Free Ration Scheme: क्या गरीबी और भुखमरी का समाधान है मुफ्त राशन योजना?
वर्ष 2014 के चुनाव से 1 साल पूर्व कांग्रेस खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक लेकर आई थी। अब 2024 के चुनाव तक मोदी सरकार 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन वितरित करना जारी रखेगी। क्या यह भारत में गरीबी और भुखमरी का समाधान है?

Free Ration Scheme: सबको और सदा के लिए अनिवार्य भोजन का आदर्श लक्ष्य अभी भी दूर की कौड़ी है। इस निमित्त कारगर उपाय करने की बजाय केंद्र सरकार ने सात चरणों तक प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना चलाकर गरीब परिवारों को प्रतिमाह प्रति सदस्य 5 किलो अनाज मुफ्त बांटा। अब उस योजना की जगह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत 31 दिसंबर 2023 तक 81.35 करोड़ गरीबों को पहले की तरह मुफ्त राशन देने का फैसला किया है। इससे केंद्र सरकार पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का अधिक खर्च आएगा।
लगातार बढ़ती ब्याज दर और आसन्न कोरोना महामारी से सुस्त पड़ी कमाई के मद्देनजर यह राहत भरा फैसला है। लेकिन योजना के विस्तार की टाइमिंग, अतिरिक्त बजट बोझ के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचा आदि के बजट में कटौती होने की चिंता के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक लाभ लेने की आशंका भी जताई जा रही है। वहीं यह भी आलोचना की जा रही है कि 20 से 25 रुपए प्रति किलो की लागत से पैदा होने वाले अनाज को मुफ्त में बांटने का फैसला कहीं किसानों के हाथ में कटोरा थमा देने वाला न साबित हो जाए?
प्रश्न है कि भोजन का अधिकार वैधानिक अधिकार है, मौलिक अधिकार है, या मानव अधिकार है? भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (सम्मान से जीवन का अधिकार) 39(ए) और 47 से जोड़ते हुए एक मौलिक अधिकार माना है। नीति निर्देशक तत्व में भी पोषण और जीवन स्तर बेहतर करने के निर्देश राज्यों को दिए गए हैं। कहा गया है कि राजकोष का खर्च बहुत भारी हो तब भी भूख मिटाना प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। इस दृष्टिकोण से मुफ्त अनाज देने की सीमा एक साल आगे बढ़ाने का निर्णय अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत में फ्री अनाज देने की योजना दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे अधिक समय तक चलने वाली योजना हो गई है।
भोजन के अधिकार के प्रति भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि भोजन मुफ्त में दिया जाना चाहिए। आज हम जिस आजादी का अमृत काल मना रहे हैं वह आजादी बंगाल के भीषण अकाल की पृष्ठभूमि में मिली थी। 1942 -43 के दौरान पड़े अकाल में 30 लाख बच्चे, महिलाएं और पुरुष भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर मर गए थे।
इसी तरह कोरोना महामारी के दौरान शहरों से गांव की ओर पलायन कर रही एक बड़ी आबादी दाने-दाने को मोहताज हो गई थी। संपूर्ण लॉकडाउन के कारण अधिकांश घरों के चूल्हे कई दिनों तक उदास रहे । भारत जीवन यापन के संकट को व्यापक खाद्य संकट में नहीं बदलना चाहता था इसलिए कोरोना के कारण प्रधानमंत्री मुफ्त अनाज योजना की शुरुआत अप्रैल 2020 में हुई थी। इससे गरीबों को बहुत सहारा मिला और वर्तमान की खाद्य मुद्रास्फीति के दौर में महंगे अनाज की खरीद से भी करोड़ों परिवारों को बचाया है। क्योंकि खाते में भेजी जाने वाली निर्धारित राशि भी लाभार्थी को मुद्रास्फीति से नहीं बचा पाती।
आम आदमी को भोजन के लिए राशन उपलब्ध कराने हेतु सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) 1939 में तब के मुंबई राज्य में शुरू हो गई थी। बाद के सालों में इसका दायरा बढ़ा और 1977 में जनता पार्टी के शासन के दौरान अखिल भारतीय स्तर तक इसका विस्तार फैला और इसमें उदारता भी आई।
लेकिन तथ्य यह भी है कि तमाम अनियमितताओं के कारण या आज तक यह पूर्णतया फलीभूत नहीं हो पाई है। फ्री का राशन उठाकर चोर बाजार में बेचे जाने की घटनाएं आम है। पीडीएस दुकानदारों द्वारा राशन कार्ड की धांधली बदस्तूर जारी है। ऐसे में आजादी के अमृत काल और 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले फ्री अनाज देने के निर्णय की उपादेयता को लेकर तरह-तरह के तर्क दिये जा रहे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सियासी फितरत करने वालों ने भोजन को हमेशा राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। केरल में निराश्रित बूढ़ों के नाम पर फ्री चावल देना, आंध्र प्रदेश में भूखा ना सोने देने का संकल्प करना, कर्नाटक, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में एक रुपए किलो चावल देना, तमिलनाडु में 20 किलो चावल मुफ्त देना, बिहार और उड़ीसा में मात्रा कम व्यापकता ज्यादा का ऐलान करना, गुजरात में एपीएल का हिस्सा बीपीएल को, पंजाब की आटा दाल योजना, मध्यप्रदेश में पीडीएस से भी सस्ता तो बंगाल में ममता की मुफ्त ममता आदि के अनेकों उदाहरण है, जहां शासन करने वालों ने मुफ्त भोजन को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। कोरोना के दौरान दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने मुफ्त भोजन के नाम पर राजनीतिक फायदा उठाने की बेइंतहा कोशिश में केंद्र सरकार से टकराव भी मोल लिया था।
दरअसल मुफ्त अनाज देना कोई समाधान नहीं है। सरकारों को राजनीतिक हित तलाशने की जगह मजबूत उपाय करने चाहिए। बुनियादी ढांचा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तभी देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। देश की बड़ी आबादी को मुफ्त में अनाज मिलेगा तो उनमें से अधिकांश 'ठलुआ क्लब' में शामिल हो जाएंगे। बिना काम किए खाना मिल जाए तो मेहनत क्यों करेंगे?
आंकड़ों पर गौर करें तो देश में 62% लोगों की जीविका कृषि पर निर्भर है। उद्योग और सेवा क्षेत्र की लगभग 50% मांग गांव से आती है। गांव और कृषि का ढांचा मजबूत करने से गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी और महंगाई की समस्याएं कम होंगी। पलायन रुक जाएगा। पर विडंबना यह है कि सरकारें मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर अपना राजनीतिक लाभ लेती रही हैं। एक बात समझ से परे है कि सरकार दावा करती है कि देश में सिर्फ 20 करोड़ आबादी ही गरीबी रेखा के नीचे है तो फिर 81.35 करोड़ आबादी को मुफ्त भोजन देने का आखिर मकसद क्या है?
इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं है। सरकार रेवड़ी बांट कर वोट बैंक मजबूत करना चाहती है। मुफ्त अनाज योजना की अवधि पहले ही 7 बार बढ़ाई गई। अब यह अवधि 31 दिसंबर 2023 तक रहेगी। हाल में हिमाचल और गुजरात विधानसभा के चुनाव से पहले इसे 3 महीने के लिए बढ़ाया गया था। इससे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भी मुफ्त की इस योजना को विस्तार दिया गया था। इस बात के ठोस सबूत है कि इस तरह की योजना से सत्तारूढ़ दल को चुनावी लाभ मिलता है।
जरूरी बात यह है कि अवधि बढ़ोतरी के बाद कुल मिलाकर इस अन्न योजना पर साढे छह लाख करोड़ का खर्च होगा। तेल की कीमतें बढ़ने के कारण इस साल खाद्य अनुदान की राशि बढ़ेगी, जिसका वजन बजट आवंटन पर भी पड़ेगा। ऐसे में सवाल है कि क्या मुफ्त अन्न योजना की खातिर देश की जनता को और अन्य त्याग करने होंगे? क्योंकि वित्तीय दबाव के कारण सरकार को अग्निपथ योजना की राह पकड़नी पड़ी थी, हवाई अड्डों से अर्धसैनिक बलों की संख्या कम करनी पड़ी है, क्या आगे इसके लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचा, पेंशन आदि में कटौती होगी? क्योंकि सरकार आने वाली कठिन चुनौतियों से भाग नहीं सकती।
Recommended Video

यदि आर्थिक वृद्धि धीमी होती है, अपेक्षित कर संग्रह नहीं हो पाता है तथा कल्याण की योजनाओं पर खर्च बढ़ता है तो हिसाब संतुलित करना आसान नहीं होगा। ब्याज दरें बढ़ने से सरकार का उधार लेना भी महंगा होगा। जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात बढ़ा है। ब्याज पर साढे सात लाख करोड़ तक खर्च हो सकता है। मिड डे मील योजना, गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण योजना पर भी लाभार्थियों का दावा बनता है। इन परिस्थितियों में फ्री राशन योजना के वित्तीय बोझ के साथ संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
यह भी पढ़ें: PMGKAY: '80 करोड़ लोगों को मिलता रहेगा मुफ्त अनाज', जानें पूरी डिटेल्स
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
Bihar News: “चईत मासे बोलेले कोयलिया हो रामा, मोर अंगनवा” से गूंजा बिहार म्यूजियम, महिला दिवस पर संगोष्ठी और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित -
MP News: न्यूजीलैंड पर भारत की शानदार जीत, मुख्यमंत्री मोहन यादव बोले—हमारे खिलाड़ी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ -
पारादीप में इफको के सल्फ्यूरिक एसिड प्लांट-III का लोकार्पण, सहकारिता संगोष्ठी में बोले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह -
Petrol Shortage India: होर्मुज को लेकर पेट्रोल-डीजल की कमी? BPCL ने अफवाहों पर लगाई ब्रेक, कहा-पर्याप्त ईंधन -
टीम इंडिया की ऐतिहासिक जीत पर अमिताभ बच्चन ने ये क्या कह दिया? लोगों ने किया ट्रोल, बोले- आप मैच मत देखिए -
Dubai Gold Rate Today: ईरान-इजराइल युद्ध के बीच दुबई में सोने की कीमत में लगी आग, 9 मार्च का क्या है रेट? -
Parliament Today: संसद में गूंजेगा 'ईरान-अमेरिका', लोकसभा में बोलेंग विदेश मंत्री, क्या है विपक्ष की तैयारी -
Weather Delhi NCR: दिल्ली में मौसम का डबल अटैक! अगले 24 घंटों में आने वाला है नया संकट, IMD ने जारी किया अलर्ट -
क्या जिंदा है खामेनेई? दुनिया को दिया गया धोखा? पूर्व जासूस का दावा- 2-3 लोगों को पता है सुप्रीम लीडर कहां हैं -
Silver Price Today: चांदी में बड़ी गिरावट! 29000 रुपये सस्ती, 36 दिन में ₹1.25 लाख गिरे दाम, क्या है रेट? -
तो इसलिए बदले जा रहे CM, गवर्नर–सीमांचल से नया केंद्रशासित प्रदेश? नया राज्य या UT बनाने के लिए क्या है नियम? -
IPS LOVE STORY: प्यार के आगे टूटी जाति की दीवार! किसान का बेटा बनेगा SP अंशिका वर्मा का दूल्हा












Click it and Unblock the Notifications