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EVM: ईवीएम जायेगी तो फिर से बूथ कैप्चरिंग आयेगी

भारत गणराज्य 19 अप्रैल से 1 जून के बीच 18वें आमचुनाव की तैयारी कर रहा है जो विश्व का सबसे बड़ा चुनाव होगा, जब 96.88 करोड़ मतदाता अपने जनप्रतिनिधि का चयन करेंगे। इसके लिए चुनाव आयोग ने व्यापक इंतजाम किये हैं। लेकिन इस बीच एक बार फिर ईवीएम पर सवाल उठाकर एक समूह ने पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही सवालिया निशान लगाने की कोशिश की है।

इस सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिविस्ट अरुण कुमार की याचिका की सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग और सरकार से वीवीपैट की सभी पर्चियों का मिलान ईवीएम में पड़े सभी वोटों से कराने की वास्तुस्थिति पर स्पष्टीकरण मांगा है। अभी की व्यवस्था में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के रैंडम पांच ईवीएम का ही वीवीपैट से मिलान होता है। याचिका के अनुसार इस कारण मतदाता के मन में प्रणाली को लेकर संदेह उत्पन्न होता है।

If EVM goes booth capturing will come again

साथ ही याचिका में कहा गया है कि मतदाता को वीवीपैट की पर्ची को खुद बैलेट बॉक्स में डालने की सुविधा मिलनी चाहिए। इससे चुनाव में गड़बड़ी की आशंका खत्म हो जाएगी और मतदाता यह देख लेगा कि उसका मत सही व्यक्ति को पड़ा है और यह गणना के लिए भी जाएगा। आगे यह बात भी उठाई गई है कि चुनाव आयोग 24 लाख वीवीपैट के लिए 5 हजार करोड़ खर्च कर चुकी है मगर सिर्फ 20,000 वीवीपैट का उपयोग समझ के परे है।

न्यायालय ने सरकार और चुनाव आयोग को जवाब तलब तो किया है मगर क्या वाकई वीवीपैट की पर्ची से ईवीएम में पड़े वोट का रैंडम मिलान चुनाव प्रणाली के निष्पक्ष होने की गारन्टी नहीं दे पाता या ईवीएम हैक और वीवीपैट पर्ची से मिलान जैसे मुद्दे जानबूझकर उठाये जा रहे हैं ताकि जनता के मन में संदेह पैदा हो?

अभी पिछले साल सितंबर में भी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई थी जिसमें ईवीएम से चुनावी धांधली और गड़बड़ी की बात कही गई थी। मगर याचिका पर न्यायालय ने फटकार ही लगाई थी कि हर कुछ दिनों में ईवीएम की गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ना और भ्रम उत्पन्न करना गलत है। हालांकि चुनाव आयोग ने तब भी न्यायालय को बताया था कि ईवीएम बिना किसी कंप्यूटर या इंटरनेट नेटवर्क के स्वतंत्र रूप से काम करने वाली वन टाइम प्रोगामेबल चिप वाली मशीन है, जिससे हैकिंग या छेड़छाड़ "असंभव" है। आयोग ने बताया था कि अब तक सिर्फ 25 शिकायतें मिली हैं वो भी जांच के बाद झूठी पाई गई हैं।

ईवीएम और वीवीपैट पर प्रश्न उठाने से पहले इसे समझना जरूरी है। वीवीपैट यानी 'वोटर वेरिफाइएबल पेपर ऑडिट ट्रेल' एक मशीन होती है जो वोटिंग के समय बताती है कि वोटर ने किसे वोट दिया है। इसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम से कनेक्ट किया जाता है। ईवीएम में मतदाता जिस भी पार्टी का बटन दबाता है, उसी पार्टी के चिह्न की पर्ची वोटर को वीवीपैट मशीन में दिखती है।

वीवीपैट से निकलने वाली पर्ची सिर्फ वोटर को ही दिखती है। अब यह प्रणाली अभी रैंडम है तो भी क्या अब तक सभी 20,000 वीवीपैट पर्चियों का ईवीएम के वोटों से मिल जाना स्वयं में इसके निष्पक्षता का सबूत नहीं है? रैंडम चुनाव तो फिर भी गड़बड़ियों की आशंका को कम करता है। सिलसिलेवार जब यही प्रक्रिया अपनाई जाने लगेगी और पर्चियों से ही वोटिंग की गिनती होने लगेगी तो इस बात की क्या गारंटी है कि तब विपक्ष यह आरोप नहीं लगाएगा कि पर्चियों को ही बदल दिया गया? या फिर ईवीएम को ही रीसेट कर वोट को ही बदल दिया गया?

संदेह लाइलाज होता है। असंतुष्ट को कल्पवृक्ष भी संतुष्ट नहीं कर सकता। फिर भी ईवीएम के मामले में एक और बात समझने की जरूरत है। हाल ही जर्मनी की कोर्ट ने जर्मनी में ईवीएम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इसकी असलियत और कारण क्या है इसे समझने की जरूरत है। सबसे पहले यह बात समझना होगा कि यहां भी न्यायालय में दो याचिकाएं थी जिसमें एक ईवीएम के उपयोग को "असंवैधानिक" घोषित करने की थी और दूसरी "ईवीएम के हैक" होने की संभावना की वजह से इसको बैन करने की थी।

जर्मन न्यायालय ने हैक करने वाली याचिका को "खारिज" किया और बेमानी बताया। वहां की अदालत ने इसके उपयोग को पूर्ण रूप से वर्जित नहीं किया है। हां न्यायालय ने जर्मन संविधान के अनुसार इसे कुछ आधार पर असंवैधानिक जरूर ठहराया है। न्यायालय ने कहा "कंप्यूटर में पड़े मत को जनता नहीं देख पाती जो जर्मनी संविधान के कुछ अनुच्छेदों का उल्लंघन है"।

जापान ने इस प्रक्रिया को महंगा बता कर बंद किया जो बहुत बड़ा कारण भारत में भी वीवीपैट की अनुपलब्धता का है। जर्मनी और जापान दोनों देशों ने "पारदर्शिता में अभाव" को माना जिसका अर्थ वीवीपैट जैसे मशीनों से "रैंडम क्रॉस वेरिफाई" ना कर पाना है। नीदरलैंड के मामले में पारदर्शिता के अलावा मशीनों के भंडारण, परिवहन एवं सुरक्षा को लेकर नियमों का अभाव था।

अमेरिका में ईवीएम का उपयोग लगभग न के बराबर है और वो मतपत्रों से मतदान को अपने "रिच्युअल" से जोड़ कर देखते हैं और परंपरा ऐसे ही रखना चाहते हैं। भारत में भी चुनाव आयोग ने इस बात को स्पष्ट किया है कि इन देशों में वीवीपैट जैसी किसी मशीन का उपयोग नहीं होता और बैन किए गए देशों में ईवीएम एक कम्प्यूटर और नेटवर्क से जुड़ा होता है जिसे हैक करना संभव है।

हमें नहीं भूलना चाहिए भारत में मतपेटियों को लूटने का इतिहास रहा है। इसे ही रोकने के लिए ईवीएम को सुरक्षित विकल्प के तौर पर अपनाया गया था ताकि वोटों की लूट रोकी जा सके। आज भी बंगाल के पंचायती चुनाव में मतपेटियों की लूट के किस्से सरेआम हैं। ऐसे में क्या गारंटी है कि अगर ईवीएम को हटा दिया जाएगा तो पुन: बूथ कैप्चरिंग नहीं शुरु हो जाएगी?

देश की जनसंख्या इतनी है कि मतपत्र द्वारा वोट देना और उसकी गिनती करना एक थकाऊ और खर्चीली प्रक्रिया होगी। जो लोग जर्मनी, जापान और अमेरिका का उदाहरण दे रहे हैं वो लोग पड़ोस के पाकिस्तान को क्यों नहीं देख रहे हैं जहां सरेआम आज भी बैलट बॉक्स लूटकर मनमाना नतीजा निकाला गया है? भारत की परिस्थितियां अमेरिका जैसी नहीं बल्कि पाकिस्तान जैसी ही हैं। यह ईवीएम ही है जिसने बदनाम बूथ कैप्चरिंग और वोटों की लूट पर रोक लगाई है। जो लोग बार बार इस पर सवाल उठा रहे हैं क्या वो फिर से बूथ कैप्चरिंग का रास्ता खोलना चाहते हैं?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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