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Fun on Holi: हास परिहास के उत्सव होली पर लगता कॉमेडी का ग्रहण

होली के साथ हास परिहास अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है। होली के अवसर पर जगह जगह कवि सम्मेलन का आयोजन या फिर निजी संवाद में हास परिहास का प्रयोग बढ़ जाता है।

holi

जीवन में हास्य-बोध होना ही चाहिए, यह न हो तो जिंदगी नीरस और बोझिल बन जाती है। यह स्वस्थ हास-परिहास के प्रति भारतीय लोकमानस की सहज स्वीकृति ही है कि उसने होली जैसे त्योहारों की संकल्पना की। यह ऐसी संकल्पना है जो जनमानस को सब प्रकार की कुंठाओं, वर्जनाओं, आडंबरों, औपचारिकताओं से मुक्त होने का अवसर प्रदान करती है। होली की सुधि आते ही व्यंग्य-विनोद, हर्ष-उल्लास, हंसी-ठिठोली, राग-रंग, आमोद-प्रमोद की सुंदर, सरस एवं सुमधुर छवि साकार हो उठती है। इस अवसर पर आयोजित होने वाले हास्य कवि-सम्मेलन सहज एवं निर्मल हास के जीवंत उदाहरण रहे हैं।

अपने देश में सहज एवं स्वस्थ हास-परिहास की यह परिपाटी केवल होली तक सीमित नहीं रही है, अपितु शादी-विवाह जैसे मांगलिक आयोजनों-अनुष्ठानों से लेकर जीवन-जगत के विस्तृत व्यवहारों, कार्य-व्यापारों तक इसकी व्याप्ति है। विवाहोत्सवों में वर-वधू पक्ष के सदस्यों के मध्य होने वाली मीठी शरारतों एवं झिड़कियों, रिश्तों के ताने-बाने में रचे-बसे भिन्न-भिन्न प्रकार के मनुहारों-उलाहनों, देवी-देवताओं को रिझाने तथा बारातियों के स्वागत हेतु गए जाने वाले गीतों तक में कई बार इसकी झलक देखने को मिलती है। लोक में प्रचलित यह अनूठी परिपाटी अपरिचितों को भी पास लाती है, रिश्तों में नया रंग और स्वाद घोलती है तथा प्रारंभिक संकोच एवं औपचारिक दबावों को दूर कर वातावरण को मुक्त एवं सहज बनाती है।

परंतु विगत कुछ वर्षों से स्वस्थ हास्य-परंपरा के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। हास्य कार्यक्रमों एवं स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर जिस ढंग की फूहड़ता, निर्लज्ज़ता, अश्लीलता, द्विअर्थी शब्दों-संवादों आदि की प्रस्तुति की जाने लगी है, श्रद्धा-आस्था के परंपरागत केंद्रों पर निशाना साधा जाने लगा है, कोटि-कोटि जनों के प्रेरणा-प्रतीकों, मान-बिंदुओं, देवी-देवताओं पर परोक्ष-प्रत्यक्ष हमले किए जाने लगे हैं, वे न केवल चिंताजनक एवं निंदनीय हैं, अपितु उनकी नियत पर भी सवाल खड़े किए जाने योग्य हैं।

ऐसा लगता है जैसे देश-धर्म-संस्कृति, आस्था एवं परंपरा की खिल्ली उड़ाना इन स्टैंड-अप कॉमेडी एवं टीवी से जुड़े हास्य कलाकारों का जन्मसिद्ध अधिकार हो! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर नैतिकता एवं मर्यादा की सभी सीमाएं लांघ जाने वाले इन कथित हास्य-कलाकारों को यह सोचना होगा कि इसी संविधान ने प्रत्येक नागरिक के लिए कुछ मौलिक कर्त्तव्यों का भी निर्धारण किया है? क्या कला एवं हास्य की आड़ में उन मौलिक कर्त्तव्यों की उपेक्षा, जनभावनाओं का अनादर उचित है? किसी समाज की उदारता या खुलेपन को उसकी कमज़ोरी नहीं समझा जाना चाहिए।

सवाल यह है कि 'सेंस ऑफ ह्यूमर' एवं दर्शकों की रुचि के नाम पर लोक-स्वीकृत एवं स्थापित मान्यताओं-मर्यादाओं का उल्लंघन कब तक किया जाता रहेगा? दर्शकों की रुचियों का परिष्करण और परिमार्जन भी तो संभव है। हमें नहीं भुलाना चाहिए कि दृश्य-श्रव्य माध्यमों का दर्शकों के चेतन-अवचेतन मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र पर केंद्रित एक छोटे-से नाटक ने बालक मोहनदास के जीवन की दिशा बदलकर रख दी थी। बात-बात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के झंडे-बैनर उठाने, दलीलें देने, पैरवी करने वालों को आज नहीं तो कल यह निश्चित समझना पड़ेगा कि हास्य एवं मनोरंजन के नाम पर जब सस्ती और फूहड़ चीजें परोसी जाने लगती हैं और समाज के कथित बौद्धिक एवं आभिजात्य वर्ग को उसमें रस मिलने लगता है तो भोंडेपन व फूहड़ता की सीमा कहाँ जाकर खत्म होगी, यह कदाचित उन्हें परोसने और उनमें रस लेने वाले श्रोता या दर्शक-वर्ग भी नहीं जानते!

स्टैंडअप कॉमेडी के अलावा हास्य के ऐसे-ऐसे कार्यक्रम इन दिनों टेलीविजन पर दिखाए-परोसे जाने लगे हैं, जिन्हें पूरे परिवार के साथ बैठकर देखा नहीं जा सकता। छोटे-बड़े परदे के तमाम पुरुष सितारों में आजकल अधेड़ औरतों का रूप धरकर बेतुके-बेतरतीब प्रदर्शन करने की होड़-सी मची है। इनमें मसाला व दुहराव अधिक है, ताज़गी कम। इसीलिए ये सितारे कुछ देर चमक कर फीके पड़ जाते हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत हास्य शिष्ट- शालीन -सहज-स्वस्थ हास्य नहीं हैं। इन्हें देखने के पश्चात गुदगुदी कम, झेंप अधिक पैदा होती है। ये गुदगुदाते कम सनसनी, अश्लीलता और फूहड़ता अधिक परोसते हैं। इनके द्विअर्थी संवादों- चुटकुलों- प्रसंगों पर गूँज उठने वाले रिकॉर्डेड और कृत्रिम ठहाके स्वस्थ और स्वाभाविक नहीं, बल्कि रुग्ण और अस्वाभाविक जान पड़ते हैं। हास्य के नाम पर संपूर्ण समाज व राष्ट्र के प्रेरणा-पुरुषों, देव-दुर्लभ प्रतिभा के धनी साधकों, जीवंत आदर्शों आदि का अपमान इसी रुग्ण मानसिकता की विद्रूप-वीभत्स-निर्लज्ज अभिव्यक्ति है, रातों-रात प्रचार पाने एवं प्रसिद्धि बटोरने का पागलपन है।

इन स्टैंडअप कॉमेडियनों या हास्य-मनोरंजन का कार्यक्रम प्रस्तुत करने वालों को कोई तो लक्ष्मण-रेखा खींचनी पड़ेगी, कहीं तो विराम लगाना पड़ेगा! कौन किसी को रोक सका है सहज हास्य-विनोद से, क्या इस देश में हास्य कवि-सम्मेलनों की स्वस्थ एवं समृद्ध परंपरा नहीं रही, क्या ऑफिस-ऑफिस, देख भाई देख, श्रीमान-श्रीमती, उल्टा-पुल्टा, फ्लॉप शो, वागले की दुनिया, मुंगेरी लाल के हसीन सपने, तारक मेहता का उलटा चश्मा जैसे सहज हास्य से परिपूर्ण अनेकानेक कार्यक्रमों पर दर्शकों ने अपार-असीम प्यार नहीं लुटाया, क्या 2005 में प्रसारित द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज जैसे शो में रोज़मर्रा के जीवन से उठाए गए सहज हास्य-प्रसंगों को दर्शकों ने हाथों-हाथ नहीं लिया? क्या सुनील पाल, राजू श्रीवास्तव, अहसान कुरैशी, प्रताप फ़ौजदार जैसे कलाकार आज भी दर्शकों के ज़ेहन में ज़िंदा नहीं हैं?

हंसना-हंसाना भला किसे अच्छा नहीं लगता! मानव-स्वभाव से जुड़ी तमाम दुर्बलताओं को भी तो हास्य का विषय बनाया जा सकता है; सदैव फूले हुए गुब्बारे जैसे अपने दंभ-दर्प-अभिमान से लेकर जीवन और जगत की तमाम विसंगतियों- विचित्रताओं- विडंबनाओं पर भी तो हँसा-हँसाया जा सकता है?

दर्शकों की रुचि और लोकप्रियता के नाम पर कुछ भी परोसने वालों को याद करना होगा कि हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी जैसे फिल्मकार सहज घरेलू दृश्यों, सादगी और संवाद के बल पर ही दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देते थे। याद कीजिए कि कैसे किशोर कुमार, आई.एस. जौहर, महमूद, जॉनी वाकर, जगदीप, जॉनी लीवर, असरानी जैसे हास्य कलाकारों का नाम सुनते ही होठों पर हंसी तैरने लगती थी। कितना अच्छा हो कि हमारे स्टैंडअप कॉमेडियनों में भी इन सबकी तरह गहरा व सहज हास्य-बोध हो।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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