India-China clash in Tawang: शी जिनपिंग से सावधान रहने की जरूरत
चीन के हर शासक से भारत को चौकन्ना रहना चाहिए, लेकिन शी जिनपिंग से ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। घरेलू मोर्चे पर वे जब-जब घिरेंगे, भारत की सीमा पर गलवान और तवांग जैसी हरकतें करते रहेंगे।

चीन अपने अभ्युदय काल से ही साम्राज्यवादी नीति पर चलता रहा है। यह संयोग ही है कि 9 दिसंबर को घटी तवांग की घटना के ठीक छह दिन बाद ही भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल की 72वीं पुण्यतिथि है। चीन के संदर्भ में पटेल की याद आना स्वाभाविक है। पटेल ने बहत्तर साल पहले ही चीन की साम्राज्यवादी नीति को भांप लिया था। जिस तरह चीन ने सुधार के नाम पर तिब्बत पर कब्जा जमाने की शुरूआत की थी, और हमारे स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उसे नैतिक समर्थन दे दिया था, उससे सरदार पटेल चिंतित थे। चीन की साम्राज्यवादी नीति पर विचार के लिए पटेल तब कैबिनेट की बैठक बुलाना चाहते थे। इस सिलसिले में 7 नवंबर 1950 को पटेल ने प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जो पत्र लिखा था, वह एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है।
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पटेल ने लिखा था, "चीनी सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों की अपनी घोषणाओं से हमें भुलावे में डालने का प्रयत्न किया है। मेरी अपनी भावना तो यह है कि किसी नाजुक क्षण में चीनी सरकार ने हमारे राजदूत में तिब्बत की समस्या को शांतिपूर्ण उपायों से हल करने की अपनी तथाकथित इच्छा में विश्वास रखने की झूठी भावना उत्पन्न कर दी। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि चीनी सरकार अपना सारा ध्यान तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना पर केंद्रित कर रही होगी। मेरी राय में चीनियों का अंतिम कदम विश्वासघात से जरा भी कम नहीं है। दुख तो यह है कि तिब्बतियों ने हम पर भरोसा रखा और हमारे मार्गदर्शन में चलना पसंद किया और हम उन्हें चीनी कूटनीति के जाल से बाहर निकालने में असमर्थ रहे। हम तो चीन को अपना मित्र मानते हैं, परंतु वे हमें अपना मित्र नहीं मानते।"
चीन के सत्ता तंत्र में प्रधानमंत्री रहे ली केकियांग उदारवादी माने जाते रहे हैं। वे शी जिनपिंग की कठोर नीतियों के समर्थक नहीं रहे। कोरोना की महामारी के बीच चीन की आर्थिक स्थिति में गिरावट को लेकर दोनों नेताओं के बीच साल 2020 में अदावत बढ़ गई थी। केकियांग जहां खुदरा और स्ट्रीट कारोबार के जरिए चीन की गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के हिमायती रहे, वहीं शी जिनपिंग का नजरिया इसके उलट रहा।
याद कीजिए पंद्रह जून 2020 की घटना। लद्दाख की सीमा से लगी गलवान घाटी में चीन के सैनिकों ने तब घुसपैठ की कोशिश की थी। तब हमारे निहत्थे जवानों ने उनका मुंहतोड़ जवाब दिया था। इस झड़प में भारत के 20 जवान अपने कमांडिंग ऑफिसर सहित वीरगति को प्राप्त हुए थे। लोकतांत्रिक भारत ने तब अपने सैनिकों के इस सर्वोच्च बलिदान को ना सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि चीन को चेतावनी भी दी।
इसके बाद चीनी सीमा पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे थे और वहां से उन्होंने दुनिया को भारत के मजबूत इरादे और ताकत का संदेश दिया था। इस झड़प में चीन के पैंतालिस से ज्यादा सैनिक मारे गये थे। हालांकि इसे लेकर चीन में हंगामा जरूर हुआ लेकिन चीन ने कभी खुले तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया। मारे गए चीनी सैनिकों की संख्या का खुलासा पश्चिमी पत्रकारों की रिपोर्टों ने किया था।
गलवान झड़प के लिए तब चीन के उदारपंथी समूहों के साथ ही पूर्वी एशिया के तमाम थिंक टैंक का मानना था कि दरअसल शी जिनपिंग ने चीन में अपना प्रभाव और ताकत बढ़ाने के लिए अपनी सेना का इस्तेमाल किया। तब थिंक टैंक का मानना था कि चीन ऐसी घटनाओं से बाज नहीं आने वाला है। तब यह भी माना गया था कि शी जिनपिंग का एक मकसद अपने प्रधानमंत्री और उम्र में छोटे ली केकियांग की तरफ से चीनी जनता का ध्यान हटाना है। इसी वजह से उन्होंने भारतीय सीमा पर यह नापाक खेल खेला। तब पूर्वी एशिया के थिंक टैंक का मानना था कि अगर ली केकियांग की ताकत नहीं घटी, तो शी जिनपिंग ऐसे और कदम उठा सकते हैं।
इसी साल अक्टूबर में हुए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन में ली केकियांग किनारे लगाए जा चुके हैं। शी जिनपिंग एक तरह से चीन के आजीवन बादशाह बन बैठे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर चीन ने अरूणाचल की तवांग घाटी में ऐसा कदम क्यों उठाया जिसमें उसके तीस से ज्यादा सैनिक घायल हुए हैं।
इस सवाल का जवाब जानने के लिए चीन की अंदरूनी हालत पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। चीन चाहे लाख इंकार करे, लेकिन कोरोना महामारी चीन में एक बार फिर पैर फैला रही है। बढ़ते कोरोना की वजह से चीन की सरकार ने जब कठोर प्रतिबंध लगाए तो लोग सड़कों पर उतर आए। एक तरह से विद्रोह होता नजर आया। लोग सड़कों पर शी जिनपिंग गद्दी छोड़ो जैसे नारे लगाते नजर आने लगे।
इस बीच चीन की अर्थव्यवस्था में भी गिरावट जारी है। चीन की विकास दर लगातार घटती जा रही है। इसकी वजह से देश में बेरोजगारी बढ़ रही है। विश्व बैंक ने इस साल चीन की विकास दर 4.3 फीसद रहने का अनुमान लगाया था, जो अब और घट गया है। देश का निर्माण सेक्टर भयानक मंदी से जूझ रहा है। चूंकि शी जिनपिंग 2013 से लगातार देश के राष्ट्रपति और कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हैं, इसलिए उन पर भी सवाल ज्यादा हैं।
पूर्वी एशिया के थिंक टैंक मानते हैं कि ऐसे में शी जिनपिंग को देश का ध्यान बंटाने के लिए सबसे मुफीद रास्ता भारत के साथ विवादों को बढ़ावा देना नजर आता है। वैसे भी चीन के कट्टरपंथी समुदाय की भारत ग्रंथि कुछ वैसी ही है, जैसे पाकिस्तान के कट्टरपंथियों की है। जिस तरह पाकिस्तान के हुक्मरान अपने देश का ध्यान बंटाने के लिए भारत विरोधी कश्मीर राग अलापते हैं, चीन में भी ऐसा ही ढर्रा बनता गया है।
हालांकि यह ध्यान देने की बात है कि चीन में उदारपंथियों की संख्या बढ़ी है। गलवान के बाद से चीन की सरकार पर वहां के नागरिक समुदायों ने ठीक उसी तरह सवाल उठाया था, जिस तरह आजकल पाकिस्तान में भारत समर्थक लॉबी और युवा मुखर हुए हैं। चूंकि चीन में लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है। वहां की शासन व्यवस्था एकात्मक है। इसलिए वहां के तमाम अंदरूनी टकराव दुनिया के सामने नहीं आ पाते। लेकिन अब चीन भी बदल रहा है और वहां के लोग भी इन तथ्यों को व्यापक रूप से समझ रहे हैं। जिस तरह गलवान कांड के बाद शी जिनपिंग सवालों के घेरे में रहे थे, तवांग के बाद उन पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है।
फिर चीन भी जानता है कि आज का भारत 1962 के बाद से सैनिक और कूटनीतिक प्रभाव के मोर्चे पर लंबी यात्रा कर चुका है। बेशक 1975 के तवांग कांड के बाद से चीन सीमा पर तैनात सैनिकों को गोली-बारूद के साथ पहरेदारी पर रोक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास प्रतिकार के जरूरी साजोसामान नहीं हैं।
गलवान में भारतीय सैनिकों ने जिस तरह चीन की पीपुल्स आर्मी के दांत खट्टे किए थे, तवांग में भी वैसा ही हुआ है। इसलिए चीन को एक बार फिर अपनी हरकतों के लिए सोचना होगा। वैसे तो चीन के हर शासक से भारत को चौकन्ना रहना चाहिए, वह रहता भी है। लेकिन उसे शी जिनपिंग से ज्यादा सावधान रहना होगा। घरेलू मोर्चे पर वे जब-जब घिरेंगे, भारत के मोर्चे पर वे गलवान और तवांग जैसी हरकतें करते रहेंगे।
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