Siddaramaiah: राजनीति के समीकरणों को साधने में माहिर हैं सिद्धारमैया
सिद्धारमैया समीकरणों को साधने में कितने माहिर हैं उसे इस बात से समझा जा सकता है कि राज्य के अधिकांश विधायक शिवकुमार के साथ हैं लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी सिद्धारमैया को मिल गयी।

Siddaramaiah: वह साल 1983 था। इंदिरा गांधी का करिश्मा कम होने लगा था। राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी क्षत्रप उभरने लगे थे। तब उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और कर्नाटक में जनता पार्टी की ताकत बची हुई थी। इसी बीच कर्नाटक का चुनाव आया। राज्य की चामुंडेश्वरी सीट से टिकट की उम्मीद बांधे 36 साल का एक नौजवान राज्य जनता पार्टी के मुख्यालय पर रोज आता। अपनी लॉबिंग करता। पिछड़ा समुदाय से होने और वकालत के पेशे में नाम कमाने के साथ ही मैसुरू के तालुका चुनाव में पांच साल पहले धमाकेदार जीत हासिल कर चुके उस नौजवान को टिकट की उम्मीद थी।
लेकिन जब जनता पार्टी के उम्मीदवारों की लिस्ट जारी हुई तो उसका नाम उसमें नदारद था। इससे वह नौजवान निराश हो गया। उसने एच डी देवेगौड़ा से बात भी की, लेकिन बात नहीं बनी। अभी वह निराशा में ही गोते लगा रहा था कि उसके राजनीतिक गुरू अब्दुल नजीर ने उसे निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतरने की सलाह दी। वह नौजवान चुनाव मैदान में न सिर्फ उतरा, बल्कि विधानसभा तक पहुंचने में कामयाब भी रहा।
उस चुनाव में कांग्रेस की पराजय हुई और रामकृष्ण हेगड़े की अगुआई में सरकार बनी। उस सरकार को चामुंडेश्वरी के उसी निर्दलीय विधायक ने भी समर्थन दिया, जो जनता पार्टी का टिकट मिलने पर निर्दलीय लड़ा और जीता था। हेगड़े का साथ देने वाले उस नौजवान का नाम सिद्धारमैया था जो कर्नाटक के एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।
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सिद्धारमैया बाद में जनता पार्टी और फिर जनता दल में शामिल हो गए। जब दस साल पहले सिद्धारमैया मुख्यमंत्री चुने गए, तब उनके विरूद्ध कांग्रेस के कद्दावर नेता मल्लिकार्जुन खड़गे थे। तब कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री चुनने के लिए विधायकों का गुप्त मतदान कराया। उस मतदान में महज आठ साल पहले जनता दल सेक्युलर से कांग्रेस में आए सिद्धारमैया ने बाजी मारी। यह संयोग ही कहा जाएगा कि अब मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और डी शिवकुमार के साथ मुख्यमंत्री पद की खींचतान में वे उस सिद्धारमैया के साथ रहे, जिन्होंने दस साल पहले मुख्यमंत्री पद के लिए हुई रस्साकसी में उन्हें पटखनी दी थी।
जब राष्ट्रीय राजनीति में जनता दल की धमक थी, तब उसके तीन युवा चेहरे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखते थे। युवा जनता दल के अध्यक्ष और बाद में जनता दल के महासचिव बने मोहन प्रकाश जहां उत्तर भारत से हैं, वहीं दो नाम दक्षिण और एक ही राज्य कर्नाटक के थे। दूसरा नाम था सिद्धारमैया और तीसरे रहे एमपी प्रकाश, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि मोहन प्रकाश और सिद्धारमैया दोनों ही कांग्रेस में हैं।
बहुत कम लोगों को पता है कि समाजवादियों में भी गोत्र परंपरा है। जो मधु लिमये का अनुयायी हुआ, वह उनके गोत्र का माना जाता है तो जो चंद्रशेखर का अनुयायी रहा, वह उनके गोत्र का। समाजवादियों के बीच खींचतान और प्यार-मोहब्बत के रिश्ते में गोत्रों की पृष्ठभूमि भी बड़ी भूमिका निभाती है। सिद्धारमैया ने भले ही स्थानीय स्तर पर अपनी राजनीति अब्दुल नजीर के निर्देशन में शुरू की, लेकिन बाद में वे उस देवेगौड़ा के साथ चले गए, जिन्होंने पहली बार टिकट देने से उन्हें मना कर दिया था।
सिद्धारमैया एक दौर में देवेगौड़ा के ही आदमी माने जाते रहे। लेकिन जब अहिंदा राजनीति के चलते उनका कद बढ़ने लगा तो देवेगौड़ा को ऐसा महसूस होने लगा कि सिद्धारमैया उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी के लिए खतरा बन सकते हैं। इसलिए उन्हें साल 2005 में पार्टी से निकाल दिया। जबकि 1994 के चुनाव में कर्नाटक में जनता दल को जीत मिली और देवेगौड़ा मुख्यमंत्री बने तो सिद्धारमैया को वित्त मंत्री बनाया गया था। ।
1996 में संयोग ऐसा बना कि जिस देवेगौड़ा ने शायद ही सोचा होगा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनेंगे, प्रधानमंत्री बन गए। तब कर्नाटक के मुख्यमंत्री की दौड़ में सिद्धारमैया भी शामिल थे, लेकिन बाजी जेएच पटेल के हाथ लगी। तब सिद्धारमैया को उप मुख्यमंत्री बनाया गया।
जातिवादी राजनीति की जब भी चर्चा होती है, तब उत्तर भारत के राज्यों और नेताओं को सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जाता है। उसके बरक्स दक्षिण को कहीं ज्यादा प्रगतिशील कहा जाता है। लेकिन कर्नाटक में भी राजनीति की बड़ी बुनियाद जाति ही है। राज्य के ताकतवर लिंगायत और वोक्कालिगा की बनिस्बत पिछड़ी कुरूबा जाति की जनसंख्या में हिस्सेदारी महज सात फीसद है। इस समुदाय से उभर कर राज्य की राजनीति का प्रमुख चेहरा बनना मामूली बात नहीं है। लेकिन सिद्धारमैया ने ऐसा कर दिखाया है।
दरअसल 1996 में उपमुख्यमंत्री बनने के बाद उनका कद बढ़ना शुरू हुआ। हालांकि 1999 के चुनावों में ना सिर्फ जनता दल हार गया, बल्कि सिद्धारमैया भी चुनावी मैदान में खेत रहे। लेकिन 2004 में जब चुनाव हुआ तो किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। तब कांग्रेस और जनता दल से टूटकर अलग बने जनता दल एस ने मिलकर सरकार बनाई। इसमें भी सिद्धारमैया को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। इसी बीच समीकरण बदलने लगे। जनता दल एस प्रमुख देवेगौड़ा अपने बेटे कुमार स्वामी को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने लगे। इसी बीच अहिंदा यानी अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलितों की वैचारिकी के साथ सिद्धारमैया भी आगे बढ़ने लगे जिसकी कल्पना कर्नाटक के ही एक नेता जालप्पा ने की थी।
कर्नाटक में करीब 13 प्रतिशत मुसलमान और करीब सात प्रतिशत आदिवासी, सात प्रतिशत दलित और करीब बारह प्रतिशत अन्य पिछड़ा समुदाय है। इसमें आधे से ज्यादा की हिस्सेदारी अकेले कुरूबा की है। इस गठबंधन को आगे बढ़ाने की वजह से सिद्धारमैया का कर्नाटक की राजनीति में कद बढ़ता गया। इससे देवेगौड़ा को खतरा लगने लगा और उन्होंने साल 2005 में सिद्धारमैया को पार्टी से निकाल बाहर किया। इसके बाद सिद्धारमैया निराश हो गए थे। तब येदियुरप्पा और कांग्रेस, दोनों ने उन पर डोरे डाले थे लेकिन उन्होंने कांग्रेस का ही दामन थामा।
अंदरूनी खबरें बताती हैं कि इस बार सिद्धारमैया की जीत कर्नाटक कांग्रेस का एक खेमा भी नहीं चाहता था। केंद्रीय नेतृत्व के एक हिस्से को भी लगता था कि सिद्धारमैया इस बार नहीं जीतेंगे। सूत्र यह भी कहते हैं कि शिवकुमार खेमा भी सिद्धारमैया को जीतते नहीं देखना चाहता था। सिद्धारमैया को इसका अंदाजा था। इसलिए उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र वरूणा में जज्बाती खेल खेला। उन्होंने लोगों से कहा कि यह उनके जीवन का आखिरी चुनाव है। उनकी जीत ने उनके विरोधी खेमे के खेल को गड़बड़ा दिया। अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक के कांग्रेस विधायकों में ज्यादातर का समर्थन डी के शिवकुमार को है, लेकिन उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कांग्रेस को मजबूरन सिद्धारमैया को ही आगे करना पड़ा है।
कर्नाटक ही नहीं, कांग्रेस नेतृत्व भी जानता है कि राज्य की उसकी जीत के असली रणनीतिकार और नायक डीके शिवकुमार हैं। लेकिन उन्हें इसका पारितोषिक नहीं मिल रहा है। अतीत में कांग्रेस ऐसी ही गलती मध्य प्रदेश और राजस्थान में कर चुकी है। युवा और ताकतवर नेतृत्व की बजाय अपनी पसंद के नेतृत्व को चुनने की गलती कांग्रेस ने असम और पश्चिम बंगाल में भी की और उसकी कीमत भी चुकाई। असम से हेमंत विस्व शर्मा और बंगाल से ममता ने कांग्रेस से अलग राह ऐसी ही वजहों से चुनी। भले ही सिद्धारमैया के सिर ताज सजने जा रहा है, लेकिन लगता है कि कर्नाटक में भी एक सचिन पायलट के व्यक्तित्व को उभारने की नींव कांग्रेस ने रख दी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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