Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Nithari Case: मोनिन्दर और सुरिन्दर निर्दोष हैं तो निठारी कांड का दोषी कौन है?

नोएडा का निठारी गांव एक भीड़भाड वाली जगह है। सबकुछ अनियंत्रित। शहरीकरण के मानकों के अनुसार गांव जैसा होता है उसको वैसे ही रहने दिया जाता है। लेकिन जब आसपास बसावट बढ़ती है तो गांवों में भी भीड़ बढ़ती है। वो लोग जो व्यवस्थित शहर में रहने का भार नहीं उठा पाते वो शहर के बीचो बीच बचे गांवों में पहुंच जाते हैं। दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम में ऐसे दर्जनों गांव हैं जो शहर में रहकर भी शहर से बाहर हैं।

ऐसे ही नोएडा के गांव निठारी से एक ऐसी खौफनाक खबर निकलकर बाहर आयी कि जिसने सुना वह सन्नाटे में आ गया। न्यूज चैनलों के गढ नोएडा में ऐसी डरावनी और खौफनाक खबरों के बाद मानों देश में सबकुछ ठप हो गया। न्यूज चैनलों के लिए निठारी कांड से बड़ी कोई खबर नहीं थी। खबर हो भी नहीं सकती थी।

nithari-case

दिसंबर के आखिरी हफ्ते में निठारी के निवासियों ने सेक्टर 31 के आरडब्लूए से निवेदन किया कि वो नाले की जांच करवायें क्योंकि उन्हें शक है कि निठारी गांव से गरीब परिवारों की जो दो नाबालिग बच्चियां गायब हुई थीं उन्हें मारकर उनके शवों को इसी नाले में फेंक दिया गया है। निठारी गांव के निवासियों की मांग पर आरडब्लूए के अध्यक्ष एससी मिश्रा ने नाले में खोजबीन करवाने का निर्णय लिया। नाले में खोजबीन हुई तो एक लड़की का सड़ा हुआ हाथ मिला।

गांववालों का आरोप सही साबित हुआ। इसके बाद जो पुलिस गांव वालों के बार बार कहने के बाद भी इस पूरे मामले को टाल रही थी, उसने जांच को अपने हाथ में ले लिया। निठारी गांव का पूरा शक गांव से सटे सेक्टर 31 के एक मकान में रहनेवाले लोगों पर था जिसका नंबर था, डी-35। इस डी-35 कोठी में मोनिंदर सिंह पंढेर नामक एक व्यक्ति तथा उसका नौकर सुरिन्दर कोली यही दो लोग रहते थे। हालांकि इतना सबकुछ पता चल जाने के बाद भी पुलिस का टालमटोल वाला रवैया जारी था और बार बार वह गांव वालों के आरोपों को ही गलत साबित करने का प्रयास कर रही थी।

खबर बड़ी हुई तो कार्रवाई भी शुरु हुई। पुलिस ने तकनीकी पहलुओं से जांच करने का निर्णय लिया। लेकिन मीडिया चैनलों की रिपोर्टिंग से दबाव इतना अधिक बढ़ा कि पुलिस ने मोनिंदर पंढेर और कोली को हिरासत में ले लिया। पुलिस का टालमटोल रवैया देखते हुए आखिरकार यूपी की मुलायम सिंह यादव सरकार ने दो पुलिसवालों को निलंबित कर दिया और जांच को सीबीआई को सौंपने का निर्णय लिया।

जैसे जैसे जांच आगे बढ़ी वही बात सच साबित हुई जो गांव वाले पहले दिन से कह रहे थे। निठारी से गायब होनेवाली नाबालिग लड़कियां डी-35 ले जायी जाती थीं। ये काम मुख्य रूप से सुरिन्दर कोली करता था जिसमें उसकी मदद उस घर में काम करनेवाली माया नाम की नौकरानी करती थी। जांच पड़ताल में किडनी रैकेट और सेक्स रैकेट होने के भी संकेत मिले। जांचकर्ताओं ने पाया कि मोनिन्दर का एक डॉक्टर नवीन चौधरी से बहुत मधुर संबंध था जो कुछ साल पहले सेक्स रैकेट में पकड़ा गया था। इसी तरह उसके घर से वेबकैम आदि उपकरण भी बरामद हुए जिससे जांचकर्ताओं को संदेह हुआ कि हो न हो उन नाबालिग बच्चियों को हवश का शिकार बनाते समय उनका वीडियो भी बनाकर बाद में बेचा जाता हो।

नाले और मोनिंदर के घर के आसपास जो 17 नरकंकाल मिले थे जांचकर्ताओं ने उनका परीक्षण किया तो उनमें से 15 की पहचान हो गयी। जांचकर्ताओं को आशंका थी कि कुल 31 बच्चों को इन दोनों द्वारा हवस का शिकार बनाकर उन्हें मार दिया गया था। हालांकि जांच पड़ताल में सिर्फ 19 मामले ही प्रमाणित हो पाये जिसमें से एक बालिग लड़की पायल का केस भी शामिल था।

हर प्रकार की वैज्ञानिक जांच हुई। डीएनए टेस्ट किया गया। नार्को टेस्ट हुआ जिसमें सुरिन्दर कोली ने स्वीकार किया कि वह लड़कियों को बहला फुसलाकर ले आता था और मालिक को सौंप देता था। उसके बाद उन लड़कियों के साथ हर प्रकार का अत्याचार करने के बाद मार दिया जाता था। शवों को दफनाने या नाले में बहाने का काम सुरिन्दर कोली करता था। उन शवों को दफनाने से पहले वह उन बच्चियों की लाशों के साथ बलात्कार करता था। इसके बाद उनके शरीर को टुकड़ों में काटकर ठिकाने लगा देता था।

हालांकि अपनी जांच पड़ताल में सीबीआई ने मोनिन्दर को संदेह का लाभ देते हुए आरोपमुक्त कर दिया था लेकिन 13 फरवरी 2009 सीबीआई कोर्ट ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ द रेयर की कटेगरी में रखते हुए मोनिंदर और सुरिन्दर कोली दोनों को मौत की सजा सुनाई। इसके बाद 4 मई 2010 को निठारी के एक अन्य मामले में भी दोनों को फांसी की सजा सुनाई गयी। निठारी कांड से जुड़े अलग अलग मामलों में सुरिन्दर कोली को पांच बार फांसी की सुनाई गयी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी एक सुनवाई के दौरान 2011 में सही माना।

सुरिन्दर कोली द्वारा राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल की गयी लेकिन जुलाई 2014 में राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका निरस्त कर दी। 12 सितंबर 2014 को मेरठ जेल में सुरिन्दर कोली को फांसी दिया जाना तय हुआ था लेकिन ऐन मौके पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके वह उसे रुकवाने में सफल साबित हुआ। 29 अक्टूबर को 2014 को चीफ जस्टिस एचएल दत्तू ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कोली को मिली मौत की सजा को बरकरार रखा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को सीबीआई अदालत के आदेश में कुछ भी कमी दिखाई नहीं दे रही थी।

लेकिन मोनिन्दर और सुरिन्दर को मिली सजा के मामले में बाजी पलटी तब जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने 28 जनवरी 2015 को सुरिन्दर कोली की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। इसके लिए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कारण बताया कि उसकी दया याचिका का उचित समय से निस्तारण नहीं हो रहा है।

वहां से कोली को जीवनदान मिला तो आज वह उसी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अधिकांश मामलों में आरोपों से मुक्ति में बदल दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन दोनों दोषियों को आरोप मुक्त करने के लिए जो आधार लिया है वह यह कि सबूत और गवाह पर्याप्त नहीं है।

निश्चय ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से उन परिवारों के 17 साल पुराने घाव हरे हो जाऐंगे जिनके घरों की बच्चियां इन दोनों की हवस और क्रूरता का शिकार बनी थीं। लेकिन यहां कुछ सवाल और पैदा होते हैं। जैसे जिन वैज्ञानिक जांचों के आधार पर दोषियों का अपराध निर्धारण होता है उन सबमें जब ये दोषी पाये गये थे तो फिर आज इलाहाबाद हाईकोर्ट को सबूतों में कमी कहां नजर आ गयी? सवाल यह भी है कि अगर जांच एजंसियों, निचली अदालत और सुप्रीम कोर्ट और स्वयं राष्ट्रपति द्वारा दोषी करार दिये जा चुके मोनिन्दर और सुरिन्दर निर्दोष हैं तो निठारी कांड 19 लड़कियों के साथ हुए बलात्कार और हत्या का दोषी है कौन?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+