India US Relations: भारत अमेरिका मित्रता से वामपंथी लॉबी दुखी क्यों?
India US Relations: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका दौरा एतिहासिक रहा| अमेरिका के साथ दोस्ती नए आयाम पर पहुंची है, यह दोस्ती दोनों देशों के लोकतांत्रिक माहौल में मेल भी खाती है| हमारी अमेरिका से दोस्ती का सीधा असर भी चीन पर होगा, क्योंकि यह दोस्ती चीन की कीमत पर ही हो रही है और हम अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में चीन और रूस समर्थक वामपंथी स्लीपिंग सेल ही नहीं, बल्कि एक्टिव सेल हैं, जो देश के भीतर भी माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करेंगे ही|
भारत साठ सत्तर के दशक वाला देश नहीं रहा, जब देश सोवियत संघ के हिसाब से ही सोचता था| सोवियत संघ भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों को तो पैसा भेजता ही था, कांग्रेस नेताओं को भी पैसा भेजता था, ताकि सरकार अमेरिका के पाले में न चली जाए| इस तरह देश में एक भ्रष्ट व्यवस्था का जन्म हो गया था, जो विचारों की दृष्टि से भी दिमाग के दरवाजे बंद कर चुकी थी| खुला सोचने वालों को सीआईए का एजेंट कह दिया जाता था|

सोवियत संघ के विघटन और बाबरी ढांचा टूटने के बाद देश में सांस्कृतिक जागृति आनी शुरू हुई, जिसमें नई पीढी के नए ढंग से सोचने की शुरुआत हुई| जिसकी परिणति 2014 में हुई, जब रूसी और चीनी विचारधारा पर आधारित कम्युनिस्ट पार्टियों को देश ने ठुकरा दिया। लेकिन इसकी शुरुआत खुद कांग्रेस ने 2008 में कर दी थी, जब कम्युनिस्ट समर्थन से चल रही सरकार गिरने का खतरा मोल लेते हुए मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ परमाणु ईंधन समझौता किया था| 2009 के चुनाव में कम्युनिस्टों का बंगाल किला ढह गया था, जब ममता बनर्जी ने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस से गठबंधन किया और बंगाल की 42 में से 25 लोकसभा सीटें जीत ली थीं|
2014 के बाद भारत का बदला हुआ मिजाज है, इस बदले हुए मिजाज में भारत और अमेरिका का ज्यादा नजदीक आना स्वाभाविक ही था। लेकिन अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी का मिजाज हमेशा से भाजपा विरोधी था, क्योंकि डेमोक्रेटिक पार्टी में भी वामपंथी भरे पड़े हैं| इसलिए डेमोक्रेटिक पार्टी का झुकाव कांग्रेस पार्टी की तरफ रहा है| पिछले 15 सालों में बीच के सिर्फ चार सालों को छोड़कर अमेरिका में डेमोक्रेट राष्ट्रपति है| इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डेमोक्रेट्स का दिल जीतने में थोड़ा वक्त लगा| इसी बीच अमेरिका की चीन के साथ 1971-72 से चल रही दोस्ती में बड़ी दरार पैदा हुई, जिसका फायदा भी मोदी सरकार को, या यों कहें भारत को हुआ कि दोनों देशों की निकटता बढ़ी|

अमेरिका ने 1998 के परमाणु विस्फोट के बाद भारत पर प्रतिबन्ध लगाए थे, उन प्रतिबंधों के बावजूद मनमोहन सरकार ने अमेरिका को परमाणु ईंधन समझौते के लिए तैयार कर लिया था| लेकिन 2008 के बाद फिर से गतिरोध बना हुआ था, उस गतिरोध को तोड़ने में अब सफलता मिली है| इस सफलता में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने अपनी शर्तों पर समझौता किया है, अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेके, न ही परमाणु संयत्रों की निगरानी जैसी कोई शर्त मानी, जो मनमोहन सरकार ने मान ली थी|
यह कोई छोटी मोटी सफलता नहीं है कि यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण रूस पर लगे प्रतिबंधों की अवहेलना करते हुए भारत ने रूस से तेल का आयात किया, इसके बावजूद अमेरिका ने 1998 के प्रतिबंधों को हटाते हुए जेट ईंजन की टेक्नालॉजी ट्रांसफर करना स्वीकार किया| इस से पहले अमेरिका जो भी हथियार बेचता था, उसकी टेक्नालॉजी ट्रांसफर नहीं करता था| अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने नरेंद्र मोदी के बारे में कहा था कि वह बहुत कुशल सौदेबाज (टफ नेगोशिएटर) हैं| मोदी ने बाइडेन के साथ बातचीत में भी अपनी टफ नेगोशिएटर वाली कला दिखाई है|
मोदी सरकार ने दुनिया के हर देश के साथ टेक्नालॉजी ट्रांसफर की शर्त रखना शुरू कर दिया है, ताकि भारत में ही फेक्ट्रियां लगें| यहां नौकरी के अवसर पैदा हों, और भारत हाईटेक सामान और हथियारों का सिर्फ खरीददार न बना रहे, बल्कि उत्पादक भी बने| अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों के सदस्यों को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा भी कि जेट ईंजन की टेक्नालॉजी ट्रांसफर से दोनों देशों को फायदा होगा, दोनों देशों में रोजगार बढ़ेगा| जनरल इलेक्ट्रिक के साथ हुए एयरोस्पेस-एचएएल रक्षा समझौते के अनुसार दोनों देश मिल कर भारत में तेजस लडाकू विमान के लिए एफ-414 ईंजन तैयार करेंगे| जेट ईंजन की टेक्नालॉजी का समझौता इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभी तक यह टेक्नालॉजी अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के पास ही है| यानि इस टेक्नालॉजी के बाद भारत रक्षा मामलों में चीन से आगे हो जाएगा|
सवाल खड़ा होता है कि जब रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत अमेरिका के साथ खड़ा नहीं हुआ, इसके बावजूद अमेरिका का बाइडेन प्रशासन मोदी सरकार पर इतना मेहरबान क्यों हुआ| इसकी तात्कालिक वजह है अमेरिका-यूरोप गठबंधन के सामने रूस-चीन का गठबंधन, जो यूक्रेन-रूस युद्ध में दिखाई दे रहा है| जबकि भारत भले ही अमेरिका के साथ खड़ा नहीं हुआ, लेकिन वह रूस के साथ भी खड़ा नहीं हुआ| नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए भी यूक्रेन-रूस युद्ध की मुखालफत की, जबकि यह युद्ध अमेरिका की शह पर ही हो रहा है|
बदली अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अमेरिका की 1971 में चीन से शुरू हुई दोस्ती अब दुश्मनी में बदल चुकी है| एशिया में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए अमेरिका ने भारत के साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया है| वह चीन के मुकाबले भारत को मजबूत देखना चाहता है| मोदी-बाइडेन केमिस्ट्री को अस्थाई बताने वाले भारत के वामपंथी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि अमेरिका चीन के संबंधों में जमी बर्फ पिघल जाएगी, तब भारत का क्या होगा| उनकी दलील है कि अमेरिका चीन पर दबाव बनाने के लिए भारत का इस्तेमाल कर रहा है|
अपनी उम्मीद के पक्ष में वे हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की चीन यात्रा का तर्क देते हैं, जहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाक़ात हुई| आम तौर पर चीन के राष्ट्रपति किसी देश के विदेश मंत्री से नहीं मिलते| सवाल उठाया जा रहा है कि अगर अमेरिका के चीन के साथ संबंधों में सुधार हो जाता है, तो भारत की स्थिति क्या होगी| लेकिन क्या ऐसा अब संभव है? वैसे जब सोवियत संघ टूट सकता है, तो कूटनीति में कुछ भी संभव है, लेकिन निकट भविष्य में नहीं, क्योंकि भारत-अमेरिका की दोस्ती का मूल आधार दोनों देशों का लोकतांत्रिक होना है|
भारत- अमेरिका की यह दोस्ती 1971-72 में तब होनी चाहिए थी, जब इंदिरा गांधी ने कम्युनिस्ट सोवियत संघ से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था| 1967 के चुनावों में घरेलू राजनीति के मोर्चे पर इंदिरा गांधी कमजोर हो गई थी, इसलिए वह कम्युनिस्ट पार्टी का सहयोग लेने के लिए सोवियत संघ की तरफ झुक गई। अगर उस समय भारत-अमेरिका की दोस्ती हुई होती, तो अमेरिकन निवेश भारत में होता, और अब तक भारत विकसित देश बन चुका होता| चीन इतना विकसित नहीं होता, जितना अमेरिकन निवेश के कारण आज है| अब उल्टी गंगा बहनी शुरू हो चुकी है, भारत-अमेरिका के रिश्तों में आई गर्माहट के कारण भारत में अमेरिकन निवेश के दरवाजे खुल गए हैं|
जहां तक एंटनी ब्लिंकन की शी जिंगपिंग से मुलाक़ात का सवाल है, तो इस मुलाक़ात के बाद जो बाइडेन ने यह बयान भी दिया है कि चीन एक अलोकतांत्रिक देश है और शी जिंगपिंग एक तानाशाह हैं| जबकि भारत और अमेरिका लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर स्थाई दोस्ती की ओर आगे बढ़ रहे हैं| मोदी और एंटनी ब्लिंकन की केमिस्ट्री भी 23 जून के दोपहर भोज में दिखाई दी, जिस का आयोजन ब्लिंकन ने किया था| इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्हाईट हाउस में हुए स्वागत में राष्ट्रपति जो बाइडेन ही नहीं बल्कि मोदी ने भी दोनों देशों के संविधानों का जिक्र करते हुए दोनों देशो के लोकतांत्रिक होने का हवाला दिया|
भारत-अमेरिका की दोस्ती इंदिरा गांधी की एतिहासिक भूल का सुधार है| दुनिया जब कूटनीतिक दृष्टि से दो हिस्सों में बंटी हुई थी, भारत उस समय रूस के साथ खड़ा था| जबकि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन उस समय अमेरिका के साथ खड़े थे| अमेरिका ने दशकों तक पाकिस्तान को भारत के खिलाफ लड़ने के लिए हथियार और पैसा दिया| रूस ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया, उस समय अमेरिका ने अफगानिस्तान के आतंकवादियों को रूस के खिलाफ लड़ने के लिए पाकिस्तान के माध्यम से ही हथियार पहुंचाए| उन्हीं हथियारों का पाकिस्तान के आतंकवादियों ने भारत के कश्मीर में भी जम कर इस्तेमाल किया| बाद में अमेरिका ने भारत के खिलाफ चीन का भी इस्तेमाल किया|
अमेरिका के बौद्धिक क्षेत्र में हावी लेफ्ट विचारधारा के चलते पिछले करीब पांच दशक से भारत के हजारों वामपंथी एनजीओ को अमेरिका से जमकर पैसा आ रहा था| भले ही ये सारे एनजीओ भारत में अमेरिकी नीतियों का विरोध करते थे| अमेरिका उन्हें इसलिए पैसा दे रहा था क्योंकि अमेरिका उनसे वह काम करवाता था, जो कोई भी राष्ट्र भक्त भारतीय करने को तैयार नहीं होता| अमेरिका इनके माध्यम से भारत की विकास संबंधित परियोजनाओं के खिलाफ आन्दोलन करवाता था|
नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही इन सभी एनजीओ की पड़ताल करवाई और उनकी फोरेन फंडिंग पर लगाम लगा दी| इससे सारे वामपंथी एनजीओ जल बिन मछली की तरह छटपटा रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि अमेरिका की लेफ्ट लॉबी भी मोदी सरकार से खार खाई बैठी है| अमेरिका में भी भारत विरोधी मुस्लिम, वामपंथी और खालिस्तानी लॉबी को अमेरिकन सरकार ही हवा देती रही है| अब भारत-अमेरिका की दोस्ती के इस नए पड़ाव पर अमेरिका में भारत विरोधी ताकतों के मंसूबों पर भी पानी फिरेगा, क्योंकि उन्हें भारत विरोधी साजिशों की वैसी खुली इजाजत नहीं मिलेगी, जैसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अब तक मिली हुई थी|
इसकी झलक नरेंद्र मोदी के दौरे के समय भी मिली| यह पहली बार हुआ कि भारत के प्रधानमंत्री के अमेरिका पहुंचने के बाद खालिस्तानियों ने विरोध प्रदर्शन नहीं किया| वरना इससे पहले राजीव गांधी से लेकर सभी प्रधानमंत्रियों के खिलाफ इस तरह के प्रदर्शन होते रहे हैं| इस बार प्रदर्शन नहीं होने की दूसरी वजह भी है। वह वजह यह है कि पिछले छह महीनों में चार बड़े खालिस्तानियो की हत्याओं से खालिस्तानी सहमे हुए हैं| खालिस्तानी आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि भारत की गुप्तचर एजेंसी खालिस्तानियों का खात्मा कर रही है| लेकिन अमेरिका का बदला हुआ रूख भी प्रदर्शन नहीं होने की वजह है|
भारत के प्रधानमंत्री की इस आधिकारिक राजकीय यात्रा में अमेरिका अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अपनी किरकिरी नहीं करवाना चाहता था, वरना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले जब राहुल गांधी अमेरिका में मोदी विरोधी माहौल बनाने गए थे, तब उनकी एक मीटिंग में खालिस्तान के समर्थन में नारे लगे थे|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications