार्मूला लागू किया जाएगा|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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