हिन्दी के बिना हिन्दुस्तान सशक्त नहीं होगा
संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार किया था इसलिए हर साल 14 सितंबर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस तरह आज इस साल का सरकारी हिन्दी दिवस है। सवा अरब के देश में शायद सवा प्रतिशत से ज्यादा लोगों को भी ये बात न मालूम हो, मालूम होगा भी तो कोई लेना देना नहीं होगा।

हिन्दी दिवस हमारे सरकारी कार्यालयों में यह एक वार्षिक कर्मकांड से ज्यादा कुछ नहीं होता। हिंदी को लेकर हिन्दी भाषी लोग ही पूरी तरह उदासीन हैं। लेकिन हिन्दी का प्रश्न भारत की राष्ट्रीयता से जुड़ा प्रश्न है। हर राष्ट्र की एक भाषा होती है और वह राष्ट्र अपनी भाषा पर गर्व करता है। उसे अपने देश के हर घर में और दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने की कोशिश करता हैं। लेकिन भारतवर्ष के दूसरे प्रांतों की बात तो छोड़िए हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों को ही हिन्दी पर गर्व नहीं है।
महात्मा गांधी और हिन्दी
भाषा मनुष्य की पहचान हैं। देश का नागरिक मनुष्यवत गरिमा से रहे, इसके लिए जरूरी हैं कि वह अपनी भाषा का प्रयोग हर स्तर पर, हर जगह और हर समय करे। महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन में हिन्दी को घर घर पहुचानें की कोशिश की और कांग्रेस के नेताओं को भी हिन्दी में बात करने के लिए मजबूर किया।
1917 में गुजरात की एक सभा में गांधी ने जिन्ना को अंग्रेजी में बोलने से रोक कर हिन्दी में बोलने के लिए कहा था। जिन्ना ने हिन्दी में तो नहीं लेकिन हिन्दी की जगह गुजराती में भाषण दिया। उसी साल कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी ने हिन्दी न बोल पाने के कारण तिलक की चुटकी ली थी। गांधी ने पूछा कि जब लार्ड डफरिन और लेडी चेम्सफोर्ड ने हिन्दी सीखने की कोशिश की तथा रानी विक्टोरिया अपने हिन्दुस्तानी सेवकों से उनकी भाषा में बात करने की कोशिश करती हैं, तो फिर तिलक हिन्दी सीखने की कोशिश क्यो नहीं करते?
गांधी ने नेहरू को भी हिन्दी बोलने और ज्यादातर पत्राचार हिन्दी में करने के लिए कहा था। डॉ भीमराव अंबेडकर भी हिन्दी के महत्व को समझते थे इसलिए उन्होंने कहा था कि "जब जनता की भाषा में राजकाज होगा तब कतार में खड़े सबसे अंतिम व्यक्ति की ओर ध्यान जाएगा।" इसी तरह हिन्दी के महत्व पर महात्मा गांधी ने कहा था कि "जैसे बच्चे के विकास के लिए मां का दूध आवश्यक है, उसी तरह बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए प्रारंभिक शिक्षा उसकी मातृभाषा में आवश्यक है।"
हालांकि अंग्रेजी का महत्व ये नेता भी कम नहीं कर पाये और अंबेडकर कहा करते थे कि "अंग्रेज़ी इस देश में बाघिन का दूध है- इसे पी लेने वाले को भारत में कोई छू नहीं सकता।" इस मामले में अंग्रेजी के जानकार गांधी का रुख अलग था। वो हिन्दी को राष्ट्रीय एकता की भाषा के रूप में पहचान चुके थे इसलिए हिन्दी भाषी प्रदेशों में ही नहीं बल्कि गैर हिन्दी भाषी प्रदेशों में भी हिन्दी को बढावा देते थे। गांधी जी ने काका साहेब कालेलकर को हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए असम भेजा था।
हिन्दी विरोधी अफसरशाही
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने और सरकारी कामकाज की भाषा बनने से रोकने में देश की अफसरशाही का बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेजी राज से निकले अग्रेजीदां अफसरों ने स्वतंत्र राष्ट्र की नौकरशाही में हिन्दी के लिए दरवाजें बंद ही कर दिए। आजादी के बाद भी नौकरशाहों की भाषा अंग्रेजी ही बनी रही। नौकरशाहों को पता था कि यदि पूरा राजकाज हिन्दी में चलने लगा तो देश में नौकरशाही की जगह लोकशाही स्थापित हो जाएगी। इसलिए देश की नौकरशाही ने रास्ता निकाला कि साल में एक दिन हिन्दी दिवस मनाएं और पूरे साल शासन प्रशासन में अंग्रेजी चलाएं। यही कारण है कि आज आजादी के 75 साल बाद भी अंग्रेजी मालिक बनकर कुर्सी पर बैठी हैं और हिन्दी नौकर के समान उसके सामने घुटनों के बल बैठी है।
स्वार्थ की राजनीति भी हिन्दी की राह में बड़ा रोड़ा हैं। कुर्सी की कामना और सुविधा की साधना ने हिन्दी को आहत किया हैं। आज हिन्दी अगर सरकारी काम काज में वह जगह नहीं पा सकी है जो उसे मिल जाना चाहिए था तो इसका कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव ही है। इस स्थिति को बदला जा सकता हैं, लेकिन इसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जैसी कभी मुलायम सिंह यादव में थी या फिर आज जैसी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह में दिखती है।
भारत में अब तक नेताओं और नौकरशाहों की मिलीभगत से हिन्दी राजकाज की भाषा नहीं बन पाई। लेकिन हिन्दी का दुर्भाग्य यह भी रहा कि हिन्दी अपने ही भाषाई प्रदेशों में भी पूरी तरह से घर की भाषा, व्यवसाय की भाषा, राजकाज की भाषा, शिक्षा की भाषा नहीं बन सकी। हिन्दी अपने ही घर में दो हिस्सों में बंट गई।
अंग्रेज़ी अगर आज अमीर इंडिया की भाषा हुई जा रही है तो हिन्दी ग़रीब भारत की भाषा है, जो गरीबों की संपर्क भाषा के रूप में बदलती जा रही है। हिन्दीभाषी राज्यों में गरीब और छोटे मोटे रोजगार करने वालो की भाषा हिन्दी बनी, जबकि हिन्दी प्रदेशों में ही समृद्ध वर्ग, अफसरशाही की भाषा अंग्रेजी बनी रही।
हिन्दी और हिन्दुस्तान
हिन्दी को दूसरे दर्जे की भाषा हिन्दी प्रदेशों में मानने का परिणाम यह हुआ कि शिक्षा, संस्कृति, शक्ति, प्रतिष्ठा, सृजन, सत्ता के हर स्थल से हिन्दी लगभग बेदखल हो चुकी है। उसका परिणाम यह हुआ है कि हिन्दी अब देश के समूचे सत्ता तंत्र में, देशवासियों के भाग्य निर्धारण में, प्रतिभा के विकास और राष्ट्र के नवोन्मेष में कहीं नहीं है। लेकिन आम जन की संपर्क भाषा होने के कारण चुनाव प्रचार में, वोट मांगने में, लोकप्रियतावादी राजनीति और सत्ता प्राप्ति में हिन्दी की उपयोगिता बढ़ी है। राजनैतिक दलों और नेताओं के लिए हिन्दी चुनाव की भाषा तो बन गई, लेकिन चुनाव के बाद सरकार की भाषा नहीं बन सकी।
भारत में अंग्रेजी के दबदबे का परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेशों में भी हिन्दी खत्म होने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है। नई पीढ़ी द्वारा हिन्दी का उपयोग सिर्फ बाजार, संवाद, मनोरंजन आदि में ही थोड़ा बहुत किया जा रहा है। परंतु हमें समझना होगा कि हिन्दी भारत की संभावना है। इस भाषा के पास संसार की किसी भी भाषा से बड़ा शब्दों का स्रोत है। संस्कृतियों की गहनतम रचनात्मक वैविध्यपूर्ण पूंजी है।
भारतीय इतिहास की हजारों साल की यात्रा की विरासत को धारण कर सकने लायक और वैश्विक ज्ञान संपदा को अपने भीतर समा सकने लायक संपूर्ण सृजनात्मक शक्ति है। फिर वे करोड़ों लोग हैं, जिन्हें सशक्त कर हिन्दी इस देश में ज्ञान, चेतना, विचार, सृजन का एक अदम्य विराट प्रवाह बन सकती है।
हिन्दी सांप्रदायिक राजनीति का मोहरा बनेगी, बाजार का माध्यम बनेगी या एक बनते हुए राष्ट्र की मेधा, शक्ति, प्रतिभा का महाप्रभाव बनेगी, यह इस देश की जनता पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना निश्चित है कि हिन्दी के सशक्त हुए बिना हिंदुस्तान का सशक्त होना संभव नहीं है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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