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क्या हिमंत बिस्व सरमा अगले अमित शाह बनने की राह पर हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कहा था कि उन्हे सरकार के मुखिया रहते संगठन की चिंता नहीं रहती क्योकि वह जिम्मेदारी अमित शाह बखूबी निभाते हैं। मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया था, जिससे संगठन भी उनके दिशा निर्देश पर काम करे। दिल्ली में अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि अमित शाह के बाद कौन? तो इस सवाल के जवाब में अब एक नाम हिमंत बिस्व सरमा का सामने आने लगा है।

Himanta Biswa Sarma becoming next Amit Shah

2015 में कांग्रेस से भाजपा में आए और 2021 में असम के मुख्यमंत्री बने बिस्वा सरमा के काम करने की शैली अमित शाह जैसी ही है। राजनीतिक जोड़-तोड़ करने में माहिर, काम को लेकर कठोर, चतुर और मेहनत का सधा हुआ संतुलन। सबसे बढकर सत्ता पाने के लिए सारे हथकंडे अपनाने वाले और कभी हार न मानने की मानसिक अवस्था। कुशल चुनावी रणनीतिकार और चुनाव के लिए रणनीति तथा संसाधन का प्रबंध करने में माहिर। संघ पृष्ठभूमि से न आने वाले हिंमत विस्वा सरमा ने संघ में भी अपनी स्वीकार्यता को तेजी से बढ़ाया है। इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि जब मई 2021 में सर्वानंद सोनोवाल की जगह हिमंत बिस्व सरमा के नाम पर भाजपा हाईकमान ने संघ के पदाधिकारियों से चर्चा की तो संघ ने तत्काल हिंमत के नाम पर मुहर लगा दी।

हिमंत बिस्व सरमा की एक योग्यता ने उन्हें मोदी और शाह का भरोसेमंद बनाया और वह है उनकी राजनीतिक स्थिति को सही तरीके से समझने की क्षमता के साथ ये सुनिश्चित करना कि जो वे कर रहे हैं वो पार्टी और संगठन के हित में ही है। विपक्ष के नेताओं से उनके विस्तृत नेटवर्क ने भी उनको मोदी और शाह के करीबी बनने में मदद किया है। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि हिमंत बिस्व सरमा में सत्ता के महत्त्व की समझ है और उनके लिए राज करना सर्वोपरि है। इसीलिए मात खाई, दिशाहीन और विपक्ष में बैठी कांग्रेस में वो नहीं रह पाए और भाजपा में आ गए।

कांग्रेस छोड़कर 2015 में भाजपा में आने वाले हिमंत बिस्व सरमा ने तेजी से भाजपा में अपनी पकड़ मजबूत की और जल्द ही शाह के लाडले और भरोसेमंद सिपाहसलार बनकर उभरे। असम में मंत्री के रूप में वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालने वाले सरमा कठिन परिस्थितियों में भी सफल चुनावी अभियानों का नेतृत्व करने की अपनी क्षमता तथा शासन के अपने अनुभवों के कारण एक अलग छाप छोड़ी और मोदी और शाह की नजर में चढ़ गए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक 'बाहरी' होने के बावजूद वह भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति में पूरी तरह फिट हो गए।

मोदी-शाह की जोड़ी जल्दी किसी पर भरोसा नहीं करती लेकिन हिमंत बिस्व सरमा जितने कम समय में मोदी और शाह के भरोसेमंद बने वह आश्चर्यचकित करने वाला है। हिमंत के रहते हुए भाजपा ने असम में 2016 का विधानसभा चुनाव जीता और हिमंत के कारण भाजपा ने पूर्वोत्तर के राज्य दर राज्य सत्ता में पकड़ बनाई। वह सरकार चाहे वैध तौर पर चुनाव जीतकर बनायी गयी हो या अन्य किसी दांव-पेंच के जरिए। मोदी और शाह ने कांग्रेस और छोटे क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व वाले पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा को मजबूत करने की जिम्मेदारी हिमंत बिस्व सरमा को सौंपी और उन्हें नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) का संयोजक बनाया।

यह हिमंत बिस्व सरमा ही थे जिन्होंने अपने रणनीतिक कौशल और सत्ता के लिए अपनाए जाने वाले सभी हथकडों को अपनाकर नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में भाजपा का परचम फहराना शुरू किया और पूर्वोत्तर को कांग्रेस मुक्त कर दिया। पूर्वोत्तर के सात में से छह राज्यों में भाजपा की सरकार या तो चुनावी जीत के जरिए या गठबंधन बनाकर बनाने में हिमंत बिस्व सरमा ने ही अहम भूमिका निभाई है। इनमें वामपंथियों को उनके गढ़ त्रिपुरा में सत्ता से बेदखल करने की कठिन लड़ाई में मिली जीत भी शामिल है। इस प्रक्रिया में, हिमंत ने खुद को एक चतुर चुनाव प्रबंधक और मतदाता की नब्ज को समझने वाले एक राजनेता के रूप में स्थापित कर लिया और भाजपा के लिए एक प्रमुख संकटमोचक भी साबित हुए हैं।

शाह की तरह ही हिमंत बिस्वा सरमा को इसमें कोई हिचक नहीं है कि वो सत्ता में कैसे आते हैं। शाह की तरह वो मतदाताओं की नब्ज़ को जानते हैं और विपक्ष के नेताओं को तोड़कर भाजपा में लाने में सिद्धहस्त हैं। वह हिमंत बिस्व सरमा ही थे जिन्होंने नागरिकता संशोधन कानून के बाद असम में खराब हुई स्थिति को नियंत्रित करने में मुख्यमंत्री सोनोवाल के असफल रहने पर शाह से निर्देश मिलने पर स्थिति को नियंत्रित किया। देश के 12 राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री है, लेकिन शायद ही कोई मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के समान राजनीतिक रणनीतिकार वाली प्रतिभा से लैस हो।

असम के मुख्यमंत्री हिंमत बिस्व सरमा के राजनैतिक कौशल पर शाह को कितना भरोसा है, उसका इस बात से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि एकनाथ शिंदे ने जब शिवसेना से बगावत की तो उनके साथ उनके विधायकों को सुरक्षित रखने के लिए शाह ने उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गोवा, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों के ऊपर असम को वरीयता दी और बागी विधायकों को असम भेज दिया था। भाजपा के एक ही मुख्यमंत्री को ऑपरेशन शिवसेना की जानकारी थी और वह थे हिमंत बिस्व सरमा।

असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा का सियासी कौशल राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के काम आया। 18 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव में, सरमा ने किसी राज्य की अपेक्षा असम में विपक्ष के 22 विधायकों से उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में क्रास वोटिग करवा दी थी। यहीं नहीं एनडीए के जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में ऐलान से चार दिन पहले 13 जुलाई को दार्जिलिंग में धनखड़ और ममता बनर्जी की अचानक हुई मुलाकात भी दिलचस्प थी। खासकर इसलिए भी कि पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तल्ख रिश्ते जगजाहिर थे। इसी मुलाकात के बाद तृणमूल ने कहा कि वह उपराष्ट्रपति चुनाव में भाग नहीं लेगी। खबर है कि वह हिमंत बिस्व सरमा ही थे जिनके कारण ममता ने उपराष्ट्रपति चुनाव से दूर रहने का निर्णय लिया।

महाराष्ट्र के बागी विधायकों को गुवहाटी में सुरक्षित महसूस कराने और राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष में तगड़ी सेंध लगाने के बाद सरमा असम से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन मोदी और शाह जानते है कि हिमंत को कब दिल्ली लाना है। लेकिन यह तय है कि उनकी राजनीतिक क्षमताओं को देखते हुए हिमंत के लिए दिल्ली दूर नहीं है। अब यह देखना दिलचस्प होगा मोदी और शाह कब 53 साल के हिमंत बिस्व सरमा को कब दिल्ली बुलाते हैं। 2024 के पहले या 2024 के बाद। हालांकि जिस तरह से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को उन्होंने दिल्ली की दुर्दशा को लेकर घेरा है उसे देखकर लगता है कि वो भी दिल्ली आने की तैयारी कर रहे हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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