India Pakistan Trade: 'हिन्दू बनिये' की शरण में क्यों आना चाहता है पाकिस्तान?
लाहौर चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने भारत के डिप्टी हाई कमिश्नर को अपने यहां बुलाकर फिर से व्यापार शुरु करने की दावत दी है। आखिर क्या कारण है कि पाकिस्तान को काफिर "हिन्दू बनिये" की फिर से याद आयी है?

India Pakistan Trade: पाकिस्तान के लोग हमें हिन्दू कहकर नहीं संबोधित करते। सामान्य बोलचाल में वो हमें 'हिन्दू बनिया' कहते हैं। उनके लिए भारत का हर हिन्दू एक ऐसा बनिया है जो 'मुंह में राम बगल में छूरी' रखता है। इसके पीछे वो भले ही घृणा का भाव रखते हों लेकिन इतना तो है कि वो भारतीयों को चतुर व्यापारी मानते हैं। पूरा जीवन भारत के खिलाफ अघोषित जंग लड़ने वाले हामिद गुल तो कई बार इस 'हिन्दू बनिये' का मजाक उड़ाते हुए कहते थे कि 'हिन्दू हमसे क्या लड़ेगा वो तो बनिया है।'
जो बंटवारे को थोड़ा भी समझने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि इस्लामिक मुमालिक मांगने के अनेक कारणों में एक कारण 'हिन्दू बनिये' का व्यापार छीनना भी था। 1947 में लाहौर में 30 प्रतिशत के आसपास हिन्दू थे लेकिन वहां की 70 प्रतिशत संपत्तियां हिन्दुओं और सिखों के पास थीं।
सन सैंतालिस के पहले लाहौर और कराची उत्तर भारत के ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत के लिए भी महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र थे। मुस्लिम लीग के समर्थन में जो लोग पाकिस्तान मांग रहे थे, उनकी नजर इन संपत्तियों पर भी थी। लाहौर, रावलपिंडी, लायलपुर, कराची, हैदराबाद और बहावलपुर ये प्रमुख व्यापारिक केन्द्र थे जहां हिन्दू ही मुख्य रूप से लाला जी या व्यापारी हुआ करते थे। इसलिए पाकिस्तान बन गये हिस्से में रहने वाले मुसलमानों की स्मृति में आज भी हिन्दू की छवि किसी बनिया की ही बनी हुई है।
लेकिन दोस्ती दुश्मनी के चूहे बिल्ली वाले लंबे खेल के बाद आज समय ऐसा आ गया है कि लाहौर में इसी हिन्दू बनिये अर्थात भारतीय दूतावास के डिप्टी को बुलाकर उसका स्वागत किया जा रहा है। ये स्वागत सत्कार वहां के बिजनेस करने वाले लोग कर रहे हैं, इस उम्मीद में कि भारत से तिजारत (व्यापार) शायद दोबारा शुरु हो जाए।
पाकिस्तान में इमरान खान की गिरफ्तारी की गहमा गहमी के बीच बीते शुक्रवार को लाहौर चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने भारत के डिप्टी हाई कमिश्नर सुरेश कुमार को अपने यहां बुलाया और उनका स्वागत सत्कार किया। इस मौके पर सुरेश कुमार ने साफ कहा कि हमने व्यापार बंद नहीं किया। यह आप हैं जिन्होंने 2019 में सभी प्रकार के व्यापारिक रिश्तों पर रोक लगा दी थी। सुरेश कुमार ने यह भी कहा कि 'भारत एक तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। इसका मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं।' पाकिस्तानियों के बीच उन्होंने जो सबसे बड़ा व्यंग्य किया वो ये कि "पैसा खुद बोलता है।''
इस मौके पर लाहौर चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के चेयरमैन कासिफ अनवर ने कहा कि लोग ऐसा समझते हैं कि पाकिस्तान और भारत के रिश्ते राजनीतिक समाधान से बेहतर होंगे लेकिन अगर दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध सामान्य हो जाएं तो राजनीतिक रिश्ते भी बेहतर होने लगेंगे। कासिफ का मानना है कि व्यापार शुरु हो तो सब ठीक हो जाएगा। ठीक न भी हो तो व्यापार बंद नहीं होना चाहिए।
पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना और बनने के बाद उसने सच्चे इस्लामिक मुल्क के रूप में अपने आप को स्थापित करने की लगातार कोशिश भी की। इसके लिए अपने यहां आंतरिक रूप से जहां उसने मुल्ला मौलवी के जरिए सच्चे इस्लाम को बढ़ावा दिया और पाकिस्तान के आम अवाम के दिलों में ये बात बैठा दी कि उनका संसार में कोई सबसे बड़ा दुश्मन है तो भारत का हिन्दू बनिया है। वहीं दूसरी ओर भारत को एक 'दुश्मन मुल्क' के रूप में दुनियाभर में प्रचारित भी किया। ऐसा उसने अनायास नहीं किया था। ऐसा करने के पीछे उसका आर्थिक हित था।
वह अपने आप को भारत से लड़ता हुआ दिखाकर दुनिया की उन बड़ी ताकतों को ब्लैकमेल कर रहा था जो रणनीतिक रूप से भारत को उलझाकर रखना चाहती थीं। इनमें पहला नाम अमेरिका का था और आजकल अमेरिका की जगह चीन ने ले ली है। पचास के दशक से ही भारत गुटनिरपेक्ष होते हुए भी रूस के करीब था। इसके विकल्प में पाकिस्तान ने अमेरिका की शरण ले ली और अमेरिका को भी यह जरूरी लगा कि पाकिस्तान को आगे रखकर रूस और भारत दोनों को बैलेंस किया जाए।
पाकिस्तान ने कैसे अमेरिका को ब्लैकमेल किया और अमेरिका कैसे नाको चने चबाकर पाकिस्तान से दूर भाग गया, ये अलग किस्सा है लेकिन जब तक अमेरिका का हाथ पाकिस्तान के साथ रहा, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चकाचक रही। साठ और सत्तर के दशक में कई बार ऐसा हुआ कि उसका जीडीपी ग्रोथ 10 प्रतिशत के ऊपर चला गया। तमाम कट्टरता, जाहिलियत और नकारेपन के बाद भी पाकिस्तान अमेरिका से इतनी इमदाद लेने में सफल रहा कि उसे आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन पाकिस्तान में अलकायदा चीफ ओसामा बिन लादेन के मिलने और अफगान वार के समाप्त होने के साथ ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी ध्वस्त होने लगी।
अमेरिका को समझ में आ गया कि पाकिस्तान एक लाइलाज बीमारी है। यह किसी का नहीं है इसलिए इस पर और अधिक पैसा बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है। यहां से पाकिस्तान चीन की ओर चला गया और फाइलों पर से धूल झाड़कर चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) को दोबारा जिन्दा किया। लगभग 50 अरब डॉलर की इस परियोजना के भरोसे पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वह अपना आर्थिक उद्धार कर लेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
नफरत और ईर्ष्या से भरी एक बंद दिमाग कौम व्यापार नहीं कर सकती। व्यापारी किसी से दुश्मनी नहीं करता। जब पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर इसी का महिमामंडन किया जाता हो तथा अदावत को ही सच्चा ईमान समझा जाता हो तो भला वहां व्यापार कैसे फल फूल सकता था? इसका एक और बड़ा कारण सच्चे इस्लाम की तालीम है। सच्चा इस्लाम व्यापार नहीं सिखाता। इस्लामिक सुन्नत व्यापार नहीं बल्कि लूटमार की मानसिकता विकसित करती है। उनके सामने उनके नबी की ये सुन्नत नहीं है कि खदीजा के साथ रहते हुए उन्होंने कैसे तिजारत किया। सुन्नत ये है कि उन्होंने गजवात के जरिए कैसे माल ए गनीमत हासिल किया।
इसलिए सच्चे इस्लाम के प्रसार ने पाकिस्तान के व्यापार को सबसे अधिक तबाह किया। वहां की मेमन बिरादरी हो या कादियानी समुदाय। ये व्यापारिक जमाते हैं। लेकिन इनको पाकिस्तान में हिकारत की नजर से देखा गया और कादियानी को तो गैर मुस्लिम बताकर वाजिब उल कत्ल ठहरा दिया गया। नवाज शरीफ परिवार के खिलाफ पाकिस्तान में इस बात के लिए सबसे अधिक माहौल बनाया जाता है कि वो लोग तो व्यापारी हैं।
2014 में नरेन्द्र मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने नवाज शरीफ को भारत बुलाया और नये व्यापारिक युग की शुरुआत की मंशा भी जताई। शरीफ परिवार अमृतसर से पाकिस्तान गया है। वो अमृतसर में रहते हुए ही व्यापार में आ चुके थे। आज भी शरीफ ग्रुप पाकिस्तान के सबसे बड़े व्यापारी परिवारों में गिना जाता है। इसलिए उनकी व्यापार में रुचि होना स्वाभाविक है परंतु हिन्दू बनिये से एक मार्शल कौम व्यापारिक रिश्ता रखे, यह भला उसकी आवाम को कहां स्वीकार हो सकता था?
इस तरह बीते आठ सालों में भारत पाकिस्तान के रिश्तों में डेड लॉक आ गया है जिससे पाकिस्तान अब सबसे अधिक परेशान है। उसके रूपये का ऐतिहासिक अवमूल्यन हो चुका है। एक यूएस डॉलर के मुकाबले 378 पाकिस्तानी रूपया। इसके कारण मंहगाई चरम पर है। न तो सऊदी अरब पैसा देने को तैयार है और न आईएमएफ। चीन जरूर कर्ज देता रहता है लेकिन अब चीन ने भी पाकिस्तान को लेकर अपने हाथ तंग कर लिये हैं। 'गजवात' और 'मुजाहिदीन' की नीति के कारण वह जितना कमा सकता था, कमा चुका। दुनिया का कोई निवेशक पाकिस्तान की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि अब पाकिस्तान को फिर से 'हिन्दू बनिये' की याद आयी है।
पाकिस्तान के हुक्मरान ये बात अच्छी तरह से समझते हैं कि 'हिन्दू बनिये' के बिना उनका वजूद मुश्किल है। या तो 'हिन्दू बनिया' उनसे दोस्ती करे या फिर दुश्मनी। जो कुछ करे लेकिन कोई न कोई रिश्ता जरूर रखे। पाकिस्तान दोनों ही परिस्थितियों में इसका आर्थिक लाभ ले लेगा। इस तरह अगर उसने मुंह मोड़कर तिरस्कार कर दिया तो पाकिस्तान जीते जी मर जाएगा।
अब भारत को तय करना है कि वह पाकिस्तान को लेकर अपनी उपेक्षा की नीति को जारी रखता है या उसमें फेरबदल करके पाकिस्तान को जीवनदान देता है। क्योंकि पाकिस्तान कल भी भारत को अस्थिर रखने की नीति पर काम कर रहा था और आज भी कश्मीर से लेकर पंजाब तक उसी नीति पर काम कर रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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