पाकिस्तान के मौलाना मौदूदी बनाम भारत के जवाहरलाल नेहरू

हो सकता है पाठकों को यह बात थोड़ी अजीबो गरीब लगे कि किसी मौलाना की भारत के पहले प्रधानमंत्री से तुलना करने का क्या तुक है? लेकिन ये तुलना जरूरी है। बंटवारे के 75 साल बाद दोनों देश आज जहां खड़े हैं उसमें जितना भारत के लिए नेहरु का योगदान है उतना ही पाकिस्तान के लिए जमात ए इस्लामी के चीफ मौलाना मौदूदी का है। पाकिस्तान मांगा भले ही जिन्ना ने लेकिन उसे इस्लामिक राज्य बनाने का अभियान मौलाना मौदूदी ने ही चलाया, जिसमें बहुत हद तक वो सफल भी रहे।

Jawaharlal Nehru of India and Maulana Maududi of Pakistan

जब पाकिस्तान बन गया तो 11 अगस्त 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की संविधान सभा में अपना पहला भाषण दिया था। इस भाषण में जिन्ना ने कहा था कि "इस देश में अब हिन्दू मुस्लिम सब बराबर के शहरी (नागरिक) हैं। धर्म के नाम पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। हिन्दू अपने मंदिरों में, मुसलमान अपने मस्जिदों में, क्रिश्चियन अपने चर्च में जाने के लिए आजाद है।" उन्होंने कहा कि "यह स्टेट का काम नहीं है कि लोगों के साथ धर्म के नाम पर भेदभाव करे।"

कुछ जानकार कहते हैं कि बंटवारे के बाद मजहब के नाम पर जो मारकाट हो रही थी उसे रोकने के लिए जिन्ना ने जानबूझकर ये बात कही थी। जबकि कुछ लोग इसे जिन्ना की सेकुलर सोच बताते हैं। लेकिन जिन्ना के इस भाषण से सबसे ज्यादा परेशानी और हैरानी उन्हें हुई जिन्होंने सचमुच इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान बनाने का सपना संजो रखा था। इसमें सबसे बड़ा नाम था मौलाना सैय्यद अबुल आला मौदूदी।

मौलाना मौदूदी जमात ए इस्लामी के चीफ थे और उनका जन्म 1903 में वर्तमान महाराष्ट्र के औरंगाबाद (अब संभाजीनगर) में हुआ था। उनका परिवार चिश्ती सूफी परंपरा से सम्बंध रखता था लेकिन मौलाना मौदूदी की इस्लाम को लेकर समझ इतनी आला दर्जे की थी कि अविभाजित भारत में रहते हुए भी वो मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के चहेते बन गये थे।

पाकिस्तान के जन्म से पहले ही 1941 में मौलाना मौदूदी ने जमात ए इस्लामी की स्थापना कर दी थी और 31 वर्षों तक उसके अमीर अर्थात सर्वेसर्वा रहे। हालांकि जमीयत उलेमा ए हिन्द और दीगर मुस्लिम संगठनों से उनकी नहीं बनी लेकिन बंटवारे से पहले उन्होंने कई मुस्लिम पत्रिकाओं का संपादन किया। बंटवारे से पहले से ही अल्लामा इकबाल और जिन्ना दोनों उन्हें बहुत महत्व देते थे।

लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद जब जिन्ना से उलट उन्होंने शरीयत की बात की तो पाकिस्तानी प्रशासन ने उन्हें 1949 में ही गिरफ्तार कर लिया गया। अपनी गिरफ्तारी पर मौलाना मौदूदी ने कहा था कि "मेरा सबसे बड़ा अपराध ये है कि मैं शरीयत के मुताबिक पाकिस्तान के कानून बनाने की वकालत कर रहा हूं"। हालांकि मौदूदी और जमात ए इस्लामी के प्रभाव के कारण जब मार्च 1949 में ऑब्जेक्टिव रिसोल्यूशन स्वीकर किया गया तब पाकिस्तान को इस्लामिक स्टेट तो नहीं कहा गया लेकिन इसे "इस्लामिक रिपब्लिक" कहा गया।

मौलाना मौदूदी का पाकिस्तान की फौज और नेताओं से लगातार टकराव होता रहा। 1953 में कादियानी मुसलमानों और हिन्दुओं के खिलाफ दंगे और हत्या के आरोप में मिलिट्री कोर्ट ने उनकी फांसी की सजा सुनाई थी जिसे संसारभर के मुस्लिम संगठनों के दबाव में वापस ले लिया गया था।

उनके प्रभाव के कारण ही पाकिस्तान के शीर्ष पदों पर गैर मुस्लिमों के बैठने पर कानूनन रोक लगा दी गयी। लेकिन 1977 में जब जिया उल हक ने पाकिस्तान की सत्ता संभाली तब पाकिस्तान के कानूनों में शरीयत के मुताबिक वो सारे बदलाव किये जो मौलाना मौदूदी चाहते थे। मौदूदी के प्रभाव में कादियानी मुसलमानों को पहले ही सेकुलर भुट्टो ने गैर मुस्लिम घोषित कर दिया था। रही सही सही कसर जिया उल हक ने हुदूद आर्डिनेन्स और नबी निंदकों के खिलाफ कठोर कानून बनाकर पूरी कर दी।

संक्षेप में कहने का आशय ये है कि पाकिस्तान भले ही जिन्ना ने बनाया हो लेकिन पाकिस्तान को इस्लामिक रिपब्लिक बनाने का संघर्ष मौलाना मौदूदी ने ही किया। उन्होंने इस्लामिक स्कॉलर की एक पूरी फौज तैयार की जो अहले हदीस थे। इसमें सबसे बड़ा नाम डॉ इसरार अहमद का है जो 1979 में मौलाना मौदूदी की मौत के बाद शरीयत की वकालत करते रहे।

आप कह सकते हैं आज आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक स्तर पर पिछड़ा हुआ पाकिस्तान दिख रहा है वैचारिक रूप से उसे बनाने का काम जिन्ना ने नहीं बल्कि मौलाना मौदूदी और उनके शागिर्दों ने किया। मौलाना मौदूदी द्वारा सोशलिस्ट विचारों के विरोध को ब्रिटिश लोगों का समर्थन भी प्राप्त होता था और उन्होंने भी मौदूदी को एक महान इस्लामिक विचारक कहा। इसके पीछे की रणनीति ये थी कि मौदूदी पाकिस्तान को सोवियत संघ के प्रभाव में जाने से रोकने के लिए लड़ रहे थे जो ब्रिटेन और अमेरिका दोनों को पसंद आ रहा था।

दूसरी तरफ आजादी के बाद भारत को एक गणराज्य के रूप में गढने का काम किया जवाहरलाल नेहरु ने। वो ब्रिटिश फेबियन सोशलिज्म से बहुत प्रभावित थे जो जमीनों के समान बंटवारे में मानव जाति की भलाई देखता था। नेहरु बार बार इस बात का उल्लेख भी करते थे और अल्लामा इकबाल हों या दूसरे मुस्लिम जमींदार या नवाब, उनको यह डर सबसे ज्यादा था कि अगर अलग पाकिस्तान नहीं बना और नेहरु प्रधानमंत्री बन गए तो उनकी जमीनें उनसे छिन जाएगीं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरु ने 1960 में लैंड सीलिंग एक्ट संसद से पारित करवाया जिसके तहत किसी परिवार के पास 30 एकड़ से अधिक जमीन नहीं हो सकती थी। इससे अधिक जमीन जिसके पास थी, सरकार ने वो जमीन अपने कब्जे में लेना शुरु कर दिया।

हालांकि नेहरु की ये योजना यूपी को छोड़कर कहीं और सफल नहीं हुई। लेकिन नेहरु ने कई और ऐसे कार्य किये जिसने उनके मुताबिक "एक प्रगतिशील और आधुनिक भारत" के निर्माण की बुनियाद रखी। गुजरात मूल के ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और लेखक भीखू पारेख लिखते हैं कि "नेहरु के लिए आधुनिकता नया राष्ट्रीय दर्शन था।"

नेहरु के इस आधुनिक दर्शन के मुख्य लक्ष्य थे: राष्ट्रीय एकता, संसदीय लोकतंत्र, समाजवाद, औद्योगीकरण, वैज्ञानिक सोच का विकास हो और भारत दुनिया में किसी महाशक्ति के साथ जाने की बजाय अपनी गुट निरपेक्ष पहचान बनाये।
बीते पचहत्तर सालों से भारत लगभग इन्हीं रास्तों पर आगे बढ रहा है। हां, जिस समाजवादी अर्थव्यवस्था को नेहरु ने उस समय की जरूरत के हिसाब से स्वीकार किया था वह पचास साल भी टिक नहीं पाया। 1991 में मजबूरन भारत को आर्थिक उदारीकरण के उसी पूंजीवादी रास्ते पर आना पड़ा जिसे पहले दिन से नेहरु ने नकार दिया था।

लेकिन नेहरु के शासनकाल में भारत ने भविष्य की जो यात्रा शुरु की थी वह आज भी अनवरत जारी है। हम ये मान सकते हैं कि नेहरु ने भविष्य के भारत के लिए जो आधारस्तंभ रखे उससे न केवल भारत की एकता और अखंडता मजबूत हुई बल्कि संसदीय लोकतंत्र भी समय के साथ मजबूत होता गया है।

जबकि सिर्फ अपनी जिद्द और नफरत के कारण कुछ मुस्लिम नेताओं ने पाकिस्तान बना तो लिया लेकिन उसकी दिशा तय नहीं कर पाये। यह काम किया मौलाना मौदूदी ने। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान भी नेहरु की तरह सोशलिस्ट सोच के साथ आगे नहीं बढना चाहता था। 1958 में पाकिस्तान के प्रेसिडेन्ट बननेवाले जनरल याकूब खान खुद सोशलिस्ट और सेकुलर विचार से प्रभावित थे।

जुल्फिकार अली भुट्टो तो अपने आप को सोशलिस्ट कहलाने में गर्व का अनुभव करते थे। लेकिन पाकिस्तान को एक बेहतर देश और अर्थव्यवस्था बनाने के इनके सपनों को मौदूदी के विचार ने ग्रहण लगा दिया। आखिरकार जिया उल हक के बाद पाकिस्तान पूरी तरह से मौलाना मौदूदी के सुझाये रास्ते पर आगे बढ गया। वह एक इस्लामिक मुल्क की जिस पहचान के लिए तड़प रहा था उसे तो कुछ हद तक प्राप्त कर लिया लेकिन सामान्य जनजीवन की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाया।

जबकि नेहरु ने भविष्य के जिस भारत की बुनियाद रखी उसमें नास्तिकता को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। इसे लंबे समय तक भारतीय समाज स्वीकार नहीं कर पाया। फिर भी, उस दौर में नेहरु ने बाकी जो किया, उसका दीर्घकालिक स्तर पर भारत को लाभ हुआ। विश्व पटल पर उसकी छवि पाकिस्तान से बेहतर बनी और पिछले 75 वर्षों में मौलाना मौदूदी के इस्लामिक पाकिस्तान से भारत बहुत आगे निकल चुका है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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