Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

भारत और इस्लाम: सिंध का अभिशाप एवं मुहम्मद बिन कासिम की हत्या

अधिकतर इतिहासकारों ने महाराजा दाहिर की मृत्यु के साथ ही सिंध को कासिम द्वारा जीता मान लिया गया है। यह सत्य नहीं है क्योंकि जहाँ एक तरफ वे महाराजा के वीरगति को प्राप्त होने की बात करते है, वहीं वे दूसरी तरफ यह भी बताते है कि युद्ध में महाराजा की विधवा महारानी और बेटे जय ने मोर्चा संभाल लिया था। उन्होंने मिलकर मजबूत किलेबंदी की। आरसी मजूमदार अपनी पुस्तक 'प्राचीन भारत' में लिखते है कि "लगभग छह महीनों तक कासिम से युद्ध चला।" आखिरकार, महीनों के संघर्ष के बाद अलोर पर कासिम का कब्ज़ा हो गया।

India and Islam Curse of Sindh Muhammad bin Qasim

इससे पहले महारानी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सभी औरतों को एकत्रित कर उनसे कहा, "ईश्वर न करे कि हम अपनी स्वाधीनता उन गायों का भक्षण करने वालों को सौंप दे। हमारा स्वाभिमान छिन जायेगा। हमारी राहत समाप्त हो गई है, और बचने की कोई उम्मीद नहीं है; हम लकड़ी, रूई और तेल इकट्ठा करें, क्योंकि मुझे लगता है कि हमें अपने पतियों से मिलने के लिए स्वयं को अग्नि के हवाले करना होगा। अगर कोई स्वयं के साथ ऐसा नहीं करना चाहती तो वह जा सकती है।" इस प्रकार भारतीय इतिहास का यह पहला जौहर है जहाँ हिन्दू स्त्रियों ने इस्लामी आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम से अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए स्वयं को अग्नि के हवाले कर दिया।

सिंध की राजधानी अलोर एक शानदार नगर था। चचनामा के अनुसार मेहरान नदी (सिन्धु नदी) के तट पर बसा यह नगर कई प्रकार की शाही इमारतों, घरों, बगीचों, फव्वारों, बहते पानी के स्रोत, घास के मैदान और पेड़ों से सुशोभित रहता था। कासिम ने इस नगर को नष्ट कर दिया और 6 हजार से अधिक पुरुषों का नरसंहार किया। महाराजा दाहिर की संपत्ति एवं खजाने को लूटा और हजारों स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाया। हर जगह मंदिर नष्ट किये गए और मूर्तियाँ तोड़ी गयीं। हज्जाज इतने से भी संतुष्ट नहीं था। उसने कासिम को सन्देश भिजवाया कि उसे काफिरों के खिलाफ और अधिक कठोरता से पेश आना चाहिए।

कासिम के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने के लिए जय दूसरे मौकों की तलाश में अलोर छोड़ कर चला गया। फिर भी कासिम की मुसीबतें लगातार बढती जा रही थी। पूरे सिंध पर विजय प्राप्त करना उसके लिए कोई आसान काम नहीं था। दरअसल, सिंध राज्य उत्तर में कश्मीर, पूर्व में कन्नौज, और दक्षिण में अरब सागर तक विस्तृत था। इसकी उत्तर-पश्चिमी सीमा बलूचिस्तान और मकरान के समुद्री तट भी इसमें शामिल थे।

अभी कासिम देबल से मात्र 150 मील अन्दर अलोर तक ही पहुंचा था। उसके बाद उसने मुल्तान पर हमला करने की योजना बनाई। यहाँ भी कई महीनों तक उसकी सेना डेरा डाले रही लेकिन मुल्तान उसके कब्जे में नहीं आया। मुल्तान का स्थानीय गवर्नर महाराजा दाहिर द्वारा नियुक्त किया गया था और उसने कासिम का डटकर सामना किया। एक समय ऐसा भी आया जब कासिम के पास भोजन और पानी दोनों की कमी हो गयी। 'किताब फ़ुतुह अल-बुलदान' के अनुसार कासिम की सेना ने गधों को मारकर खाया था। किसी विश्वासघाती ने कासिम को मुल्तान नगर में पानी आने के स्त्रोत बता दिए और उसने नगर में पानी की आपूर्ति बंद करवा दी। आखिरकार, इस प्रकार एक लंबे संघर्ष के बाद मुल्तान कासिम के कब्जे में आ गया।

कासिम लगभग दो वर्षों तक सिंध में संघर्ष करता रहा। उसे खलीफा वालिद के माध्यम से हज्जाज का पूरा समर्थन मिला हुआ था। वह थोड़ी संख्या में सैनिक लाया था लेकिन इतने लम्बे युद्ध के बाद उसमें से भी अधिकांश मारे जा चुके थे। इसलिए उसने स्थानीय स्तर पर महाराजा दाहिर से असंतुष्ट लोगों का समर्थन हासिल किया। इन्हीं कुछ कारणों से वह सिंध में आंशिक सफलता प्राप्त कर सका। हालांकि, अभी महाराजा दाहिर के बेटे जिन्दा थे और कासिम के लिए लगातार मुश्किलें पैदा कर रहे थे।

इसी बीच दमिश्क में एक बड़ा परिवर्तन हो गया। दरअसल, कासिम तो ईराक के गवर्नर हज्जाज के कहने पर सिंध पर हमला करने आया था। मगर हज्जाज 714 में बीमारी के चलते मर गया। हज्जाज को खलीफा वालिद का समर्थन हासिल था और वह भी 715 में एक बीमारी के कारण दुनिया से चला गया। अब नया खलीफा वालिद का भाई सुलेमान बना। सुलेमान और हज्जाज के बीच कभी अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे और वह एक-दूसरे के दुश्मन थे। चूँकि कासिम हज्जाज का भतीजा एवं दामाद था तो उस पर खलीफा सुलेमान की गाज गिरनी तय थी।

जब तक हज्जाज जिंदा था तो कासिम उसके संपर्क में था लेकिन राजनैतिक रूप से नया खलीफा उसके लिए बड़ी चुनौती बन गया। खलीफा सुलेमान ने ईराक में यजीद को नया गवर्नर नियुक्त कर दिया। यजीद और कासिम भी एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे। इसलिए खलीफा सुलेमान को खुश करने के लिए कासिम सिंध से लूट की राशि और गुलाम औरतें भिजवाने लगा।

पिछले दो वर्षों से कासिम की किस्मत उसका साथ दे रही थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। 16वीं शताब्दी में मीर मुहम्मद मासूम नाम का एक मुस्लिम इतिहासकार हुआ जिसने सिंध का इतिहास अपनी पुस्तक 'तारीख-ए-मसुमी' लिखा है। वह लिखता है कि महाराजा दाहिर की दो बेटियों को कासिम ने खलीफा के पास भेजा। दो महीनों के बाद उन राजकुमारियों को खलीफा के सामने पेश किया गया और एक दुभाषिया बुलाया गया। जब उनके चेहरे से पर्दा हटा दिया गया, तो खलीफा को उनसे प्यार हो गया।

दुभाषिया के माध्यम से उन राजकुमारियों ने खलीफा को बताया कि मुहम्मद (कासिम) ने उन्हें तीन दिनों तक अपने हरम में रखा था। उसने आपके समक्ष हमें सौपने से पहले हमारी इज्जत लूट ली है इसलिए अब हम आपके लिए अयोग्य हो चुकी है। खलीफा इस बात से इतना बिगड़ गया कि उसने तुरंत आदेश दिया कि मुहम्मद बिन कासिम को एक बैल की कच्चे खाल में सिलाई करके मेरे सामने पेश किया जाए।

कुछ इतिहासकारों को यह कहानी मिथ्या नजर आती है। हालाँकि उन्हें ऐसा क्यों लगा इसके पीछे उन्होंने कोई तथ्य नहीं दिए है। यह उनकी स्वयं की अवधारणा है कि इस कहानी में कोई सत्यता नहीं है। फिर भी कई भारतीय, यूरोपियन और मुस्लिम इतिहासकारों ने इस तथ्य को स्पष्ट रूप से लिखा है।

यूरोपियन इतिहासकार एचएम इलियट एवं जॉन डौसन ने भी अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया' में चचनामा को आधार बनाते हुए इस कहानी को लिखा है। उसके अनुसार, "खलीफा ने सबसे पहले महाराजा दाहिर की बड़ी बेटी को अपने पास बुलाया। खलीफा उसकी खूबसूरती देखकर आश्चर्यचकित हो गया। राजकुमारी ने खलीफा को बताया कि मुहम्मद बिन कासिम ने तीन दिनों तक अपने पास रखने के बाद आपके पास भेजा है।"

खलीफा के आदेश पर कासिम को बैल की खाल में सिलकर बंद कर दिया गया और ऐसा करने के तीन दिनों बाद उसकी जान चली गयी। उसके मृत शरीर को एक ताबूत में बंद कर खलीफा के समक्ष पेश किया गया जहाँ महाराजा दाहिर की बेटियों के सामने उसे खोला गया। फिर उन राजकुमारियों ने खलीफा को सच्चाई बताई कि कासिम का कोई कसूर ही नहीं था। उन्होंने ऐसा अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए किया था। इस पर खलीफा को पछतावा हुआ और उसने राजकुमारियों को घोड़े की पूंछ से बांधकर तब तक घसीटने के आदेश दिए जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए।

हालांकि अल-बालाधुरी की पुस्तक 'किताब फ़ुतुह अल-बुलदान' के अनुसार मोहम्मद बिन कासिम की मौत की कहानी थोड़ी अलग तरह से दिखाई देती है। अल बालाधुरी के मुताबिक "खलीफा के आदेश पर कासिम को पकड़कर, उसे जंजीरों में बांधा गया और उसे तब तक प्रताड़ित किया गया, जब तक उसकी मृत्यु नहीं हो गयी।"

दोनों कहानियां अपने-अपने स्थान पर है लेकिन कुल मिलाकर सत्य यह है कि मुहम्मद बिन कासिम जो कि सिंध के अपने युद्धक अभियान पर था, वह उसे बीच में ही छोड़कर मर गया। इस प्रकार सिंध न कभी रशीदुन खलीफाओं के हाथ लगा और उमय्यद खलीफाओं के लिए भी यह अभिशाप बन गया था।

यह भी पढ़ेंः जन्मदिन पर विशेष: अमृता प्रीतम ने क्यों कहा कि भारत में पैदा हर व्यक्ति हिन्दू है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+