उत्तर प्रदेश और बिहार में कहां बिखर गया सामाजिक न्याय का पूरा तानाबाना?
नई दिल्ली। लोकसभा चुनावों में आरजेडी, एसपी और आरएलडी के एक तरह से हुए सफाए से यह सवाल प्रासंगिक हो गया है कि आखिर उस सामाजिक न्याय का पूरा तानाबाना कहां बिखर गया, जिसे कभी बहुत मजबूत और टिकाऊ माना जाता रहा है। हिंदी इलाके में बिहार में आरजेडी और जेडीयू को सामाजिक न्याय का पैरोकार माना जाता था। वहां से आरजेडी का पूरा सफाया हो गया। उसे एक भी सीट नहीं मिली जबकि वहां गठबंधन की वह नेतृत्वकारी पार्टी रही है। जेडीयू को जीत मिली लेकिन उसकी जीत को सामाजिक न्याय से ज्यादा उस गठबंधन की माना जा सकता है जिसके नेतृत्व में वह चुनाव लड़ी थी।

वर्तमान राजनीतिक माहौल में सामाजिक न्याय कहां गया
उत्तर प्रदेश में एसपी और आरएलडी को भी सामाजिक न्याय वाले खेमे में गिना जाता है। एसपी को पांच सीटें ही मिल पाईं जिसमें एक खुद पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और दूसरी मुलायम सिंह यादव की हैं। दूसरी पार्टी आरएलडी को गठबंधन से भी कोई लाभ नहीं मिल सका और उसका एक भी उम्मीदवार जीत नहीं हासिल कर सका।इससे यह संदेश गया है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में सामाजिक न्याय या तो कहीं पीछे छूट गया है अथवा उसके लोगों को इसकी कोई जरूरत नहीं रह गई है। इसके अलावा भी कारण हो सकते हैं लेकिन यह तो एकदम साफ लग रहा है कि अगर उनके मतदाताओं को इसकी आवश्यकता होती, तो वे जरूर अपने दलों को वोट करते और अगर वोट करते तो इन दलों का वह हाल नहीं होता जो हुआ है।

सामाजिक न्याय का फार्मूला
यह सामाजिक न्याय का फार्मूला कभी बहुत पापुलर हुआ करता था। माना जाता रहा है कि यादव और मुस्लिम इसके साथ हैं और इसी के आधार पर बिहार में आरजेडी और उत्तर प्रदेश में एसपी को जीत मिलती रही है। इसमें कभी-कभार कुछ पिछड़े भी जुड़ जाया करते थे। यह समीकरण तब भी काम करता था जब इन पार्टियों की हार भी होती थी। तब भी वे मजबूत ताकत के रूप में नजर आते थे। इसी सामाजिक न्याय के बलबूते लालू यादव ने लंबे समय तक बिहार में शासन किया था और केंद्र में भी उनकी व उनकी पार्टी की मजबूत उपस्थिति हुआ करती थी। एसपी के साथ भी यही रहा है। वहां मुलायम से लेकर अखिलेश तक की सरकारें रही हैं। केंद्र में एसपी बड़ी ताकत के रूप में रही है। एसपी जब उत्तर प्रदेश में हारती भी, तो कुछ अपवादों को छोड़कर बीएसपी से जिसे दलितों की पार्टी के रूप में जाना जाता है और इन्हीं दलितों के एकमुश्त वोट से बसपा सत्ता तक पहुंच जाया करती थी। एक बार ऐसा भी हुआ था कि मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत उसे ब्राह्मणों और अन्य जातियों का भी वोट मिला था जिसकी बदौलत विधानसभा में बीएसी को प्रचंड बहुमत भी मिला था। इसके बाद हुए चुनाव में राज्य की सत्ता में फिर से एसपी की धमाकेदार वापसी हुई थी।

NDA के साथ जुड़े नीतीश
इस सबके बीच बीजेपी कहीं नहीं खड़ी हो पाती थी जबकि वह पहले सत्ता में भी रह चुकी थी। एक तरह से कहा जाए कि उत्तर प्रदेश में काफी समय तक सामाजिक न्याय का बोलबाला रहा। यह पहले बुरी तरह टूटा 2014 के लोकसभा चुनाव में और बाद में 2017 के विधानसभा चुनाव में। तब एसपी को लोकसभा चुनाव में मात्र पांच सीटों पर जीत मिल सकी थी और पांचों उनके परिवार को मिली थीं। विधानसभा चुनाव में भी करारी शिकस्त मिली थी।बिहार में आरजेडी के साथ भी कुछ इसी तरह हुआ। वहां सामाजिक न्याय के अगुवा माने जाने वाले लालू यादव ने लंबे समय तक एकछत्र राज किया। उन्हें सत्ता से हटाया भी तो सामाजिक न्याय की दूसरी धारा ने ही। नीतीश कुमार के नेतृत्व में उन्हीं से अलग होकर बनी जेडीयू ने न केवल लालू यादव को सत्ता से बाहर किया बल्कि सत्ता की बागडोर भी अपने हाथ में कर ली। एक समय ऐसा आया था जब आरजेडी काफी कमजोर स्थिति में भी पहुंच गई थी। लेकिन यह लालू यादव का अपना करिश्माई नेतृत्व और अपने वोट बैंक पर पकड़ थी कि उन्होंने नए सिरे से आरजेडी को इतनी मजबूती प्रदान की कि अपने वोट बैंक को भी साथ लाए और सत्ता तक फिर पहुंच बना ली। हालांकि तब भी राज्य में सरकार नीतीश कुमार की ही बनी पर लालू यादव और आरजेडी ने यह साबित कर दिया कि अभी भी यादव और मुसलमान उनके साथ पूरी ताकत से खड़े हैं। बाद में जरूर राजनीतिक हालात बदले और नीतीश कुमार ने एक बार खुद को एनडीए के साथ जोड़ लिया और मुख्यमंत्री बन गए। इसका परिणाम यह भी हुआ कि आरजेडी सत्ता से बाहर हो गई। लेकिन इस दौरान भी आरजेडी नेता और लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव ने न केवल खुद को पार्टी नेता के रूप में स्थापित किया बल्कि अपने वोट बैंक की रक्षा करने की कोशिश भी की। इसी बीच यह भी हुआ कि लालू यादव को जेल जाना पड़ा। यह पहला लोकसभा चुनाव था जिसमें लालू यादव जेल में थे। हालांकि इसको लेकर ही राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम थी कि बिना लालू यादव के आरजेडी कितना कर पाएगी। पर किसी को भी शायद ही इस तरह का खतरा रहा हो कि आरजेडी की हालत इतनी खराब हो जाएगी और उसे एक भी सीट भी नहीं मिल पाएगी। लेकिन हुआ यही और राज्य की लोकसभा की एक को छोड़कर सारी सीटें एनडीए गठबंधन ने जीत ली। मात्र एक सीट नहीं मिल सकी जिस पर कांग्रेस प्रत्याशी को जीत मिली।

सामाजिक न्याय की राजनीति का अंत हो चुका है
इसी के साथ यह सवाल प्रमुख हो गया कि क्या सामाजिक न्याय की राजनीति का अंत हो चुका है या अभी भी उम्मीद की जा सकती है कि यह नए सिरे से खड़ा हो सकता है। खुद को सांत्वना देने के लिए सामाजिक न्यायवादी यह कह सकते हैं कि लोकसभा चुनावों के परिणामों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सामाजिक न्याय का फार्मूला असफल हो चुका है। विधानसभा चुनावों में यह फिर अपना प्रभाव साबित करेगा। लेकिन इसकी भी गारंटी नहीं मानी जा सकती क्योंकि अगर इसकी कोई संभावना होती तो बीते उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में एसपी की करारी हार नहीं हुई होती। दरअसल बीते पांच वर्षों में जिस नए राजनीतिक समीकरण का बोलबाला बढ़ा है, उसमें सारी गणित कमजोर होती जा रही है। जातीय अस्मिता का सवाल भी कमजोर पड़ता जा रहा है क्योंकि धार्मिकता मजबूत होती जा रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि वह कमंडल की राजनीति हावी होती जा रही है जो कभी मंडल की प्रतिद्वंद्विता में ही आई थी। दूसरा यह कि सामाजिक न्याय केवल जातिवाद नहीं था बल्कि यह एक तरह का सामाजिक आंदोलन था जिसे कभी लालू यादव ने आंशिक रूप में ही शुरू किया था। लेकिन यह अपेक्षा के अनुरूप न बिहार में और न ही उत्तर प्रदेश में चलाया जा सका। परिणाम यह हुआ कि सब कुछ जातीय गोलबंदी तक जाकर सीमित हो गया। जाहिर है अगर उससे ज्यादा मजबूत और आक्रामक कोई राजनीतिक धारा आएगी, तो इस समीकरण का टूटना स्वाभाविक था। सामाजिक न्याय की ताकतों को इसे समझना होगा और देखना होगा कि आखिर किया जाना चाहिए जिससे न केवल उनका अस्तित्व बच सके बल्कि नए सिरे से खुद को खड़ा कर सकें। यह मान लेना कि यादव और मुसलमान उनके साथ ही रहेंगे, फिर गलत साबित हो सकता है।












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