Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Joshimath Sinking: जोशीमठ में दरकते पहाड़ का संकेत समझिए

विकास अपने आप में कभी अकेला शब्द नहीं होता। इसके आगे या पीछे कोई दूसरा शब्द जोड़ने के बाद ही यह शब्द संतुलन साध पाता है। जहां विकास इकलौता खड़ा होता है, वहां विनाश का कारण बन जाता है। जैसे इस समय जोशीमठ में बना हुआ है।

Joshimath Sinking concern on cracked in Mountains indicate warning

Joshimath Sinking: जोशीमठ को भी विकास का वही पाठ पढ़ाया गया जो बाकी देश को पढ़ाया जा रहा है। इस विकास के नाम पर क्या होगा, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता। सड़क, बिजली, पानी की व्यवस्था की आड़ में दी जा रही सुविधाओं का पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश के रूप में घातक परिणाम आ रहा है।

अंग्रेजी शासन से आजादी के बाद भारत में एक दौर था जब औद्योगिक विकास की अलख लगाई गयी थी। नये भारत के निर्माण के लिए औद्योगिक विकास को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन नब्बे के दशक में उस सरकारी औद्योगिक विकास का विकल्प जिस निजी औद्योगिक विकास ने लिया उसने औद्योगिकरण को किनारे करके सिर्फ विकास को पकड़ लिया। यह स्थापित किया जाने लगा कि बाजार में मांग जितनी अधिक होगी, उतना अधिक औद्योगिक उत्पादन होगा और यही विकास माना जाएगा।

आज जोशीमठ विकास की इसी परिभाषा का शिकार हो गया है। विकास का पहिया बिजली से चलता है और इस बिजली उत्पादन के लिए कहीं बड़े बड़े थर्मल पॉवर प्लांट लगाये जाते हैं या फिर कहीं बड़े बड़े हाईड्रो पॉवर प्रोजेक्ट। थर्मल पॉवर प्लांट अगर मैदान में प्रदूषण तथा पर्यावरण विनाश का कारण बनते हैं तो पनबिजली परियोजनाएं पहाड़ के लिए संकट का सबब।

2006 में जब टिहरी बांध परियोजना को चालू किया गया तब भी इसे लेकर बहुत सी आशंकाएं व्यक्त की गयी थीं। टिहरी बांध बन जाने के बाद पुराने टिहरी शहर का डूबना ही इकलौती विपत्ति नहीं थी जो पहाड़ के लोगों पर आई थी। टिहरी बांध भूकंप प्रभावित क्षेत्र में है और किसी दिन वह हुआ जिसकी आशंका बांध बनते समय जतायी गयी थी तो हरिद्वार तक गंगा के किनारे के सारे शहर पलक झपकते साफ हो जाएंगे।

अस्सी के दशक में जब टिहरी बांध का निर्माण शुरु हुआ तो कई तरह की आपत्तियां दर्ज की जाने लगीं। उन आपत्तियों को देखते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक समिति गठित की जिसकी रिपोर्ट उनकी मौत के बाद आई। 1986 में आई उक्त रिपोर्ट में कहा गया था कि ''टिहरी वह जगह नहीं हो सकती जहां 260 मीटर ऊंचा बांध बनाया जाए।" इसके बाद 1990 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक और कमेटी बनाई जिसे सारी आपत्तियों को देखते हुए नये सिरे से इस बांध का आंकलन करना था।

पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित कमेटी ने साफ कहा कि "टिहरी बांध जहां बनाया जा रहा है वहां इसके जीवनकाल में 8 रिक्टर स्केल का भूकंप आना तय है। उस आशंका को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस बांध का डिजाइन इस स्तर के भूकंप को नहीं झेल पायेगा।" जिस दिन ऐसा हुआ उसके बाद क्या होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। अगर ये आशंका फलित होती है और कभी टिहरी बांध टूटता है तो इतनी ऊंची लहरे उठेंगी कि टिहरी से लेकर हरिद्वार तक बीच में जितने कस्बे या शहर गंगा के किनारे हैं वो सब बह जाएंगे। इन शहरों में रहनेवाले कितने लोग मारे जाएंगे, इसकी तो कल्पना भी नहीं कर सकते। कुछ अध्ययन बताते हैं कि ऋषिकेश जैसे शहरों का नामो निशान मिट जाएगा।

इन आशंकाओं के बाद भी एक हजार मेगावाट क्षमता वाला टिहरी प्रोजेक्ट पूरा किया गया और 2006 में इसे "देश को समर्पित" भी कर दिया गया। टिहरी बांध को विकास का वाहक बताया गया और पर्यावरणविदों की हर आशंका को विकास में रोड़ा अटकाने वाला साबित किया गया। विश्व हिन्दू परिषद और साधु संतों की उस आपत्ति पर तो खैर क्या ही ध्यान दिया जाता कि इससे गंगा अवरुद्ध हो जाएगी। विकास की गंगा तो विश्वास की गंगा को अवरुद्ध करके ही आगे बढती है।

टिहरी में तो जब होगा तब। ईश्वर करें वो आशंकाएं कभी भी फलीभूत न हों जो टिहरी बांध को लेकर बताई गयी हैं, लेकिन जोशीमठ में तो आशंकाएं प्रोजेक्ट पूरा होने से पहले ही फलित होने लगीं। नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन की तपोवन विष्णुगढ़ पनबिजली परियोजना विज्ञान और विकास की दृष्टि से एक चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट है। धौलीगंगा या अलकनंदा नदी पर एक 70 मीटर मोटे बांध को बनाकर उसका पानी रोका जाएगा। फिर उस पानी को 12.3 किलोमीटर लंबी एक सुरंग के माध्यम से भूमिगत बिजलीघर तक पहुंचाया जाएगा। फिर 510 मीटर की सुरंग बनाकर पानी को दोबारा अलकनंदा नदी में छोड़ दिया जाएगा।

विज्ञान और विकास को ऐसी योजनाएं बहुत लुभाती हैं जिसमें वो प्रकृति की व्यवस्था पर विजय पा सकें। कुछ दुर्गम या दुरुह कार्य कर सकें ताकि उन्हें लगे कि उन्होंने नेचर की चुनौतियों को भी पीछे छोड़ दिया। ये तपोवन परियोजना का विकासवादी तप भी कुछ उसी तरह का है। लेकिन इस तप को हिमालय ने स्वीकार करने से मना कर दिया। सुरंग अभी आधी भी नहीं बनी थी कि जोशीमठ में दरारें पड़ गयीं। जोशीमठ के ही दरक कर खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो गया और आनन फानन में परियोजना पर काम रोक दिया गया। जो लोग खतरे की जद में आ गये हैं उन्हें भी बाहर निकाल लिया गया है।

लेकिन इस तात्कालिक कार्यवाही से प्रकृति को मिलने वाली चुनौती तो खत्म नहीं हो जाती? क्या दोबारा से वह दुस्साहस किया जाएगा जिसकी वजह से जोशीमठ पर संकट आया है? हिमालय में जोशीमठ इकलौती ऐसी जगह तो नहीं है जहां राष्ट्र की उर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हिमालय के कच्चे पहाड़ को छलनी किया जा रहा है। विशेषज्ञ तो कह रहे हैं कि जोशीमठ उत्तराखंड का एकमात्र शहर नहीं है जो धंसने का सामना कर रहा है। कई अन्य धंसने की कगार पर हैं। लेकिन विकास की जिद्द पकड़कर बैठे सरकारी अधिकारी स्वतंत्र वैज्ञानिकों की बात नहीं सुन रहे हैं।

Recommended Video

    Joshimath Buildings Demolition: जोशीमठ में डेंजर जोन वाली इमारतों पर चलेगा बुलडोजर | वनइंडिया हिंदी

    जोशीमठ के संकेत हिमालय की एक चेतावनी है कि उसके साथ ऐसी छेड़छाड़ न की जाए कि वह प्रतिक्रिया करने को मजबूर हो जाए। हिमालय की उम्र मानव जाति की उम्र से अधिक है। वह मानव जाति से पहले अस्तित्व में आया है और शायद मानव जाति के जाने के बाद भी रहेगा। हमारा कैलेण्डर भले सैकड़ों हजार साल का हो, हिमालय का कैलेण्डर लाखों साल का है। उस पर विजय पाने की मानसिकता छोड़कर उसके साथ सह अस्तित्व से जीने की राह तलाशेंगे तो हम भी बचें रहेंगे और हिमालय भी। यही जोशीमठ का संकेत है।

    यह भी पढ़ें: Joshimath Sinking: अंधाधुंध विकास की कीमत चुका रहा है जोशीमठ

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+