Indian Economy: दुनिया में मंदी का डर, लेकिन भारत में विकास का विश्वास क्यों?
31 जनवरी 2023 से संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला है। इस बजट सत्र में वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे कार्यकाल का आखिरी बजट पेश करेंगी। वैसे तो यह एक अंतरिम बजट ही होगा लेकिन कई बार इसका उपयोग करों में कटौती करने या फिर खास मतदाता समूहों को लुभाने के लिए खर्च बढ़ाने के रूप में सरकारें करती रही है।
माना जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस साल भी पिछले वर्ष के अच्छे परिणाम को जारी रख सकती है, क्योंकि देश को राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक नीति की स्थिरता और निवेशकों की चीन प्लस वन रणनीति का पूरा-पूरा लाभ मिल रहा है।

आर्थिक जानकारों के मुताबिक साल 2024 भारतीय अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और रुपए के लिए बीते वर्षों से कुछ अधिक ही अच्छा साबित होने वाला है। घरेलू और वैश्विक दोनों स्तर पर सभी कारक भारत के लिए इस समय सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। इस साल दुनिया भर के 70 से अधिक देशों में आम चुनाव होने वाले हैं। भारत में भी मई 2024 तक 18 वीं लोकसभा का चुनाव संपन्न होना है। ऐसे में देश में भी बड़े पैमाने पर राजनीतिक सरगर्मी और कई अपेक्षित बदलाव किए जाने की भरपूर संभावनाएं है।
हालांकि दुनिया के स्तर पर वर्ष 2024 में मंदी की आशंका भी जताई जा रही है, पर भारत अपनी अर्थव्यवस्था में तेज सुधार के साथ-साथ वृद्धि दर को उच्च बनाए रखने के लिए मजबूत आधार तैयार करने का सतत प्रयास कर रहा है। वास्तविक विकास के आधार पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 6.5% वृद्धि दर का अनुमान है जबकि नॉमिनल आधार पर 11% का अनुमान लगाया जा रहा है।
लगातार कमजोर हो रहे डॉलर और विश्व बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल स्थिति बनती हुई दिख रही है। लगातार बढ़ते प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर, मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण, राजकोषीय घाटे पर काबू, चालू खाता घाटा और रुपए की बढ़ती स्वीकार्यता जैसे मानकों पर भारत इस समय सच्चे अर्थों में "आर्थिक अमृत काल" का आनंद ले रहा है।
सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, जल मार्ग आदि के क्षेत्र में बुनियादी ढांचों को बढ़ावा देने से निजी पूंजी व्यय में भारी वृद्धि की उम्मीद है। मालूम हो कि बुनियादी ढांचे पर खर्च किए गए प्रत्येक रुपए का आर्थिक उत्पादन या सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि पर 4 से 6 गुना प्रभाव पड़ता ही है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह भी है कि क्या सार्वजनिक निवेश में यह तेजी निजी क्षेत्र द्वारा नई क्षमता वृद्धि को बढ़ावा देगी जिसकी प्रतिक्षा लंबे समय से की जाती रही है। पिछले एक दशक के दौरान आर्थिक तौर पर कई नारे भी उछाले गए। काला धन वापसी के साथ-साथ प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन की बात भी प्रमुखता से की गई। कॉर्पोरेट क्षेत्र का कर्ज कम करने और बैंक बैलेंस शीट को साफ करने में भी हमें अपेक्षित मदद नहीं मिली।
हालांकि अभी साल्वेंसी संकट जैसी कोई आशंका नहीं है, क्योंकि अधिकांश कर्ज घरेलू निवेशकों के पास है। अब आवासीय निवेश बढ़ रहा है जो न केवल अर्थव्यवस्था के साथ इसके जुड़ाव के लिए अहम है बल्कि रोजगार पैदा करने की क्षमता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
इस साल अप्रैल-मई में होने वाले संसदीय चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन जिस विश्वास के साथ एक और कार्यकाल हासिल करने का दम भर रहा है, उससे आर्थिक नीतियों की निरंतरता की संभावना भी बढ़ गई है जिसका सीधा असर बाजार की गतिविधियों पर होना ही है।
कई अर्थशास्त्रियों ने संभावना जताई है कि अगले कुछ सालों तक कॉर्पोरेट आय की वृद्धि दर 14 से 15 प्रतिशत तक बनी रहेगी। शेयर बाजार के सूचकांक में हो रहे उछाल से इसे सहज ही समझा जा सकता है जो कि वर्ष 2023 में रिकॉर्ड 73000 के स्तर पर पहुंच गया और आशा की जा रही है कि आने वाले दिनों में भी शेयर बाजार की यह रफ्तार और अधिक गति पकड़ सकती है। इसके साथ ही वैश्विक बॉन्ड सूचकांक में भारत के शामिल होने से भारतीय बॉन्ड बाजारों में भी दीर्घकालिक विदेशी फंडों का प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है। इससे धन जुटाने की लागत तो कम होगी ही, भारतीय बॉन्ड बाजार भी समृद्ध होगा।
बाजार के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार वर्ष के अंत तक भारत के 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड पर रिटर्न लगभग 6.6 से लेकर 6.75 प्रतिशत पर स्थिर रहने की उम्मीद है। विदेशी निवेश के अधिक प्रवाह और कमजोर अमेरिकी डॉलर से भारतीय रुपए को डॉलर के मुकाबले बढ़त पाने में मदद मिलेगी। हालांकि रुपए को विश्व स्तर पर स्वीकृत आरक्षित मुद्रा बनने में अभी कई बाधाओं को पार करना है, लेकिन मध्य पूर्व एवं अफ्रीकी देशों के साथ हुए व्यापार के द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय समझौतों से इस दिशा में भी काफी प्रगति हुई है।
चूंकि बीते 5 साल अधिक पारदर्शी लेखांकन, समग्र नीति और यथार्थवादी दृष्टिकोण के रहे इसलिए सरकार अपने राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के करीब बनाए रखने में कामयाब रही है। हालांकि कोविड महामारी के दौरान इसमें बड़े स्तर पर अंतर देखा गया था, जब देश का राजकोषीय घाटा बजट अनुमान से 6% अधिक हो गया था। मगर बाद में धीरे-धीरे स्थिति संभल गई। यह उत्पादन और महंगाई के संयोजन से संभव हुआ है।
सरकार ने लगातार यह सुनिश्चित किया कि खजाने में कर संग्रह का लक्ष्य हर हाल में पूरा किया जाना चाहिए। पिछले तीन वर्षों में करों में मजबूत वृद्धि ने न सिर्फ सरकार को अपनी उधारी पर नियंत्रण रखने में सहायता पहुंचाई, बल्कि उसे बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाने का मौका भी दिया है। आज के समय में राजकोषीय नीति में पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी बढ़ गई है यह राजनीतिक उपलब्धि के साथ-साथ आर्थिक उपलब्धि का भी द्योतक है।
कुल मिलाकर सरकार बीते साल राजकोषीय घाटे के लिए निर्धारित लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद की 5.9 प्रतिशत तक सीमित रखने में सफल रही है। बाजार में उपभोक्ता मांग में तेजी और उद्योग कारोबार में बेहतरी से वस्तु एवं सेवा कर संग्रह में भी वृद्धि हुई है। एक वर्ष के अंदर कर संग्रह 12% बढ़ा है।
अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कर संग्रह बजट अनुमान से 10.4% अधिक बढ़कर 36.6 लाख करोड़ रुपए तक का हो जाएगा। भारत सरकार द्वारा की गई जी-20 की सफल अध्यक्षता से नए आर्थिक लाभों की संभावनाओं के दरवाजे खुले हैं जिसके जरिए भारत से निर्यात, भारत में विदेशी निवेश और भारत के डिजिटल विकास का नया आसमान सामने दिखाई दे रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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