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Regional Parties: क्या क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कम हो रहा है?

कर्नाटक चुनाव में जेडीएस की हार से एक संकेत यह भी मिल रहा है कि मतदाता राष्ट्रीय दलों की ओर दोबारा लौट रहा है। तो क्या देश में क्षेत्रीय दलों का दौर खत्म हो गया?

Karnataka elections 2023 JDS defeat indicate that influence of regional parties decreasing?

Regional Parties: कर्नाटक चुनाव परिणाम आने के बाद से क्षेत्रीय दलों के सुर बदल गए हैं। बात-बात में कांग्रेस को कोसने और राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन का नेता न मानने की बात करने वाले अब चुप हैं। राहुल गांधी का मुखर विरोध करने वाले विपक्षी दल अब राहुल गांधी में नेतृत्व देख रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि कल तक विपक्षी गठबंधन की बैठकों में बुलाने के बाद भी आने में आनाकानी करने वाले अब कांग्रेस की शान में कशीदे पढ़ने लगे हैं।

इसका कारण सिर्फ कर्नाटक की जीत नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय दलों को अब सामने अपनी राजनीति का अवसान दिख रहा है। दो आम चुनाव और कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणामों का विश्लेषण करने पर यही नजर आता है कि जनता छोटे दलों की अवसरवादिता, पदलोलुपता और भ्रष्टाचार के कारण अब इनको धीरे-धीरे राजनीति के मैदान से आउट करना चाह रही है।

मोटे तौर पर कहा जाए तो अब क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक यात्रा पर विराम लगने जा रहा है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसके साफ-साफ संकेत मिल रहे हैं। दीवाल पर लिखी इस इबारत को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सबसे पहले पढ़ा, और कांग्रेस की तरफ सार्वजनिक तौर पर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है। पश्चिम बंगाल में अभी हाल ही में हुए उप चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई थी, और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुस्लिम वोट टीएमसी से खिसक कर कांग्रेस की ओर शिफ्ट होने लगा है। तबसे टीएमसी में खलबली है और ममता बनर्जी लगातार कांग्रेस से अपील कर रही हैं कि बंगाल को उनके हवाले छोड़ दिया जाए तो पूरे देश मे वह कांग्रेस के साथ हैं।

राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से कह रहे हैं कि अब देश में गठबंधन की राजनीति का समय खत्म होने जा रहा है। ऐसा कहने के पर्याप्त कारण हैं। लोकसभा चुनाव की बात की जाए तो 2014 और 2019 के आम चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला। जनता ने अपनी तरफ से पूर्ण बहुमत देने में कोई संकोच नहीं किया। इसी तरह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को देखा जाए तो 2017 और 2022 के चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला। अभी हाल में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस को पूर्ण बहुमत दिया। क्षेत्रीय पार्टी जेडीएस का इस बार न सिर्फ मत प्रतिशत 18.3 प्रतिशत से घटकर 13.29 प्रतिशत हो गया बल्कि 2018 के मुकाबले उसकी सीट भी 37 से घटकर 19 रह गयी।

इस तरह कई बार से जनता साफ संकेत और संदेश दे रही है कि उसे कमजोर सरकार नहीं चाहिए, जो विकास कार्यों को रोकने या साफ-सुथरा प्रशासन देने की नाकामी के लिए सहयोगी दलों के मोल-भाव को जिम्मेदार ठहराए। दरअसल, अब जनता को बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ गुड गवर्नेंस चाहिए। उसे कोई बहाना नहीं चाहिए।

क्षेत्रीय दलों ने स्थानीय जन आकांक्षाओं और जातीय अस्मिता को उभार कर एक समय तक राज किया। लेकिन 1989 से शुरू हुई गठबंधन की उठापटक की राजनीति और सरकार की अच्छाइयों और बुराइयों को जनता समझ चुकी है। क्षेत्रीय और छोटे दलों की राजनीतिक सीमा से भी सब वाकिफ हो गए हैं। ऐसे में आम जनता का झुकाव एक बार फिर राष्ट्रीय दलों की तरफ हो रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं।

गठबंधन सरकारों के दौर में क्षेत्रीय दल प्रदेश में 'स्वतंत्र क्षत्रप' की हैसियत रखते थे तो केंद्रीय सत्ता में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाते थे। क्योंकि तब केंद्र सरकार छोटे-छोटे दलों को एकजुट करके ही बनती थी। इसके एवज में पहले तो वह राजनीतिक मोल-भाव करते थे, बड़ा और मलाई वाला विभाग मुझे चाहिए, और बाद में समय-समय पर अपने व्यक्तिगत हितों के लिए सौदा भी करते थे। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, बसपा प्रमुख मायावती, राजद के लालू प्रसाद यादव, एनसीपी के शरद पवार, अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल, तेलगुदेशम के एन. चंद्रबाबू नायडू के राजनीतिक मोल-भाव से सब परिचित हैं।

अब देखते हैं कि देश में क्षेत्रीय दलों की स्थिति क्या है। उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी राज्य में कई बार सत्तारूढ़ रहे। इन दोनों दलों की राजनीतिक धमक का असर केंद्र सरकार तक सुनाई देती थी। लेकिन विगत दो विधानसभा चुनाव से सपा विपक्षी दल की हैसियत में तो है, लेकिन बसपा अपना आधार ही गवां बैठी है। बसपा के समक्ष अब अपने अस्तित्व को जिंदा रखने की चुनौती है। वहीं चुनाव दर चुनाव दोनों दलों के मतों में गिरावट दर्ज की जा रही है। पंजाब में यही हाल अकाली दल का है। आम आदमी पार्टी ने अकाली दल की राजनीति और धार्मिक नीति की जड़ें हिलाकर रख दी है। कर्नाटक में यही हाल किंगमेकर देवेगौड़ा की पार्टी जनत दल (सेकुलर) का हुआ है।

महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय भारी उठा-पटक का दौर चल रहा है। राज्य में शिवसेना और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (NCP) प्रमुख राजनीतिक दल हैं। शिवसेना भाजपा तो एनसीपी कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार बनाते और चलाते रहे हैं। लेकिन शिवसेना का भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद से ही पार्टी का हर समीकरण बदल गया। शिवसेना में बगावत हुई और अब उद्धव ठाकरे अपनी वाली शिवसेना के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यही हाल एनसीपी का है। यदि अजीत पवार पार्टी से विद्रोह कर भाजपा में चले जाते हैं तो संगठन के ज्यादातर कार्यकर्ता अजीत के साथ होंगे। ऐसे में शरद पवार के समक्ष अपनी बेटी सुप्रिया सुले को राजनीति में स्थापित करने के लिए कांग्रेस में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती दलित औऱ ओबीसी जातियों का अलग-अलग रूप से राजनीतिक व्यवहार है। जिस तरह से यूपी में सपा और बसपा ओबीसी और एससी की एक विशेष जाति की पार्टी बन कर रह गई, उसके बाद दलितों-पिछड़ों की अन्य जातियों का उनसे मोहभंग हुआ । कुछ जातियां भाजपा तो कुछ कांग्रेस में शामिल हो रही हैं। ठीक इसी तरह क्षेत्रीय दलों को एक झटका उनके मुस्लिम वोटरों से मिलता दिख रहा है जो अब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ जाता दिख रहा है। मुसलमानों का मानों क्षेत्रीय दलों से मोहभंग हो गया है और वो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प खड़ा करना चाहते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय दलों का एक बड़ा वोट बैंक उससे छिन रहा है।

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    एक और कारण है जो क्षेत्रीय दलों की समस्या बन गया है, और वह है परिवारवाद। क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व किसी न किसी वंश या परिवार में ही निहित रहता है। जैसे दक्षिण में करुणानिधि परिवार, उत्तर में मुलायम परिवार, लालू परिवार, चौटाला परिवार आदि। एक दौर तक तो उनकी राजनीति ठीक चली लेकिन अब जब परिवार में बिखराव आना शुरु हुआ तो राजनीति भी प्रभावित हो रही है। ऐसे परिवारवादी दलों के सामने संकट अगली पीढी के नेतृत्व का है। स्टालिन हों, अखिलेश हों या तेजस्वी यादव। इनके पास पिता की विरासत तो है लेकिन वैसा करिश्मा नहीं। चौटाला परिवार में तो नेतृत्व की ऐसी कलह मची कि जितने लोग उतनी राह चले गये।

    ऐसे में क्षेत्रीय दलों का भविष्य संकटग्रस्त दिख रहा है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह कितना शुभ या अशुभ साबित होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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