Israel: एक राष्ट्र की कसौटी पर इजरायल
इजरायल के लिए युद्ध व संघर्ष कोई नई बात नहीं है। 1940 के दशक के मध्य में हंगरी, पोलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया के यहूदियों को किन-किन यातनाओं से गुज़रना पड़ा, 1948 में स्वतंत्र होने से लेकर आज तक उसने किन-किन संघर्षों का सामना किया, यह दुहराने की आवश्यकता नहीं। पूरी दुनिया देख रही है कि इजरायल और फिलीस्तीन के मध्य जारी युद्ध के दौरान वहाँ के मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्षी दल के सभी नेता इस बात पर एकमत हैं कि उनका सबसे पहला और सबसे बड़ा दायित्व उनके राष्ट्र पर आए संकटों का डटकर सामना करना है।

उसके राजनेता और नागरिक हमास के ताजा हमले के खिलाफ एकजुट हैं। वो अपने देश और अपनी सरकार के साथ हर हाल में दृढ़ता एवं मज़बूती से समवेत खड़े हैं। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध - सभी राष्ट्र के लिए अपना जीवन दाँव पर लगाने को तैयार हैं। यहाँ तक कि जो सेवानिवृत्त हो चुके थे, जो पर्यटन या नौकरी आदि के सिलसिले में देश से बाहर थे, वे भी देश लौटकर हमास के आतंकियों से मोर्चा ले रहे हैं या मोर्चा लेने का भाव व संकल्प व्यक्त कर रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली भी सैनिक के रूप में देश की सीमाओं की सुरक्षा कर चुके हैं। इजरायली रक्षा मंत्री योव गैलेंट की अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाते हुए, उन्हें आवश्यक निर्देश देते हुए - एक नहीं, सैकड़ों तस्वीरें वायरल हैं।
जब राष्ट्र के प्रति ऐसी अखंड निष्ठा की भावनाएँ हिलोरें लेती हैं, तब कहीं जाकर राष्ट्र सुरक्षित रहता है और उसके दुश्मनों का हौसला और इरादा पस्त होता है। 7 अक्टूबर को हमास के ताजा हमले में लंबे समय बाद इजरायल की अभेद्य एवं मज़बूत सुरक्षा-व्यवस्था में सेंध लगी है। वहाँ की इंटलीजेंस एजेंसी मोसाद हमले की आशंका को भाँपने में विफल रही है। नेतन्याहू की सरकार पर भी सवाल उठ सकते हैं पर वहाँ का कोई नागरिक, पत्रकार या विपक्षी दल का नेता संकट की इस घड़ी में अपनी सरकार पर सवालों के बौछार नहीं कर रहा। उलटे क्या पत्रकार, क्या वकील, क्या शिक्षक, क्या राजनेता - सभी अपने देश की रिजर्व सेना में सेवाएँ देने या सेना की मदद करने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं।
सोचकर देखें कि इजरायल जिन संघर्षपूर्ण स्थितियों में अपनी स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्ष यानी 1948 से ही घिरा रहा है, क्या कोई अन्य देश उन परिस्थितियों में तरक्क़ी की नई-नई इबारतें लिख सकता था? तरक्क़ी तो एक तरफ, क्या उन परिस्थितियों में सहज एवं सामान्य जनजीवन संभव था? एक समय था जब पूरा अरब जगत और आज भी लगभग अधिकांश मुस्लिम देश मज़हबी कारणों से उसके धुर विरोधी हैं।
वर्ष 1948-49, 1956, 1967, 1973, 1982 और 2006 में अनेक मुस्लिम देशों - मिश्र, जॉर्डन, इराक, सीरिया, लेबनान आदि के साथ उसे आमने-सामने का सैन्य संघर्ष करना पड़ा। कुछ वर्षों के निश्चित अंतराल पर तो उसे फिलिस्तीन का निरंतर विद्रोह झेलना पड़ा है। इन सबके बावजूद इजरायल ने तरक्क़ी की अमिट एवं मुकम्मल इबारतें लिखीं और ऐसी लिखीं कि उसे देख-सुन दुनिया सहसा चमत्कृत रह जाती है।
कहते हैं कि यहूदी जब बेबीलोन में निर्वासित जीवन जी रहे थे तो येरूशलम की याद में उसकी ओर मुँह करके रोते थे और विरह-गीत गाते थे। शरणार्थियों के रूप में दुनिया के अन्य देशों में पीड़ित-पददलित ज़िंदगी जीते हुए, आपस में मिलने पर वे अभिवादन के रूप में यह कहना नहीं भूलते थे कि ''हम पुनः येरूशलम में मिलेंगें।''
लंबी यातना व संघर्षों से गुजरने के पश्चात संयुक्त राष्ट्र की पहल पर 1948 में इजरायल के रूप में उन्हें जो भूखंड मिला, उसका लगभग 60 से 65 प्रतिशत भाग रेगिस्तानी था। पर उस रेगिस्तानी भूभाग को वहाँ के नागरिकों ने अपने खून-पसीने से सींचकर हरा-भरा बनाया। इसका परिणाम है कि आज इजरायल अपने खाद्यान्न की जरूरतों का 95 प्रतिशत हिस्सा स्वयं पैदा करता है। सिंचाईं की नई-नई तकनीक विकसित करने से लेकर बूँद-बूँद जल के संरक्षण के मामले में वहाँ के नागरिकों की कोई तुलना नहीं है। वहाँ उत्पादन बीते 25 सालों में लगभग 7 गुना बढ़ा है, पर पानी के इस्तेमाल में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।
एक यहूदी 'मुझे क्या और मेरा क्या' की भावना से परे 'राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र सर्वोपरि' की भावना से प्रेरित-संचालित होते हैं। वहाँ केवल पुरुषों ही नहीं, बल्कि महिलाओं को भी अनिवार्यतः देश के लिए सैन्य सेवाएँ प्रदान करनी होती हैं, जिन्हें वे सहर्ष स्वीकार करती हैं। अमेरिका, रूस, चीन के बाद इजरायल की वायुसेना का पूरा विश्व लोहा मानता है।
इजरायल अपने एंटी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के साथ-साथ अपने उत्कृष्ट अंतरिक्ष अनुसंधानों के लिए भी विख्यात है। वह दुनिया के उन 9 देशों में शामिल है, जिसके पास अपना उपग्रह प्रणाली (सैटेलाइट सिस्टम) है। इसका इस्तेमाल वह ड्रोन चलाने के लिए करता है। ड्रोन के बेहतरीन प्रयोग के मामले में भी वह दुनिया का अग्रणी देश माना जाता है। ब्रेल लिपि वाली करेंसी, कम्प्यूटर, वॉइस मेल तकनीक और सौर ऊर्जा के अधिकाधिक इस्तेमाल तक इजरायल ने प्रायः जीवन के हर छोटे-बड़े क्षेत्र में स्वयं को विज्ञान एवं तकनीकी से सुसज्जित कर रखा है।
इजरायल में प्रति 10,000 कर्मचारियों में 140 वैज्ञानिक और तकनीशियन हैं, जो विश्व के विकसित देशों जैसे अमेरिका में 85 और जापान 83 की तुलना में कहीं बहुत अधिक हैं। इसी तरह से इजरायल में पूर्णकालिक वैज्ञानिक पेशे को अपनाने वाले शोधार्थियों का प्रतिशत सर्वाधिक है। यहाँ प्रति दस लाख लोगों में 8500 पूर्णकालिक शोधार्थी मिलेंगे, जबकि अमेरिका में यह लगभग 4000, जापान में लगभग 5200 तथा दक्षिण कोरिया में लगभग 6500 हैं। यहाँ औसत 10 हजार की आबादी में 109 शोधपत्र प्रकाशित होते हैं।
शायद यही कारण है कि वहाँ के वैज्ञानिकों के पास नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगी हुई है। हममें से कइयों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि वहाँ के विद्यालयों में भी भौतिकी और रसायनशास्त्र जैसे विषयों में नोबल पुरस्कार को ध्यान में रखकर प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। जनसंख्या के अनुपात में वहाँ सबसे अधिक विश्वविद्यालय हैं।
सिलिकॉन वैली के बाद सूचना एवं प्रौद्योगिकी का सबसे बड़ा हब इजरायल ही है। वह स्टार्टअप्स का भी केंद्र है। दुनिया के कई बड़े स्टार्टअप्स वहीं शुरु हुए। अब तक लगभग 3,000 से अधिक सफल स्टार्टअप्स वहाँ शुरु हो चुके हैं। विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में उत्कृष्टतम
उपलब्धियाँ हासिल करने के साथ-साथ वे पर्यावरण के प्रति भी अत्यंत संवेदनशील, सजग एवं सतर्क हैं। वह विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ वृक्षों की संख्या बीसवीं शताब्दी की तुलना में इक्कीसवीं शताब्दी में अधिक है।
अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए कई देशों में आज भी भाषाई दासता या औपनिवेशिक मानसिकता के कई चलन व चिह्न दिखाई दे जाते हैं। परंतु इजरायल और वहाँ के नागरिकों ने एक समाप्तप्राय एवं अपेक्षाकृत जटिल भाषा हिब्रू को अपनी राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित कर वैश्विक पहचान दिलाई। उल्लेखनीय है कि मध्यकाल में हिब्रू भाषा का अंत-सा हो गया था। परंतु मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति अतिशय सम्मान के भाव ने हिब्रू को पुनर्जीवन देने का काम किया। इजरायल की घोषित नीति है कि पूरी दुनिया में अगर कहीं भी कोई यहूदी रहता है तो वह इजरायल का नागरिक माना जाएगा।
स्मरण रहे कि किसी भी राष्ट्र की सुदृढ़ आधारशिला, वांछित प्रगति व वैश्विक पहचान ठोस एवं यथार्थ नीतियों की नींव पर टिकी होती है। इस मानक पर अगर इजरायल को परखें तो एक राष्ट्र के रूप में सौ प्रतिशत खरा उतरता है।
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