Pragyan Rover: चंद्रयान का रोवर प्रज्ञान, बन गया भारत की शान

Pragyan Rover: 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कामयाब लैंडिंग करने वाला रोवर प्रज्ञान गहरी नींद में चला गया है। शनिवार को इसरो ने जानकारी दिया कि चंद्रमा की सतह पर 100 मीटर का सफर करने के बाद रोवर प्रज्ञान स्लीप मोड में चला गया है। अब चंद्रमा पर होनेवाली 14 दिन की रात तक वह गहरी निद्रा में रहेगा। पंद्रहवें दिन चंद्रमा पर जब दोबारा सूर्योदय होगा और प्रज्ञान भीषण सर्दी को सहकर बचा रह जाता है तो आगे की खोजबीन जारी रखेगा। तब की स्थिति चाहे जो हो लेकिन प्रज्ञान अपने मिशन में कामयाब तो हो ही चुका है।

बुधवार को प्रज्ञान द्वारा, इसमें लगे नेवीकैम (नेवीगेशन कैमरा) से भेजी गई विक्रम की तस्‍वीर ने हमें एक नए उल्‍लास और उत्साह से भर दिया था। लेकिन हमारे हर्ष की असल वजह ये सेल्फी नहीं, बल्कि वे उपलब्धियाँ हैं, जो इस संक्षिप्त सफर में प्रज्ञान ने अपने खाते में दर्ज की हैं। नए अवतार में प्रज्ञान और विक्रम, दोनों ने ही बेहद उत्‍कृष्‍ट प्रदर्शन किया है। इन्होंने उन सारी आशंकाओं और अवसाद को दूर कर दिया है, जो चार साल पहले के चंद्रयान-2 अभियान की नाकामी की वजह से, हमारे भीतर घर किए हुए था।

isro Chandrayaan 3 Pragyan Rover became Indias pride

प्रज्ञान ने चंद्रमा की चट्टानों और मिट्टी में मौजूद रासायनिक तत्वों की पहचान करने में सक्षम, लेजर-इंड्यूस्‍ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से दक्षिणी ध्रुव पर ऑक्सीजन के अलावा एल्यूमीनियम, कैल्शियम, आयरन, क्रोमियम, टाइटेनियम, मैगनीज, सिलिकॉन और सल्‍फर (गंधक) की उपस्थिति का पता लगाया है। किसी ग्रह या उपग्रह की सतह पर या मिट्टी में कुछ खनिजों और वातावरण में कुछ गैसों की मौजूदगी बहुत असामान्‍य नहीं है। लेकिन, अगर कहीं सल्‍फर और ऑक्‍सीजन जैसी चीजों की मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी हो और हाइड्रोजन पाए जाने की पूरी संभावनाएं हों तो यह बेहद उम्‍मीद और उत्‍साह जगाता है। इसकी वजह यह है कि पृथ्‍वी पर जीवन के अस्तित्‍व और विकास में इन तीनों की काफी महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। इसीलिए प्रज्ञान के हर कदम पर विश्‍व भर के वैज्ञानिकों की नजर थी।

हालांकि, प्रज्ञान की भी कुछ सीमाएं हैं। पृथ्‍वी से नियंत्रित है, इसलिए उसकी रफ्तार भी काफी कम थी इसलिए उसने मात्र 100 मीटर की दूरी ही तय की। दरअसल, इसे चांद की सतह पर एक से दूसरे पॉइंट तक ले जाने की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है। इसमें ऑनबोर्ड नेविगेशन कैमरे से मिले डेटा को कंट्रोल सेंटर में डाउनलोड कर इससे एक डिजिटल एलिवेशन मॉडल बनाना और कौन सा रास्ता लेना है, यह निर्धारित करके प्रज्ञान को फॉलो करने के लिए कमांड देना शामिल है। इसके मूवमेंट की सीमा यह है कि कैमरा हर बार जो इमेज भेजता है, उससे अधिकतम पांच मीटर तक काम करने वाला मॉडल ही बनाया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि जब भी इसे चलने का कमांड दिया जाता था तो वह पांच मीटर से अधिक दूरी तय नहीं कर सकता था। इसमें भी टीम को इसके दो पूर्ण संचालनों के बीच लगभग पॉंच घंटे का अंतराल रखना पड़ता था।

चंद्रमा की सतह पर उतरने वाले पहले भारतीय और इसके दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करने वाले विश्‍व के पहले लूनर रोवर होने का गौरव पाने वाले प्रज्ञान को चंद्रमा की सतह, उसकी संरचना, वहॉं मौजूद खनिजों, तत्‍वों और पारिस्‍थातिकी से संबंधित डेटा एकत्रि‍त करने के उद्देश्‍य से डिजाइन किया गया था। प्रज्ञान, लेजर-इन्‍ड्यूस्‍ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोमीटर, एक अल्फा पार्टीकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर और पैनोरमिक कैमरे जैसे कई वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित था। इनके जरिए यह उन लक्ष्‍यों को हासिल करने में लगा रहा जिनके लिए इसे चंद्रमा पर भेजा गया है।

प्रज्ञान ने प्रथम चरण के अभियान के दौरान जिन नौ तत्‍वों की खोज की है, उनमें ऑक्सीजन तो अहम है ही, लेकिन सल्‍फर की मौजूदगी, बेहद आशान्वित करने वाली है। क्योंकि इससे चांद की संरचना और विकास के बारे में काफी उपयोगी जानकारियॉं मिल सकती हैं। सौर मंडल में सल्‍फर का पाया जाना बेशक सामान्‍य है, लेकिन चंद्रमा पर यह एक दुर्लभ घटना है। इससे दक्षिणी ध्रुव पर वाटर आइस होने का संकेत मिलता है, जो तीन कारणों से काफी मायने रखता है।

एक, सल्‍फर से भविष्‍य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए ईंधन और ऑक्‍सीजन उत्‍पन्‍न की जा सकती है। दूसरे, इसमें जीवाणुओं की मौजूदगी हो सकती है, जो पृथ्‍वी इतर जीवन होने का प्रमाण बन सकते हैं। तीसरा, इस वाटर आइस को भविष्‍य में चंद्रमा पर आने वाले या आकर रहने वाले मनुष्‍यों के लिए पेयजल के स्रोत के रूप में इस्‍तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, सल्‍फर का संबंध ज्‍वालामुखीय गतिविधियों से भी होता है। इससे चंद्रमा पर ज्‍वालामुखीय गतिविधियों के इतिहास को समझने में भी सहायता मिल सकती है। अप्रत्‍याशित रूप से यहॉं सल्‍फर का मिलना दर्शाता है कि यहॉं अतीत में ऐसी काफी गतिविधियॉं होती रही होंगी। अभी वैज्ञानिक इस सल्‍फर के स्रोत की जॉंच कर रहे हैं कि यह वहॉं स्‍वाभाविक रूप से मौजूद है या किसी ज्‍वालामुखी के फटने अथवा उल्‍कापिंड के गिरने से वहॉं आई है।

घुमंतू प्रज्ञान रोवर के अलावा उसके स्थिर साथी विक्रम लैंडर ने भी इन खोजों में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके चेस्‍ट (दस टेम्‍परेचर सेंसरों से युक्‍त, कंट्रोल्‍ड पेनेट्रेशन मैकेनिज्‍म वाला चंद्र सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट, जो सतह के नीचे दस सेमी की गहराई तक पहुंचने में सक्षम है) के जरिए हमें जो पता चला है, वह तो अद्भुत रूप से अविश्वसनीय है। चंद्रमा की सतह के तापमान व्‍यवहार को समझने के लिए विकसित चेस्‍ट द्वारा प्राप्‍त जानकारियों के आधार पर एक टेम्‍परेचर ग्राफ तैयार किया गया। इसमें पाया गया कि चंद्रमा की ऊपरी सतह और सिर्फ दो-तीन सेंटीमीटर की गहराई पर, तापमान में करीब पचास डिग्री सेंटीग्रेड का अंतर है। जबकि धरती पर यह अंतर मुश्किल से दो या तीन डिग्री ही रहता है।

दूसरी महत्‍वपूर्ण बात इससे यह पता चली कि चंद्रमा की सतह के ऊपर तापमान, वैज्ञानिकों के अनुमान 20 से 30 डिग्री से बहुत ज्‍यादा, लगभग 70 डिग्री सेंटीग्रेड है, सतह का 50 डिग्री और 80 मिमी नीचे की भीतरी सतह का तापमान, शून्‍य से माइनस दस डिग्री तक पाया गया। तापमान का यह बड़ा अंतर हैरान करने वाला है और चंद्रमा की सतह के नीचे ग्‍लेशियरों की मौजूदगी की संभावना जगाता है। चंद्रमा की सतह को धूल और चट्टान के कणों के मिश्रण, जिसे रिगोलिथ कहते हैं, ने किसी सुरक्षा कवच की तरह ढका हुआ है। हो सकता है कि कभी यहॉं के दक्षिणी ध्रुव पर भी पृथ्‍वी के दक्षिणी ध्रुव की तरह बर्फ रही हो, जिस पर रिगोलिथ की परत चढ़ती चली गई हो।

पंद्रह साल पहले का हमारा चंद्रयान-1 मिशन भी दक्षिणी ध्रुव पर पानी के बर्फ के रूप में मौजूद होने की संभावनाएं जता चुका है। तभी से दक्षिणी ध्रुव पर विश्‍व भर की अंतरिक्ष एजेंसियों की दिलचस्‍पी बढ़ गई है। वहॉं ऑक्‍सीजन होने की पुष्टि के बाद अब हाइड्रोजन की तलाश इसलिए मायने रखती है, क्‍योंकि पृथ्‍वी पर अगर जीवन है तो वह ऑक्‍सीजन और पानी की वजह से ही है। पानी बनता है हाइड्रोजन और ऑक्‍सीजन के अणुओं के मिलने से। चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी और इसकी अवस्‍था के बारे में अभी सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह तरल रूप में भी हो सकता है, बर्फ के रूप में भी और हाइड्रोजन व ऑक्‍सीजन के अलग-अलग यौगिकों के रूप में भी।

अब वैज्ञानिकों को 20 सितंबर की प्रतीक्षा रहेगी क्योंकि उसी दिन चंद्रमा पर एक पखवाड़े की रात खत्म होगी। इस दौरान चंद्रमा पर माइनस 180 से माइनस 250 डिग्री की सर्दी पड़ेगी। अगर प्रज्ञान इस सर्दी को सहकर बच जाता है और दोबारा सक्रिय हुआ तो आगे खोजबीन जारी रखेगा। इसमें हाइड्रोजन की खोज सबसे प्रमुख होगी। प्रज्ञान इसमें सफल हुआ तो यह भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्‍व के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इससे भविष्‍य के चंद्र अभियानों के लिए जारी तैयारियों और अनुसंधानों की तस्‍वीर पूरी तरह बदल सकती है। इससे इंसान के चॉंद पर बस्‍ती बसाने के सपने को हकीकत में बदला जा सकेगा।

बहरहाल चंद्रयान 3 मिशन के दौरान अंतरिक्ष अन्वेषण में हमारी बढ़ती क्षमताओं का प्रमाण देते हुए प्रज्ञान ने अपनी खोजों से पूरी दुनिया में भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। वर्ष 1969 के बाद से अभी तक अमेरिका, सोवियत संघ (अब रूस), चीन और जापान जैसे देशों के कुल 11 मानवरहित व मानवयुक्‍त अंतरिक्ष यान चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतर चुके हैं। यह सही है कि चंद्र-यात्राओं की सफलता में इन अभियानों ने एक बड़ी भूमिका निभाई है। उनके द्वारा पृथ्‍वी पर लाए चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों के नमूनों ने काफी हद तक चंद्रमा को जानने में हमारी सहायता की है। लेकिन, वहॉं उसकी जमीन पर रहकर, उसे इतने विस्‍तार और गहराई से समझने का संभवत: यह पहला अवसर है।

चंद्रयान-3, प्रज्ञान और विक्रम ने हमें आगामी अंतरिक्ष अभियानों की दृष्टि से एक बार फिर से अग्रणी होने का अवसर दिया है। इनके द्वारा एकत्रित डेटा अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ताओं के लिए बहुत मूल्‍यवान है। यह अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को चंद्रमा के निर्माण और विकास को बेहतर ढंग से समझने और उन्‍हें भविष्य के चंद्र अभियानों की योजना बनाने में मदद करेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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