Hindutva in Karnataka: कर्नाटक बन रहा है हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला

कर्नाटक में गौ हत्या प्रतिबंध और धर्मांतरण पर रोक के बाद अब यूनिफॉर्म सिविल कोड, हलाल सर्टिफिकेट पर नियंत्रण जैसे विषय उठाकर भाजपा विपक्षी दलों की मुस्लिम तुष्टिकरण राजनीति को आगामी विधानसभा चुनावों में प्रमुख मुद्दा बना

Karnataka is becoming a new laboratory of Hindutva
गुजरात ,उतर प्रदेश और असम के बाद अब कर्नाटक भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला बन रही है। टीपू सुल्तान के महिमामंडन का विरोध तो कम से कम एक दशक से अपनी जगह कांग्रेस भाजपा में विवाद का मुद्दा बना ही हुआ है। पिछले दो सालों में भाजपा ने गौ हत्या प्रतिबन्ध और धर्मांतरण पर रोक लगाने के दो महत्वपूर्ण बिल पास किए हैं। कर्नाटक के गौ हत्या प्रतिबन्ध क़ानून की खासियत यह है कि इसमें गाय, बछड़े के साथ साथ, बैल को भी शामिल किया गया है और 13 महीने से कम उम्र के भैंसे को भी शामिल किया गया है। यह इस लिहाज से बाकी राज्यों के क़ानून से अलग है।

अब विधानसभा चुनावों से पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड और हलाल मीट सर्टिफिकेट पर प्रतिबन्ध लगाने के बिल पास करवाने की तैयारी चल रही है। धर्मांतरण और गौरक्षा कानूनों की तरह ये दोनों बिल भी हिंदुत्व को बढावा देने और कांग्रेस की मुस्लिम, ईसाई तुष्टिकरण की नीति को चोट करने वाले हैं। कांग्रेस ने पहले पास किए गए दोनों बिलों का भी विरोध किया था और हलाल मीट पर प्रतिबन्ध का भी कड़ा विरोध कर रही है। हालांकि यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल पर अभी मंथन भी शुरू नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री बोम्मई ने कहा है कि उत्तराखंड और मध्यप्रदेश के बिलों का प्रारूप देखने के बाद इस पर काम शुरू होगा। इस बीच 19 दिसंबर को विधानसभा में वीर सावरकर का आदमकद चित्र लगाकर भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक में हिंदुत्व की एक लंबी लाईन खींच दी है।

Karnataka is becoming a new laboratory of Hindutva
जब से राहुल गांधी के हाथ में कांग्रेस की कमान आई है, वीर सावरकर कांग्रेस की आँख की किरकिरी बन गए हैं। हालांकि नेहरू और इंदिरा गांधी के जमाने तक वीर सावरकर से नफरत की राजनीति नहीं थी। लेकिन जब से मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति शुरू हुई, तब से हर हिंदूवादी नेता का विरोध शुरू हो गया। राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वीर सावरकर का विरोध कर्नाटक से ही शुरू किया था, जो बाद में महाराष्ट्र पहुंचते पहुंचते उग्र हो गया था। राहुल गांधी ने वीर सावरकर को गद्दार तक कह दिया था।

उसी लाईन पर चलते हुए सोमवार को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डी.के. शिव कुमार ने वीर सावरकर को गैर भारतीय तक कह डाला। उन्होंने कहा कि वह न तो कर्नाटक के हैं और न ही भारतीय। इस पर कांग्रेस और भाजपा में काफी तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई है। केन्द्रीय संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी, जो कर्नाटक से ही आते हैं, ने यहां तक कह दिया कि मौजूदा कांग्रेस का आज़ादी के आन्दोलन से कुछ लेना देना नहीं है, यह डुप्लीकेट और नकली कांग्रेस है।

वैसे कांग्रेस इस मुद्दे पर बैकफुट पर है, क्योंकि कर्नाटक विधानसभा में सिर्फ वीर सावरकर का चित्र ही नहीं लगाया गया है, बल्कि महात्मा गांधी, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, डा.आंबेडकर, स्वामी विवेकानन्द और कर्नाटक के समाज सुधारक बसवन्ना का चित्र भी लगाया गया है। विरोध करने के लिए कांग्रेस के विधायकों ने जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और जगजीवन राम के फोटो लेकर विधानसभा के बाहर धरना दिया, जबकि विधानसभा के अंदर सरदार पटेल का भी चित्र लगाया गया है।

वीर सावरकर कांग्रेस की आँख की किरकिरी बन चुके हैं, तो भाजपा भी जानबूझ कर वीर सावरकर को आगे बढा रही है, क्योंकि हिन्दुओं में इसकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हो रही है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस इससे अनजान है, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए सावरकर का विरोध करना कांग्रेस की मजबूरी बन गया है। कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी ने भले ही हिमाचल प्रदेश और गुजरात को अपनी भारत जोड़ो यात्रा के रूट में शामिल नहीं किया था, लेकिन कर्नाटक को रूट में शामिल किया था। 23 अक्टूबर को राहुल गांधी ने कर्नाटक में कहा था कि भाजपा कर्नाटक को नफरत और कुशासन की प्रयोगशाला बना रही है।

हलाल मीट सर्टिफिकेट पर प्रतिबन्ध कर्नाटक में भाजपा का नया आईडिया है। भाजपा के एमएलसी एन रविकुमार ने इस संबंध में फिलहाल प्राईवेट मेम्बर बिल पेश करने का नोटिस दिया है, जैसे संसद में भी यूनिफार्म सिविल कोड और जनसंख्या नियन्त्रण के प्राईवेट मेम्बर बिल पेश किए गए हैं, जबकि ये दोनों बिल भाजपा के आधिकारिक एजेंडे पर है। भाजपा विवादास्पद बिलों को पहले प्राईवेट मेम्बर बिलों के रूप में पेश करके बहस शुरू करवाती है, ताकि विपक्ष के तेल और तेल की धार देखी जा सके।

एन रविकुमार ने राज्यपाल से जिस बिल को पेश करने की इजाजत मांगी है, उसमें कहा गया है कि हलाल सर्टिफिकेट को गैर कानूनी घोषित किया जाए। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफ.एस.एस.ए.आई) के अलावा किसी अन्य संगठन की और से जारी खाद्य सर्टिफिकेट पर रोक लगाई जाए। हलाल सर्टिफिकेट निजी मुस्लिम संगठन की ओर से जारी किया जाता है। हलाल सामग्री बेचने वाले को इसकी फीस चुकानी होती है, जो वह हर हलाल सर्टिफिकेट के हिसाब से अदा करता है। सर्टिफिकेट देने वाले हलाल संगठन उस फीस का इस्तेमाल मुस्लिम धर्म प्रचार और धर्मान्तरण करवाने के लिए करते हैं। लेकिन हलाल मीट गैर मुस्लिमों को जबरदस्ती खिलाया जा रहा है।

इस संबंध में इसी साल अप्रेल में सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई है। एक छात्र ने यह याचिका दाखिल की है। जिसमें कहा गया है कि देश की 85 फीसदी आबादी को उनकी इच्छा के खिलाफ हलाल प्रमाणित वस्तुओं के इस्तेमाल के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह सर्टिफिकेट निजी संस्थाएं जारी करती हैं इसलिए इस पर पाबंदी लगनी चाहिए। याचिका दाखिल करते हुए वकील विभोर आनन्द ने कहा था कि "एक धर्म निरपेक्ष देश में किसी एक धर्म की मान्यताओं और विश्वास को, दूसरे धर्म पर थोपा नहीं जा सकता। यह गैर-मुस्लिमों के मूल अधिकारों का हनन है।"

हलाल मुद्दे पर कर्नाटक में इस साल मार्च में काफी विवाद खड़ा हुआ था। जब कुछ हिंदू संगठनों ने हिन्दू त्योहारों के दौरान हलाल मीट का बहिष्कार करने का आह्वान किया था। रविकुमार ने इसे निजी विधेयक के रूप में पेश करने की योजना बनाई थी, जिसके लिए उन्होंने राज्यपाल थावरचंद गहलोत को लिखा था। हालांकि, अब भाजपा सरकार इसे एक सरकारी विधेयक के रूप में पेश करने की योजना बना रही है। भाजपा के एक अन्य विधायक अरविंद बेलाड ने कहा है कि कांग्रेस जो चाहती है कह सकती है, लेकिन देश के अधिकांश लोग हलाल में विश्वास नहीं करते हैं।

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