Hindutva in Films: भगवा ज्वार में हिन्दुत्ववादी फिल्मों पर जोर
Hindutva in Films: विवेक अग्निहोत्री की 'कश्मीर फाइल्स' ने फिल्मी दुनिया में तहलका मचा दिया था। विपुल शाह और सुदीप्तो सेन की 'द केरला स्टोरी' से भी लोग कम नहीं चौंके, लगा कि भारत में अभी कई सच्ची कहानियां देखनी बाकी हैं और उनको दिखाने का ढंग भी भारत की फिल्मी दुनिया में बदलने वाला है।
लेकिन इन दोनों फिल्मों के बाद जिस तरह से एक के बाद एक भगवा खेमे से जुड़े विषयों पर फिल्मों की घोषणा हुई है, उससे ऐसा लग रहा है मानो हर कोई बहती गंगा में हाथ धोने के मूड में है। बहुत ही कम लोग गंभीर दिख रहे हैं, बाकी सब इस माहौल का फायदा उठा लेने के मूड में हैं।

हालांकि उनके मुद्दे जितने बड़े हैं, उनके प्रयास उसके एक प्रतिशत के बराबर भी नहीं दिखते। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास बजट और बड़ी स्टारकास्ट होने के बावजूद उन्होंने इस माहौल का फायदा लेकर अपने एजेंडे वाली मूवी चलाने की कोशिश की, लेकिन हाथ जला लिए।
ह्रितिक-दीपिका की 'फाइटर' पहले वीकेंड के बाद ही बॉक्स ऑफिस पर फुस्स हो गई है। डायरेक्टर ने बालाकोट स्ट्राइक पर बनी मूवी कहकर खूब प्रचार किया, भगवा खेमे को खुश करने वाले कई डायलॉग्स रखे जैसे कि, "उनको भी तो पता चले कि बाप कौन है", "तुमने कब्जा कर रखा है लेकिन मालिक हम हैं"।
फिल्म के डायलॉग लिखने वालों ने 'इंडिया ऑक्यूपाइड पाकिस्तान' जैसे नए शब्द रचे, लेकिन मूवी चल नहीं पाई क्योंकि बालाकोट स्ट्राइक को अंजाम देने वाले पांच पायलटों का सेकुलरीकरण कर उनमें सिख, मुस्लिम शामिल कर दिए गए। अभिनंदन की जगह एक सिख और एक मुस्लिम पायलट को पाकिस्तान की गिरफ्त में दिखा मुस्लिम को शहीद कर दिया गया। सच्चाई के साथ मूवी में की गई इतनी ज्यादा तोड़मरोड़ को लोग बर्दाश्त नहीं कर पाए।
एक फिल्म नवम्बर से ही रिलीज के लिए अटकी है, तेलंगाना विधानसभा चुनावों में उसकी खूब चर्चा रही। फिल्म का नाम है 'रजाकार: द साइलेंट जेनोसाइड ऑफ हैदराबाद'। जो इस नाम का मतलब समझते हैं, समझ सकते हैं कि अगर हैदराबाद के निजाम ने अलग देश बनाने की कोशिश की तो उसकी वजह थे रजाकार और उनका नेता कासिम रिजवी। एक बीजेपी विधायक उम्मीदवार ने इस फिल्म को प्रोडयूस किया है और अभी तक ये रिलीज के लिए अटकी है।
गोधरा कांड के बाद हुआ दंगा पंकज कपूर की 'मौसम', ढोलकिया की 'परजानियां' जैसी तमाम फिल्मों का हिस्सा बना, लेकिन गोधरा में जिस कांड से दंगे की शुरूआत हुई थी, उसकी कहानी किसी ने नहीं दिखाई थी। अब एक नहीं बल्कि दो-दो फिल्में इस साबरमती एक्सप्रेस कांड पर आ रही हैं। इनमें से एक रणवीर शौरी की है 'एक्सीडेंट ऑर कॉन्सपिरेसी गोधरा', जिसका टीजर तो पिछले साल ही मई में आ गया था, लेकिन कम बजट के चलते फिल्म चर्चा में नहीं आ पाई। अब कहा जा रहा है कि ये मूवी एक मार्च 2024 को रिलीज होगी।
आनन-फानन में रिलीज की वजह ये बताई जा रही है कि एकता कपूर ने भी इसी विषय पर एक मूवी का ऐलान कर दिया है, नाम होगा 'द साबरमती रिपोर्ट' और हीरो होंगे 12वीं फेल वाले विक्रांत मैसी। कहा जा रहा है कि सारी तैयारियां इस फिल्म की पूरी हैं, फिल्म 3 मई को रिलीज भी हो जाएगी। यानी देश में आम चुनाव का माहौल भुनाने के लिए इस फिल्म को जल्दी रिलीज किया जा रहा है।
भगवा खेमे को खुश करने के नाम पर लोग मुद्दा बड़ा पकड़कर छोटे कलाकारों और कम बजट को लेकर भी फिल्म बनाने का ऐलान कर रहे हैं। बाद में फिल्में कहां जाती हैं, पता नहीं चल पा रहा है। लेकिन एक मुद्दा जो एक बड़ी स्टारकास्ट और मेगाबजट व ज्यादा चर्चा व बहस मांगता था, वो पेट में ही खत्म हो जाता सा लग रहा है।
यह एक बड़ा मुद्दा था, 'अजमेर ब्लैकमेल कांड'। अजमेर दरगाह के खादिमों और वहां के यूथ कांग्रेसियों के चेहरों पर दशकों से लगा एक ऐसा धब्बा, जिसे ना मिटा पा रहे हैं और ना छुपा पा रहे हैं। लगा था 'अजमेर 92' मूवी उन पीड़िताओं के साथ न्याय करेगी, लेकिन मूवी एकदम कांग्रेसी पैसे से बनी फिल्म लगी, ना कांग्रेस का नाम लिया गया और ना ही अजमेर दरगाह के कनेक्शन का। बल्कि एक दोयम दर्जे की फिल्म बनी, जिसने पूरा मामला एक्सपोज करने वाले पत्रकार को ही दलाल की तरह दिखा दिया गया।
ऐसे ही अयोध्या के राम मंदिर निर्माण को कैश करने की कोशिश की फिल्म '695' ने। फिल्म के टाइटल में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा विध्वंस, 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले और 5 अगस्त 2020 को मंदिर के शिलान्यास की घटनाओं पर फोकस किया गया है। इसलिए इसका नाम '695' रखा गया।
फिल्म को चर्चा में लाने के लिए टीवी के मशहूर रामायण धारावाहिक के राम अरूण गोविल को भी रोल दिया गया और अखिलेन्द्र मिश्रा, मुकेश तिवारी, मनोज जोशी और गोविंद नामदेव जैसे चरित्र कलाकारों को लिया गया, लेकिन फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगा। सो समझना मुश्किल नहीं कि लोग बस चर्चा में रहने या ओटीटी के जरिए लागत निकालने के लिए ही फिल्म बना रहे हैं बस।
भगवा खेमे के प्रेरणा पुरूष वीर सावरकर पर फिल्म लेकर आ रहे हैं रणदीप हुड्डा, टाइटल है 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर'। वो भी इसे चुनावों से पहले ही 22 मार्च को रिलीज करने जा रहे हैं। लेकिन लोग ऐसा मानते हैं कि सावरकर का जो कद था उसके आगे रणदीप हुड्डा और अंकिता लोखंडे जैसे चेहरे बड़े कमजोर चेहरे हैं, उन्हें नहीं लगता कि इतने छोटे बजट व छोटे सितारों की मूवी सावरकर के साथ न्याय कर पाएगी, हां इन्हें कुछ फायदा हो जाएगा, ये अलग बात है।
2022 में तमिलनाडु से एक चौंकाने वाली खबर आई थी जब कावेरी नदी के किनारे बसे तिरुचरापल्ली के एक गांव तिरुचेन्थुराई को तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने अपनी सम्पत्ति घोषित कर दिया। जबकि इस गांव में 1500 साल पुराना एक मंदिर भी है। राष्ट्रीय मीडिया में ये मुद्दा लम्बे समय तक छाया रहा।
अब कहा जा रहा है कि फिल्म 'आखिर पलायन कब तक' नाम की जो फिल्म बनी है, वो इसी मुद्दे पर है कि वक्फ बोर्ड किसी भी सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति कैसे घोषित कर सकता है और इसके खिलाफ किसी कोर्ट में सुनवाई कैसे नहीं हो सकती। इस फिल्म का टीजर कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी की तरह हैरान करता है, लेकिन मुकुल विक्रम की ये मूवी ऐसा लगता है मानो अकेले चरित्र अभिनेता राजेश शर्मा के कंधों पर टिकी है। अब 16 फरवरी को ये मूवी रिलीज होने जा रही है, चुनावी माहौल चल ही रहा है, लेकिन अच्छे थियटरों तक पहुंच पाएगी कि नहीं, इसमें संदेह है।
ऐसी तमाम फिल्में हैं जो भगवा खेमे के ज्वार में अपनी फिल्में हिट करवाने या चर्चा में लाने के मकसद से आनन फानन में छोटे बजट औऱ छोटे कलाकारों के साथ ही रिलीज कर दी गईं या रिलीज करने की तैयारी है। राम नाम की लूट में जिस तरह तमाम भजन रिलीज हुए वैसे ही 2024 के चुनावों को ध्यान में रखकर कई फिल्में भी रिलीज हो रही हैं। वो फिल्में चलें न चलें लेकिन हर किसी को हिन्दुत्ववादी चर्चा में आने की चिंता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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