Shankaracharya Jayanti 2021: सनातन धर्म के रक्षक व देश को एक सूत्र में पिरोने वाले जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

पूज्य जगतगुरु श्री आद्य शंकराचार्य जी के विषय में कुछ भी लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान हैं। भारत में वैदिक सनातन परंपरा की रक्षा, विकास और धर्म के प्रचार-प्रसार में जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी का अनमोल योगदान है। आज अद्वैत वेदांत के प्रणेता, सनातन धर्म के प्राणधार, कश्मीर से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले, सनातन धर्म की रक्षा करने वाले महायोद्धा और भगवान शंकर के अवतार माने जाने वाले परम महाज्ञानी विद्वान, अद्भुत तेजस्वी एवं प्रखर भविष्यदृष्टा महापुरुष जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी की जयंती है। जयंती पर हम उनको कोटि-कोटि नमन करते हैं। जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी ने उस समय देश में जिस तरह से अनेकों पंथों एवं विचारों की चुनौतियां सनातन धर्म के लिए उत्पन्न हो रही थी। उनसे बेहद सफलतापूर्वक बखूबी निपटकर और समाज को सत्य का दर्शन कराने के लिए देश में अद्वैत वेदांत का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करके देश को कश्मीर से लेकर केरल तक एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था।

सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी का जन्म 788 ई. में केरल के मालाबार क्षेत्र के छोटे से गाँव कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण शिवगुरु एवं आर्याम्बा के यहां हुआ था और वह मात्र 32 वर्ष तक ही जीवित रहे थे। शंकराचार्य जी के जन्म की एक छोटी सी कथा है जिसके अनुसार, शंकराचार्य के माता-पिता को बहुत समय तक कोई संतान प्राप्त नहीं हूई थी। तो उन दोनों ने कड़ी तपस्या की, कड़ी तपस्या के बाद भगवान शिव ने माता को सपने में दर्शन दिये और कहा कि, उनके पहले पुत्र के रूप मे वह स्वयं अवतारित होंगे परन्तु, उनकी आयु बहुत ही कम होगी और, शीघ्र ही वे देव लोक गमन कर लेंगे। शंकराचार्य जी जन्म से ही बिल्कुल अलग थे, वह स्वभाव में शांत और गंभीर थे। जो कुछ भी सुनते थे या पढ़ते थे, एक बार में ही समझ कर अपने मस्तिष्क मे बिठा लेते थे। शंकराचार्य जी ने सभी वेदों और लगभग छ: से अधिक वेदांतो में अल्पायु में ही महारथ हासिल कर ली थी। समय के साथ उनका यह ज्ञान अथाह सागर में तब्दील होता चला गया। उन्होंने अपने स्वयं इस ज्ञान को, बहुत तरह से जैसे- उपदेशो, रचनाओं के माध्यम से, देश में अलग-अलग मठों की स्थापना करके, धार्मिक ग्रन्थ लिख कर अलग-अलग तरह के सन्देशों के माध्यम से लोगों तक पहुचाया। वह संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान थे।

सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

शंकराचार्य ने देश के चारों कौनों पर चार मठों की स्थापना की थी। उत्तर दिशा में उन्होंने बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ की स्थापना की थी। इसके बाद पश्‍चिम दिशा में द्वारिका में शारदामठ की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण में श्रंगेरी मठ की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने पूर्व दिशा में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन मठ की स्थापना की थी। आप इन मठों में जाएंगे तो वहां इनकी स्थापना के बारे में लिखा हुआ समस्त विवरण जान सकते हैं। आद्य शंकराचार्य जी ने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं, जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार-प्रसार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया। और लोगों को सनातन धर्म के बारें में समझाया।

सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

भारतीय परम्परा में जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। उनके जीवन के जब चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं, उससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य भगवान शिव के अवतार थे। जिस तरह से भगवान शिव की आराधना करने के बाद शिवगुरु ने पुत्र-रत्न पाया था, इसीलिए उन्होंने पुत्र का नाम शंकर रखा। जब ये तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। ये बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड विद्वान बन गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं, माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया, तब इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्य जी ने अपनी माँ से कहा था कि- " माँ मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जायेगा, इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी बनने की आज्ञा प्रदान कर दी और सबसे आश्चर्य की बात यह है की, जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे तुरन्त मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर छोड़ दिया।"

सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

इसके बाद आठ वर्ष की अवस्था में गुरु श्री गोविन्द नाथ के शिष्यत्व को ग्रहण कर वो संन्यासी हो गये, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा के विद्वान मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में समाज में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना। इत्यादि कार्य इनके महत्व को और बढ़ा देता है। चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज के समय में भी दिग्दर्शित कर रहा है। देश में कुछ लोग शृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते है। आज उन्हीं के दिखाये मार्ग के अनुसार हिन्दू धर्म में शंकराचार्य सर्वोच्च धर्म गुरु का पद है, इस पद की परम्परा आद्य जगतगुरु शंकराचार्य ने खुद ही शुरू की थी। शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और प्रतिष्ठा के लिए भारत के 4 क्षेत्रों में जो चार मठ स्थापित किए थे। उन्होंने अपने नाम वाले इस शंकराचार्य पद पर अपने चार मुख्य शिष्यों को बैठाया था। जिसके बाद से इन चारों मठों में शंकराचार्य पद को निभाने की परंपरा लगातार चलती आ रही है।

सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

आद्य शंकराचार्य ने ही दसनामी सम्प्रदाय की स्थापना की थी। यह दस संप्रदाय निम्न प्रकार हैं - 1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर, इनके ऋषि हैं भ्रगु। 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती, इनके शांडिल्य ऋषि हैं। 7.वन और 8.अरण्य, इनके ऋषि काश्यप हैं। 9.तीर्थ और 10. आश्रम, इनके ऋषि अवगत हैं। शंकराचार्य जी ने इनकी स्थापना करके, हिंदू धर्मगुरू के रूप में हिंदुओं के प्रचार प्रसार व रक्षा का कार्य इन सभी अखाड़ों को सौपा और उन्हें अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी भी बताया था। आद्य शंकराचार्य जी के बारे में एक बात और बहुत चर्चित है कि संन्यास लेने की बात सुनकर जब उनकी माँ दुखी हो जाती थी। तो माँ को समझाते हुए छोटा बालक शंकर बोला, "माँ, तुम दुखी क्यों होती हो। देखो मेरे सिर पर तो हमेशा ही तुम्हारा आशीर्वाद रहेगा। तुम चिन्ता मत करो। तुम्हारी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर मैं उपस्थित रहूंगा और तुम्हारे पार्थिव शरीर को अग्नि देने जरूर आऊंगा"। उन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी और उसको निभाया भी।

सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य

कहते हैं कि वर्षों बाद शंकराचार्य जी अपनी माता की मृत्यु के समय वहां उपस्थित हुए और उनके शरीर को अग्नि देने के लिए आगे बढ़ना चाहा लेकिन कुछ परंपरागत सिद्धांतों के चलते ब्राह्मणों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। ब्राह्मणों द्वारा शंकराचार्यजी को रोकने का एक ही तर्क था कि वह एक संन्यासी, जो कि दुनिया की सभी मोह-माया से मुक्त होता है, उसे अपनी खुद की माँ से भी स्नेह नहीं रखना चाहिए। यह उसके संन्यासी जीवन पर अभिशाप के समान है। लेकिन तब शंकराचार्यजी ने उन्हें यह ज्ञात कराया कि उनके द्वारा ली गई प्रतिज्ञा उनके संन्यासी जीवन का हिस्सा नहीं थी। वह अपनी माँ को दी गई प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए अग्नि अर्पित करने आए हैं। तत्पश्चात सभी ब्राह्मणों ने उन्हें ऐसा करने की आज्ञा प्रदान की। बाद में शंकराचार्य जी ने अपने घर के सामने आगंन में ही अपनी माँ के शव को अग्नि अर्पित की थी। कहा जाता है कि शंकराचार्य जी द्वारा इस प्रकार घर के सामने अंतिम संस्कार करने के बाद ही केरल के इस क्षेत्र में भविष्य में उनके कुल के लोगों में घरों के सामने ही अंतिम संस्कार करने की रीति आरंभ हो गई। यह रीति आज भी इसी तरह से चल रही है। शंकराचार्य जी ने लोगों को योग का महत्व बताया, ईश्वर से जुड़ने के तरीको का वर्णन और महत्व बताया। देश में उक्त सभी कार्य को सम्पादित करके सनातन धर्म के रक्षक जगतगुरु आद्य शंकराचार्य जी मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में 820 ई. में केदारनाथ के समीप ब्रह्मलीन हो गये थे।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

{quiz_38}

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+