भारत और इस्लाम: महाराजा दाहिर का मुहम्मद बिन कासिम से मुकाबला
661 में उमय्यद वंश के मुआविया ने जब इस्लाम की सर्वोच्च सत्ता हासिल की तो सिंध में भी एक बड़ा परिवर्तन हो गया। महाराजा चच जिन्होंने पिछले 40 वर्षों से सिंध में सफलतापूर्वक शासन किया और उसे अरबों के हर हमले से बचाया, अब उनका निधन हो गया था। उनकी जगह उनके भाई चंदर ने गद्दी (662 से 669 तक) संभाली लेकिन सात साल बाद उनका भी निधन हो गया।

अब महाराजा चच के बेटे दाहिर ने अरोर को केंद्र बनाकर शासन शुरू किया जबकि महाराजा चंदर के बेटे दूरेज ने ब्राह्मणबाद को राजधानी बना लिया। एक साल बाद ही महाराजा चच के दूसरे बेटे दहर ने दूरेज को हराकर ब्राह्मणबाद पर अपना अधिकार जमा लिया। इस प्रकार अगले 30 वर्षों (670 से 700) तक दाहिर और दहर दोनों भाई अलग-अलग केन्द्रों से सिंध का शासन सँभालते रहे। 700 में दहर की मृत्यु हो गयी और सम्पूर्ण साम्राज्य महाराजा दाहिर के पास आ गया।
इस आतंरिक उठापटक के बावजूद भी सिंध उमय्यद हमलावरों से एकदम सुरक्षित था। महाराजा दाहिर के शासनकाल में मुआविया के अतिरिक्त यजीद, मुआविया द्वितीय, मरवान और अब्द अल-मालिक खलीफा बन चुके थे। इन सभी ने कई बार सिंध पर अपने युद्धक अभियान भेजे लेकिन महाराजा दाहिर एक कुशल योद्धा थे और उन्होंने हर बार इन उमय्यद हमलावरों को अपनी सीमा से बाहर खदेड़ा था।
इस्लाम का भारत पर पहला हमला 636 में हुआ और 711 तक इसे 75 वर्ष पूरे हो गए। रशीदुन खलीफाओं के बाद, उमय्यद खलीफाओं ने अफ्रीका के उत्तरी इलाकों से लेकर यूरोप तक अपनी पकड़ बना ली थी, मगर भारत अभी तक इस्लाम की जद से एकदम बाहर था।
अब्द अल-मालिक जब खलीफा था तो उसने 694 में हज्जाज नाम के एक मुस्लिम को ईराक का गवर्नर बनाया। अब्द अल-मालिक के बाद उसका बेटा अल-वालिद 705 में खलीफा बना तो उसने भी हज्जाज को वहां का गवर्नर बनाये रखा। वालिद के शासनकाल में अधिकतर युद्धक अभियान हज्जाज के ही नेतृत्व में जीते गए थे। इसलिए हज्जाज इन उमय्यद खलीफाओं का बेहद खास था। वालिद कभी भारत पर हमले का समर्थक नहीं रहा लेकिन हज्जाज की निगाह हमेशा भारत की धन-दौलत पर लगी रहती थी।
इसी बीच सीलोन (वर्तमान श्री लंका) से ईराक जा रहे हज्जाज के कुछ समुद्री जहाजों को देबल बंदरगाह के समीप लूट लिया गया। ब्रिटिश इतिहासकारों ने इन्हें 'समुद्री लुटेरों' की संज्ञा दी है। वास्तव में यह समुद्री लुटेरे नहीं थे क्योंकि भारतीय समुद्री सीमा में न इस्लामिक और न ही भारतीय इतिहास में इससे पहले ऐसी किसी घटना का जिक्र किया गया है। संभवतः यह भारतीय जहाजों द्वारा इस्लामिक जहाजों की उन लूटों का बदला होगा जोकि वे भारतीय समुद्री तटों पर पहले करते आये थे।
फिलहाल, हज्जाज ने इसका जिम्मेदार महाराजा दाहिर को ठहराना शुरू कर दिया और उन पर क्षतिपूर्ति का दवाब बनाने लगा। महाराजा दाहिर ने उसके किसी भी झांसे में आने से इनकार कर दिया। इस प्रकार हज्जाज को खलीफा अल-वालिद को भारत के खिलाफ युद्धक अभियान भेजने का एक बहाना मिल गया। आखिरकार, बार-बार आग्रह के बाद खलीफा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
हज्जाज ने पहले उबेदुल्ला को देबल बंदरगाह पर आक्रमण के लिए भेजा। उसका अभियान असफल रहा और वह मारा गया। फिर हज्जाज ने बुदैल को भेजा। इसके जवाब में महाराजा दाहिर ने अपने बेटे जय को भेजा और अंत में बुदैल भी मारा गया। इन दोनों हारों के बाद, हज्जाज ने अपने भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम को देबल बंदरगाह पर हमला करने के लिए कहा। कासिम तब फारस में था, इसलिए उसने जहम बिन जहरुल को हमले के लिए भेजा लेकिन हज्जाज ने उसे वापस भिजवा दिया और कासिम को ही अभियान का नेतृत्व करने को कहा।
हज्जाज अपने पुराने असफल अनुभवों से बहुत कुछ समझ गया था। इसलिए उसने कासिम के नेतृत्व में अभी तक की सबसे बड़ी सेना तैयार करवाई जिसमें 6,000 सीरियन एवं इराकी लड़ाकों सहित 3,000 बक्ट्रियन ऊंट शामिल थे। वह पांच पत्थर फेकने वाली मशीनें भी साथ लाया था। उसने हूणों का भी समर्थन जुटा लिया था क्योंकि वे सभी सम्राट हर्षवर्धन से मिली वर्षों पुरानी अपनी हार का बदला किसी भी हिन्दू महाराजा से लेना चाहते थे। अतः इन सब तैयारियों के साथ 712 में मोहम्मद बिन कासिम देबल बंदरगाह पहुँच गया।
वर्तमान कराची शहर को ही देबल कहा जाता था। कासिम ने सबसे पहले कराची के एक मंदिर पर लहरा रहे भगवा ध्वज को नीचे गिरा दिया जिससे स्थानीय लोगों को भयभीत किया जा सके। इस्लामिक इतिहास में इस मंदिर को 'बुत' कहकर संबोधित किया गया है। अधिकतर ब्रिटिश इतिहासकारों ने 'बुत' को बौद्ध मान लिया और उसे एक बौद्ध मंदिर बताया है। जबकि बुत का एक अर्थ मूर्ति से भी सम्बंधित होता है। इसलिए यह बौद्ध मंदिर था अथवा हिन्दू मंदिर, इस पर संशय है।
कासिम के इस हमले का महाराजा दाहिर के स्थानीय गवर्नर ने जमकर मुकाबला किया लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष में कासिम की सेना को बहुत नुकसान पहुंचा था। फिर भी भारतीय इतिहासकारों ने महाराजा दाहिर को गलत तरीके से पेश किया है। उन्होंने बिना किसी ठोस सबूत के महाराजा को आलसी और सत्ता के मद में डूबे रहने वाला बताया है। वास्तव में यह उनका स्वयं का आंकलन है, उस दौर की किसी भी इतिहास की पुस्तक में ऐसा नहीं बताया गया है।
दरअसल, यह एक गलत अवधारणा बन गयी है कि महाराजा दाहिर ने कराची को बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसलिए इस मामलें की पूरी पृष्ठभूमि समझने की आवश्यकता है। जैसा कि हम जानते है कि कराची पर यह कोई पहला हमला नहीं था और वहां के गवर्नर ने कई बार हमलावरों को भगाया था। महाराजा दाहिर को इस बार भी अपने गवर्नर पर पूरा भरोसा था कि वह कासिम को पीछे धकेल देगा लेकिन इस बार नियति को कुछ और ही मंजूर था।
दूसरा कराची और महाराजा दाहिर की राजधानी अरोर की दूरी 150 मील थी और बीच में कासिम को सिन्धु नदी को भी पार करना था। कासिम कोई नौका लेकर नहीं आया था और इतने सैनिकों को बिना नौका के नदी पार करवाना बहुत मुश्किल था। इसलिए महाराजा दाहिर को विश्वास था कि वह यहाँ से लौट जायेगा। कासिम हर तीन दिनों के अंतराल में हज्जाज को अभियान की प्रगति की जानकारी पहुंचता था। कासिम तो लौट जाता लेकिन हज्जाज ने उसका हौसला बनाये रखा और किसी भी तरह कोई रास्ता खोजने को कहा। हज्जाज ने 2,000 अतिरिक्त घुड़सवार सैनिक भी उसकी सहायता के लिए भेज दिए।
विगत वर्षों में देबल के आसपास कई मुस्लिमों ने महाराजा दाहिर की अधीनता स्वीकार कर ली थी। कासिम के हमले के दौरान महाराजा दाहिर ने उन राजाओं को राजधानी बुलाया और कासिम का मुकाबला करने के लिए कहा। मगर इस बार स्थिति बदल गयी थी। वे राजधानी अरोर तो पहुंचे लेकिन महाराजा के सामने पहली बार नहीं झुके। महाराजा थोड़े अचंभित हुए और उन्होंने इसका कारण पूछा। इस पर उन्हें जवाब मिला कि हमने आपकी अधीनता स्वीकार की है, लेकिन हम इस्लाम की सेना के खिलाफ लड़ने में असमर्थ है।
महाराजा दाहिर को मिला यह विश्वासघात पहला नहीं था। उधर दो महीने से कासिम अपनी सेना के साथ सिंधु नदी पार करने के किसी मौके की तलाश में था। यहाँ एक स्थानीय जागीरदार ने कुछ पैसों और जमीन के लालच में कासिम को नदी पार करने में सहायता दी। नदी के दूसरी तरफ महाराजा दाहिर की सेना एकदम तैयार थी। चचनामा के अनुसार उनके पास 5,000 घुड़सवार, 100 हाथी और 20,000 की पैदल सेना थी।
नौवीं शताब्दी के एक मुस्लिम इतिहासकार अल-बालाधुरी की पुस्तक 'किताब फ़ुतुह अल-बुलदान' के अनुसार "महाराजा दाहिर और कासिम के बीच भीषण युद्ध हुआ जैसा आजतक किसी ने नहीं देखा था। युद्ध दो दिनों तक चला और महाराजा ने उस पर चारों ओर से धावा बोला, और इतनी दृढ़ता और बहादुरी से लड़े कि कासिम की सेना डगमग हो गई और बड़ी उलझन में आ गयी। दूसरे दिन तक कासिम की सेना लगभग समाप्त हो गई थी।"
कासिम अब लगभग हारने की कगार पर पहुँच गया था। तभी महाराजा दाहिर के हाथी को अग्नि बाण लगा। सामान्यतः हाथियों को आग से बहुत डर लगता है। इसलिए इस तीर से वह पानी की तरफ भागने लगा और महाराजा नीचे गिर गए। इससे सेना में भगदड़ मच गयी लेकिन महाराजा ने तुरंत अपने-आप को संभाला और एक घोड़े पर सवार होकर फिर से युद्ध करने लगे। हालाँकि, अब कासिम के बचे-खुचे तीरंदाजों ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी। इस प्रकार महाराजा दाहिर, एक सफल प्रशासक और साहसी योद्धा के रूप में वीरगति को प्राप्त हुए।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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