क्या कश्मीर घाटी में 1990 का भयावह दौर पुनः लौट रहा है?
कश्मीर में एक बार फिर एक कश्मीरी पंडित की गोली मारकर हत्या कर दी गयी है। 16 अगस्त को दक्षिण कश्मीर के सोपियां जिले में सुनील कुमार भट्ट अपने भाई के साथ सेब के बागान पर गये थे। वहां आतंकवादियों ने उन दोनों को गोली मार दी। सुनील कुमार भट्ट की मौके पर ही मौत हो गयी जबकि उनके छोटे भाई अस्पताल में जीवन और मौत से जूझ रहे हैं। कश्मीर में एक बार फिर भारत समर्थकों और कश्मीरी पण्डितों को चुन चुनकर जिस तरह से निशाना बनाया जा रहा है उससे सवाल खड़ा होता है कि क्या कश्मीर घाटी में 1990 का भयावह दौर वापस लौट रहा है जब कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करना पड़ा था?

इस वर्ष की सबसे सफल हिंदी फिल्म 'दी कश्मीर फाइल्स' रिलीज हुई तो इसमें कश्मीरी हिन्दुओं पर इस्लामिक आतंकी अत्याचार और मास किलिंग को देखकर जनता के रोंगटे खड़े हो गए। हालांकि हम और आप कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अमानुष व्यवहार को महसूस ही कर सकते हैं किन्तु जिन्होंने इस दंश को भोगा है उनकी आत्मा आज भी चीत्कार करती है। 1990 का वह दशक जिसमें आतंकियों ने ऑपरेशन टुपाक या टोपाक चलाया था, कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिन्दुओं के लिए काल की तरह था।
इसमें उस दौर की राजनीति का भी अहम् योगदान था जो हाथ पर हाथ धरे बैठी थी और जम्मू सहित पंजाब तथा दिल्ली में कश्मीरी हिन्दुओं के बचे-खुचे परिवारों के लिए अस्थाई कैम्पों का निर्माण कर उन्हें बसाने को अपना परम कर्त्तव्य मान चुकी थी। बाद के वर्षों में कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार में कमी आई किन्तु गाहे-बगाहे उनके जीवन को लील ही लिया जाता था।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीरियत का जो नारा बुलंद किया था उसने कश्मीरी हिन्दुओं को भी विश्वास दिलाया था कि वे घाटी में सुरक्षित हैं। कालांतर में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जब धारा 370 और 35A को हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया तो लगा कि अब कश्मीरी हिन्दुओं के दिन बहुरेंगे और उनकी जान की कीमत को समझा जाएगा किन्तु स्थिति जस की तस के बजाये अधिक गंभीर होती जा रही है। बड़े पैमाने पर पाक समर्थित इस्लामिक आतंकी संगठन कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या कर रहे हैं। इतना ही नहीं, दहशत फैलाने के उद्देश्य से वे पुलिसकर्मियों की जान भी लेने से नहीं चूक रहे।
07 मई, 2022 को श्रीनगर के जूनीमार इलाके में जम्मू-कश्मीर पुलिस के निहत्थे कांस्टेबल गुलाम सन डार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वहीं 12 मई को कश्मीरी पंडित और क्लर्क राहुल भट्ट को बड़गाम के चदूरा में तहसीलदार के कार्यालय में घुसकर मार डाला गया। ठीक एक दिन बाद 13 मई को पुलवामा में पुलिस कांस्टेबल रियाज अहमद ठोकर को उनके घर के बाहर गोली मार दी गई जिससे वे शहीद हो गए।
17 मई को बारामुला के बाजार में एक शराब दुकान के बाहर आतंकियों ने ग्रेनेड से हमला किया जिसमें रंजीत सिंह की मृत्यु हो गई। 24 मई को श्रीनगर के सौरा में पुलिसकर्मी सैफुल्ला कादरी की उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुनः एक दिन बाद 25 मई को कश्मीरी टीवी कलाकार आमरीन भट्ट को चदूरा, बड़गाम में गोली मार दी गई। महीने के आखिरी दिन 31 मई को कुलगाम के एक सरकारी विद्यालय में हिन्दू महिला अध्यापिका रजनी बाला की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
मई का रक्तरंजित माह बीता ही था कि 02 जून को आतंकियों ने कुलगाम के एक बैंककर्मी विजय कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी। विजय कुमार राजस्थान के रहने वाले थे। उसी दिन बड़गाम में आतंकियों की गोलीबारी में बिहार के मजदूर दिलखुश कुमार की मृत्यु हो गई। अगस्त का महीना तो कश्मीर में रह रहे बिहारियों के लिए भारी पड़ता दिख रहा है। 04 अगस्त को पुलवामा में आतंकियों के ग्रेनेड हमले में बिहार के मुमताज की मृत्यु हुई तो 12 अगस्त को आतंकियों ने बांदीपोरा में बिहार के मजदूर अजमेर की गोली मारकर हत्या कर दी।
अब 16 अगस्त को आतंकियों ने सेब के बागान में नाम पूछकर दो भाइयों को गोली मार दी जिसमें सुनील कुमार भट्ट की मृत्यु हो गई और उनके भाई परतिम्बर नाथ घायल हैं। नाम पूछकर हत्या करना यह इंगित करता है कि आतंकी हिन्दुओं को निशाना बनाने के उद्देश्य से ही घाटी में आतंक फैला रहे हैं।
सुनील कुमार भट्ट की हत्या इसलिए भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि उन्होंने अपने परिचितों के साथ तिरंगा यात्रा निकाली थी। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आव्हान पर पूरे देश में 'हर घर तिरंगा अभियान' जोर-शोर से मनाया गया। घाटी में भी इस अभियान को लेकर उत्सुकता चरम पर थी। पर ऐसा लगता है मानो इस्लामिक आतंकियों को 'तिरंगे' का यह सम्मान रास नहीं आ गया। उससे भी बढ़कर घाटी में तिरंगे की बढ़ती ताकत उन्हें क्रूर बना रही है। सुरक्षा एजेंसियों ने भी तिरंगा अभियान के बाद घाटी में टारगेट किलिंग की आशंका जताई है।
कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स नामक आतंकी संगठन ने इस प्रकार के हमलों की जिम्मेदारी भी ली है। इसके अलावा अल बद्र नामक आतंकी संगठन ने भी कश्मीरी हिन्दुओं पर हमले की रणनीति बनाई है। संगठन से जुड़े आदिल वानी को पहचान लिया गया है और वह सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर है। पाकिस्तान समर्थित संगठन ऑपरेशन रेड वेव को अंजाम देने में लगे हैं जो कहीं न कहीं 1990 के दशक के टोपाक की याद दिलाता है। घाटी में ऑपरेशन रेड वेव के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने 200 लोगों की एक सूची बनाई है जिसे अमल में लाने के लिए घाटी में हाइब्रिड आतंकी संगठन तैयार किया जा रहा है। यदि आईएसआई अपने मकसद में कामयाब होती है तो यह घाटी में हिन्दुओं के नरसंहार को बढ़ावा देगा।
इन हमलों के बाद से कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन की बात करने लगी है। अभी जून में ही केंद्र ने सरकारी नौकरी में कार्यरत कश्मीरी पंडितों के ट्रांसफर पॉलिसी को अपग्रेड किया था पर लगता है जैसे कश्मीरी पंडित जम्मू में भी नहीं रहना चाहते। कश्मीरी पंडितों में लगातार हो रहे आतंकी हमलों से सरकार के प्रति विश्वास में कमी आई है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केंद्र को घेर रहा है। परिसीमन के बाद जम्मू के राजनीतिक कद में बढ़ोत्तरी से भी आतंकी संगठन और उनके कश्मीरी हिमायती खुश नहीं हैं और अपना क्षोभ वे कश्मीरी आम नागरिकों की हत्या कर निकाल रहे हैं।
एक बड़ा खतरा अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से भी है। पाकिस्तान के साथ तालिबान के साझे रिश्ते भविष्य में घाटी में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं। इन सभी परिस्थितियों में केंद्र सरकार के समक्ष दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे जहाँ कश्मीरी हिन्दुओं के मन में विश्वास पैदा करना है वहीं आतंकी घटनाओं को रोकते हुए आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूत भी करना है। गृहमंत्री अमित शाह की कठोर शासक वाली छवि जो किसान आन्दोलन, दिल्ली दंगे, शाहीन बाग धरना, जेएनयू विवाद से मलिन हो गई थी, उसे सुधारने का समय है। घाटी में सफाई अभियान बहुत आवश्यक है और इस बार सीधे साफ करना होगा, सुधरने का अवसर देना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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