Karnataka Election Analysis: कर्नाटक में शर्मनाक हार के संदेशों को समझें मोदी और शाह
कर्नाटक चुनाव परिणाम ये स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि सिर्फ मोदी के चेहरे पर किसी राज्य का चुनाव नहीं जीता जा सकता। इसके लिए मजबूत स्थानीय नेतृत्व भी चाहिए जैसा कर्नाटक में कांग्रेस के पास था।

Karnataka Election Analysis: कर्नाटक के मतदाता हमारी राजनैतिक समझ से कहीं ज्यादा समझदार निकले। मतदाताओं ने भाजपा को बुरी तरह पटकनी दी और कांग्रेस को गर्त से निकालकर सत्ता सौंप दी। कर्नाटक चुनाव परिणामों ने राजनैतिक दलों को बताया है कि सत्ता विरोधी उबाल केवल गैर भाजपा सरकारों तक सीमित नहीें है। लोकतंत्र में कोई अपने को अपराजेय न समझे। जनता अगर ठान ले तो दिग्गज भी घुटने टेक सकते हैं।
लेकिन इन सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि जनता को विपक्ष मुक्त राजनीति का नारा पंसद नहीं है। भाजपा जिस एकरंगी राजनीति की साधना में लगी थी और पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरे देश को मोदी के रंग में रंगने के लिए दिन रात एक कर रही है उस पर कर्नाटक की जनता ने लगाम लगा कस दी है। कर्नाटक की जनता का संदेश साफ है कि मोदी हो या कोई अन्य, जनता को 'टेकन फार ग्रांटेड' लेने की भूल न करे।
2014 के बाद मोदी और शाह ने जिस तरह की चुनावी राजनीति को जन्म दिया है, उसमें भाजपा के हर चुनाव के केन्द्र में सिर्फ मोदी ही रहे हैं। लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव, मोदी को ही प्रोजेक्ट किया जाता रहा है। लेकिन कर्नाटक का चुनाव परिणाम बताता है कि मोदी के नाम पर हर चुनाव जीतना मुमकिन नहीं है। कर्नाटक की जनता ने बता दिया है कि अगर सत्ता से जायज सवाल पूछता, लोगों की बात सुनता और गंभीरता से सड़क पर लड़ता विपक्ष दिखे तो लोग सत्ता बदलने में देर नहीं करते और सत्ता पक्ष को विपक्ष में बिठा सकते हैं।
भारत के वृहद भूगोल को कमल क्रांति से जगमगाने का कारनामा कर दिखाने वाली मोदी और शाह की जोड़ी को कर्नाटक के परिणामों में छिपे संकेतों और संदेशों को समझना होगा। उन्हें समझना होगा कि राज्य सरकारों की नाकामी केन्द्र सरकार के खाते में भी जुड़ती है। भाजपा नेतृत्व ये समझने में असफल रहा। इसके साथ ही मजबूत स्थानीय नेतृत्व राज्य के चुनाव में ज्यादा अहम भूमिका निभाते हैं। भाजपा के पास वहां येदियुरप्पा थे लेकिन लिंगायतों में सबसे सम्मानित येदियुरप्पा को हटाकर कम लोकप्रिय बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया गया। भाजपा ने यह क्यों किया इसका कोई 'संतोष'जनक जवाब आज भी किसी के पास नहीं है। लेकिन कमजोर बोम्मई मुख्यमंत्री बनने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष के बीच ही झूलते रहे।
केन्द्र से होने वाले निर्णय का तालमेल राज्य से नहीं हो पाया इसलिए कर्नाटक भाजपा गुटों में बंटती चली गयी और एक दूसरें को निपटाने में लगी रही। पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का गुट, मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई का गुट, प्रदेश अध्यक्ष का गुट, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष का गुट, राष्ट्रीय महामंत्री और महाराष्ट्र के प्रभारी सीटी रवि का गुट, केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी का गुट। इन सभी गुटों ने एक दूसरे को कमजोर करके भाजपा को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भाजपा की बुरी हालत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भाजपा के सबसे भरोसेमंद और मजबूत पकड़ के लिंगायत वोटरों ने इस बार भाजपा से ज्यादा कांग्रेस पर भरोसा जताया है। कांग्रेस के 34 लिंगायत विधायक चुनाव जीते हैं। कर्नाटक में 30 साल में पहली बार कांग्रेस के इतने लिंगायत विधायक जीतकर आए हैं। कांग्रेस ने इस कर्नाटक चुनाव में भाजपा से 53 सीटें छीनी हैं और 59 सीटें बचाई हैं। भाजपा ने कांग्रेस की 16 सीटें छीनी हैं और 2018 की 104 सीटों में से सिर्फ 43 सीटें बचा सकी। कांग्रेस को 43 प्रतिशत वोट मिले। यह वोट शेयर के लिहाज से 1989 के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत है। भाजपा के बुरे प्रदर्शन का आलम यह रहा कि कर्नाटक जैसे मजबूत गढ़ में भी भाजपा की 31 सीटों पर जमानत जब्त हुई। भाजपा के 11 मंत्री भी अपनी सीट नहीं बचा सके।
कांग्रेस ने कर्नाटक के सभी छह क्षेत्रों में भाजपा से बेहतर प्रदर्शन किया है। मुम्बई कर्नाटक जो भाजपा का गढ़ माना जाता है, से आने वाली 50 सीटों में से कांग्रेस ने 33 सीटें जीती जबकि भाजपा को अपने गढ़ में सिर्फ 16 सीटें मिली। 2018 के चुनाव मे इस क्षेत्र से भाजपा ने 36 सीटें जीती थी। हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र से जिसे कांग्रेस और जेडीएस के प्रभाव का क्षेत्र कहा जाता है यहां भाजपा सेंध लगाने में असफल रही। कांग्रेस ने इस क्षेत्र से आने वाली 40 सीटों में से लगातार तीसरी बार आधे से ज्यादा सीटें अपने नाम की। कांग्रेस को यहां से 26 सीटें मिली जबकि भाजपा को महज 10 सीटें मिली। जेडीएस भी यहां 3 सीटें जीतने में सफल रही। 2018 में कांग्रेस ने यहां से 21 सीटें जीती थीं।
भाजपा के गढ़ मध्य कर्नाटक में भी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है। यह क्षेत्र लिंगायत, एससी एसटी प्रभाव वाला है। यहां से आने वाली 23 सीटों में से कांग्रेस को 15 सीटें, भाजपा को 6 और जेडीएस को 1 सीट मिली है। भाजपा के बेहद मजबूत गढ़ माने जाने वाले कोस्टल कर्नाटक में भाजपा ने सबसे ज्यादा सीटें जीती लेकिन कांग्रेस भी 3 सीटें बढ़ाने में सफल रही। कोस्टल कर्नाटक से 19 सीटें आती है। यहा हिन्दुत्व, हिजाब और आरक्षण बेअसर रहा। भाजपा को 13 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली।
जेडीएस का गढ़ माने जाने वाले ओल्ड मैसूर में कांग्रेस ने जेडीएस और भाजपा को तगड़ा झटका दिया है। यहां से 64 सीटें आती हैं। कांग्रेस ने यहां से 43 सीटें जीती जो पिछले 2018 के चुनाव से 23 सीटें ज्यादा है। भाजपा को सिर्फ 5 सीटें मिली जो पिछले चुनाव से 11 सीटें कम है। जेडीएस को यहां से सिर्फ 14 सीटें मिली जो पिछले 2018 के चुनाव से 12 सीटें कम है। बेंगलुरू सिटी के चुनाव परिणाम को देखे तो यह एकमात्र क्षेत्र है जहां भाजपा ने कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया है। बेगलुरू सिटी से 28 सीटें आती है। भाजपा ने यहां पर 15 सीटें जीती है। यह सीटें 2018 से 4 अधिक है। कांगेस ने 13 सीटें जीती जो पिछले चुनाव से 2 कम है। जेडीएस का यहां खाता भी नहीं खुला।
कर्नाटक के इस चुनाव में जेडीएस के बेहद बुरे प्रदर्शन के कारण कांग्रेस सबसे अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब रही। ओल्ड मैसूर में जेडीएस का वोक्कालिग्गा और मुसलमानों का संगठित वोट बैक था। लेकिन कांग्रेस के बंजरग दल पर बैन लगाने के वादे के बाद मुसलमान कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गए जिसके कारण 24 साल के अपने इतिहास में जेडीएस ने सबसे बुरा प्रदर्शन करते हुए सिर्फ 19 सीटें जीती। जेडीएस ने सर्वाधिक 23 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे लेकिन जेडीएस का एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीत नहीं सका।
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हिंदुत्व और हनुमान भाजपा के काम नहीं आ सके। कुछ ही माह बाद मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में चुनाव होने हैं। मध्यप्रदेश को बचाना और छत्तीसगढ़ और राजस्थान कांग्रेस से छीनना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। मोदी पर निर्भरता एक सीमा तक ही साथ दे सकती है उसके बाद स्थानीय नेतृत्व का ही असर मतदाताओं पर होता है। कर्नाटक में बुरी हार के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ के साथ तेलंगाना में भाजपा स्थानीय नेताओं पर भरोसा करती है, या उन्हें किनारे करके मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ती है, उसी से अगले वर्ष के लोकसभा चुनावों की दिशा भी तय होगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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