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INDIA Alliance: आम चुनावों के लिए कितना तैयार है 'इंडिया' गठबन्धन?

INDIA Alliance: कुछ समय पहले तक यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि 2024 में 27 विपक्षी दल एक साथ आकर एक मजबूत विकल्प के रूप में केंद्रीय सत्ता के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करेंगे। पर अब यह एक हकीकत है कि अपने तमाम मतभेदों, वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद ये दल अब काफी हद तक 'इंडिया' नामक गठबन्धन में बंध गए हैं।

पटना, बेंगलुरु और मुंबई की तीन शिखर बैठकों के बाद ये दल गठबन्धन की दिशा में इतनी दूर तक आगे बढ़ चुके हैं कि इनमें से अब किसी एक का भी पीछे लौटना उसकी राजनीतिक साख के लिए घातक साबित हो सकता है। इसलिए अब यह मानकर चलना होगा कि इंडिया गठबन्धन अब एक नई राजनीतिक सच्चाई है, जो आगामी आम चुनावों में जनता को आश्वस्त और अपनी ओर आकर्षित करने की पूरी क्षमता रखता है। यह एक ऐसी सच्चाई बन चुका है, जिसे सत्तापक्ष व जनता द्वारा हल्के में नहीं लिया जाएगा। इस गठबन्धन पर अनाप-शनाप टीका-टिप्पणी करके, अंतर्विरोधों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाकर और मजाकिया नाम देकर इसे सत्ता की दौड़ से दूर दिखाना, असंभव हो गया है। इसके अलावा यह भी स्वीकार करना होगा कि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद 'इंडिया' गठबन्धन के घटक दलों की संख्या बढ़नी ही है, घटनी नहीं है।

How prepared is India alliance for the general elections?

राजनीति के सामाजिक आधारों की बात करें तो इसका आधार पिछड़े, आदिवासी, दलित व अल्पसंख्यक समुदायों में है, जो आबादी की दृष्टि से बहुसंख्यक हैं। संभवतः इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी ने मुंबई में दावा किया कि गठबन्धन देश की 60 फीसदी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, इसे हराना असम्भव है। यदि सामाजिक बहुमत राजनीतिक बहुमत में बदल सके तो यह गठबन्धन सत्ता में भी आ सकता है।

मजबूत राजनीतिक आधार

यह गठबन्धन एक ऐसा देशव्यापी गठबन्धन है जो 11 बड़े राज्यों में सरकार में है, विधायकों की संख्या की दृष्टि से एनडीए से थोड़ा ही कम है, लोकसभा में इसके 142 और राज्यसभा में 98 सांसद हैं। इसके पास एनडीए के विपरीत प्रधानमंत्री पद के लिए कोई तय चेहरा भले न हो लेकिन देश के कई वरिष्ठ, अनुभवी और जनाधार वाले नेता हैं जिनके पास चुनावी राजनीति और प्रशासन का अप्रश्नेय अनुभव है।

मुंबई बैठक के बाद संयोजक, मीडिया व संचार और चुनाव रणनीति व प्रचार समितियों के गठन से यह पता चलता है कि ये दल अब मिलकर कार्रवाई करने को तैयार हैं। सहयोग अब केवल शीर्ष नेताओं की बैठकों तक ही सीमित नहीं रह गया है। इस बैठक के बाद संयुक्त बयान में आगामी दिनों में देश के अनेक भागों में बड़ी जनसभाओं के आयोजन की भी बात कही गयी है। इसके अलावा इसी माह के अंत तक सीटों के बँटवारे को लेकर भी फैसले लिए जाने की बात सामने आई है। कहने का आशय यह है कि स्वयं को 2024 में मतदाताओं के सामने सत्ता के दावेदार विकल्प के रूप में पेश करने के लिए 'इंडिया' गठबन्धन एक-एक करके धीरे-धीरे अपनी सभी बाधाएँ दूर करते हुए आगे बढ़ता जा रहा है।

फिर भी इसकी कामयाबी और एकजुटता के मामले में मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों और एनडीए नेताओं को छोड़ भी दें तो भी अब भी कुछ राजनीतिक प्रेक्षक और टीकाकार यह अंदेशा जताते हैं कि गठबन्धन अंततः आंतरिक विघटन का शिकार होकर सुस्त हो जाएगा और परिणामस्वरूप मतदाताओं की नजरों में नहीं चढ़ पायेगा। राजनीति संभावनाओं का खेल है। इसमें कभी भी कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है जैसा कि महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ हो चुका है। ऐसा और भी किसी प्रदेश में किसी दल के साथ हो सकता है। पर 2024 में नई सरकार का गठन दलबदल और पार्टियों को तोड़कर नहीं, बल्कि मतदाताओं के दिल जीतने की अग्निपरीक्षा से गुजरने के बाद होना है। ऐसे में संभावनाओं के द्वार पूरी तरह से खुले हुए हैं।

ऐसे प्रेक्षक और टीकाकार उन सकारात्मक तत्त्वों और राजनीतिक वास्तविकताओं की उपेक्षा करते हैं जिन्होंने ऐसे विशाल और बहुरंगी गठबन्धन की असम्भव संभावना को संभव बना दिया है। कांग्रेस को छोड़कर सभी पार्टियों के शीर्ष नेता या तो राज्यों में सरकार चला रहे हैं या फिर उनका पूरा ध्यान राज्य में सत्ता हासिल करने पर है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार पहले तो उम्र के कारण और दूसरे अपनी पार्टी को एकजुट न रख पाने के कारण प्रधानमंत्री की रेस से बाहर हैं।

सीपीएम में प्रधानमंत्री बनने लायक कोई दूसरा ज्योति बसु नहीं है, और उसे कोई मुग़ालता भी नहीं है। डीएमके के नेता स्टालिन राज्य में ही खुश हैं। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं ही, और 2024 के बाद भी बने रह सकने की संभावना से भरे हुए हैं। ऐसे में वे प्रधानमंत्री न भी बने तो उनका कोई नुकसान नहीं है, सिवाय नीतीश कुमार के, जिन पर तेजस्वी यादव के लिए मुख्यमंत्री की गद्दी खाली करने का दबाव हो सकता है। क्षेत्रीय दलों का कोई और नेता दिल में भले पीएम बनने की लालसा पाले हो पर सामने शायद ही आये।

राहुल गांधी ने भले ही अपनी इच्छा न जाहिर की हो पर कांग्रेस के नेता व मुख्यमंत्री निजी हैसियत में उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बता चुके हैं। इसके बावजूद राहुल गांधी भी सत्ता के लिए बेचैन नहीं हैं बल्कि वे भाजपा को बेदखल करने में ज्यादा रुचि रखते हैं। वे तभी प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे जब उनकी पार्टी की सीटें स्थिति मजबूत हो। इसके लिए उसे 150 से अधिक सीटें जितनी होंगी। अभी तक के माहौल में यह मुश्किल लगता है पर चुनाव नजदीक आने पर जनता उसके पक्ष में मूड बना ले तो यह हो भी सकता है। उसका आधार अब भी बहुत बड़ा है। ऐसे में इंडिया घटक दलों का कोई नेता पीएम बनने के लिए बेचैन हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। यह एक सकारात्मक बात है जो गठबन्धन को बांधे रह सकती है।

लालू प्रसाद यादव ने कहा कि हम अपनी पार्टियों के नुकसान करके भी साथ चुनाव लड़ेंगे। ऐसा और पार्टियां भी सोचती होंगी। इसका कारण यह है कि इन पार्टियों के शीर्ष नेताओं को निजी स्तर पर कोई नुकसान नहीं उठाना है और न ही त्याग का कष्ट करना है। वे तो पार्टी के दूसरे नेता होंगे जो सीटें सहयोगी दलों के खाते में चले जाने के बाद नुकसान का खामियाजा भुगतेंगे। पर वे भी शायद न पार्टी का कुछ नुकसान करने की स्थिति में होंगे न शीर्ष नेतृत्व को नाराज करने की स्थिति में। ऐसे में सीटों का बंटवारा भी आसानी से हो सकता है।

पर इंडिया गठबन्धन इस महत्वाकांक्षा में नहीं जी रहा है कि उसे एक सीट पर एक ही उम्मीदवार देना है। मुंबई बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया है 'जहाँ तक संभव होगा हम मिलकर लड़ेंगे।' यानि कि जहाँ बीजेपी या एनडीए या गुटनिरपेक्ष दलों से उनकी टक्कर नहीं है, जहाँ घटक दल आपस में ही एक दूसरे के मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं वहाँ वे अलग-अलग चुनाव लड़ने के विकल्प खुले रखे हुए हैं। बंगाल व केरल इसके लिए सबसे प्रासंगिक राज्य हैं। दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस और आप मिलकर भी लड़ सकते हैं। रणनीति की यह उदारता भी गठबन्धन की एक शक्ति है। चुनाव लड़ने की इस उदार रणनीति ने उसकी राह आसान कर दी है।

इनके अलावा एक और सकारात्मक बात है जो विपक्षी गठबन्धन को आंतरिक विघटन से बचाये हुए है। वह है गठबन्धन के संयोजक व प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर किसी एक नेता के नाम पर चुनाव पूर्व आमराय न बनाने की कोशिश। नेता के बजाय टीम की तरह काम करना भी उसका एक अच्छी रणनीति है। कुल मिलाकर कहें कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के सिवा अन्य घटक दलों को खोने के लिए कुछ खास नहीं है जबकि पाने के लिए सारा जहाँ है!

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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