हिमाचल में लोकसभा से ज्यादा विधानसभा उपचुनाव की चर्चा
Himachal Pradesh Chunav: हिमाचल प्रदेश में लोकसभा की 4 सीटों के साथ विधानसभा की 6 सीटों पर भी मतदान होने जा रहा है। छोटे से राज्य की इतनी अधिक विधानसभा सीटों पर मतदान इसलिए हो रहा है कि कुछ माह पूर्व हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के बागी विधायकों ने भाजपा के उम्मीदवार हर्ष महाजन को वोट देकर कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को हरा दिया था।
बाद में स्पीकर ने इन सभी विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था। ऐसे में लोकसभा चुनाव के साथ हो रहे विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के सभी बागी विधायक भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। इनकी जीत हार से ही सुक्खू सरकार के भविष्य का फैसला होगा।

लोकसभा चुनाव की बात करेें तो हिमाचल की मंडी सीट सबसे हॉट और देश भर में चर्चा में रहने वाली सीट बन गई है। इसका कारण यह है कि भाजपा ने यहां से अभिनेत्री कंगना राणावत को मैदान में उतारा है। 2019 के लोकसभा चुनाव मेें भाजपा ने हिमाचल की सभी 4 सीटें हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी और शिमला जीती थी लेकिन मंडी से भाजपा सांसद रहे राम स्वरूप शर्मा का निधन होने के कारण हुए उपचुनाव में कांग्रेस की प्रतिभा सिंह ने यह सीट जीत ली थी।
प्रतिभा सिंह हिमाचल कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष है। इस बार प्रतिभा सिंह ने मंडी से खुद चुनाव न लड़कर अपने बेटे और सुक्खू सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह को मैदान में उतारा है। मंडी सीट पर कांटे की टक्कर है। प्रधानमंत्री मोदी कंगना राणावत के लिए रैली कर चुके हैं। मोदी की लोकप्रियता, भारतीय जनता पार्टी के मजबूत संगठन और प्रतिभा सिंह एवं मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू में सार्वजनिक हो चुके मतभेदों के बाद कांग्रेस के लिए मंडी की राह आसान नहीं है।
कहा जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और उनके मंत्री बेटे विक्रमादित्य के खुले विरोध के बाद बड़ी मुश्किल से कुर्सी बचा सके मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू भले ही विक्रमादित्य का प्रचार कर रहे हों लेकिन अंदर से वह विक्रमादित्य की हार से प्रतिभा सिंह को कमजोर देखना चाहते हैं। वहीं प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह अपनी सीट से लड़ रहे अपने बेटे विक्रमादित्य की हर हाल में जीत देखना चाहती है। कांग्रेस जैसा गुटीय संघर्ष भाजपा में भी मंडी सीट पर दिख रहा है। कई दिग्गज नेताओं की दावेदारी को किनारे कर सीधे कंगना राणावत को टिकट देने के भाजपा हाईकमान के फैसले का मंडी में अंदरूनी विरोध भी जमकर हो रहा है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों विरोधी से ज्यादा आपसी भितरघात से परेशान है।
मंडी सीट पर जितना जोर भाजपा को लगाना पड़ रहा है, उतनी ही आसान हिमाचल की हमीरपुर लोकसभा सीट भाजपा के लिए दिख रही है। राजपूत बाहुल्य हमीरपुर सीट से भाजपा और कांग्रेस दोनों ने राजपूतों को टिकट दिया है। राजपूत वोट दोनों में बंटना तय है, ऐसे में हार जीत का फैसला करने में 3.23 लाख अनुसूचित जाति के वोटर्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगे। मुख्यमंत्री सुक्खू और उपमुख्यमंत्री अग्निहोत्री का गृह क्षेत्र हमीरपुर ही है। ऐसे में सुक्खू की प्रतिष्ठा भी इस सीट से जुड़ी होने के कारण सुक्खू यहां लगातार प्रचार कर रहे हैं।
हमीरपुर से मोदी सरकार के मंत्री अनुराग ठाकुर इस सीट से लगातार तीन बार 2009, 2014 और 2019 में जीत चुके हैं और चौथी बार भी उनके लिए कोई चुनौती नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के सतपाल रायजादा के लिए राह मुश्किल है। अनुराग से पहले उनके पिता प्रेम कुमार धूमल इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
हिमाचल में जिन छह विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहा है, उसमें से चार सीटें इसी हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में आती हैं। 17 विधानसभा सीटों वाले हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के दस, भाजपा के पांच और दो निर्दलीय विधायक जीते थे। लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में दो निर्दलीय और चार कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं। सुक्खू सरकार रहेगी या जाएगी इसका निर्णय इसी हमीरपुर लोकसभा के साथ होने जा रहे छह विधानसभा उपचुनाव से तय होगा।
मुख्यमंत्री सुखविंदर इसी हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में आने वाली नादौन सीट से और उपमुख्यमंत्री हरोली सीट से विधायक हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा भी हमीरपुर लोकसभा सीट के साथ-साथ यहां की चार सीटों पर हो रहे विधानसभा उपचुनाव से भी जुड़ी है। हमीरपुर के अंदर आने वाली चार सीटें सुक्खू सरकार के भाग्य का फैसला करेगी।
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित शिमला सीट पर भाजपा से सुरेश कश्यप और कांग्रेस से विनोद सुल्तानपुरी मैदान में हैं। कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे विनोद सुल्तानपुरी के पिता कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी छह बार सांसद रह चुके हैं। उसके बाद भी कांग्रेस के लिए यह सीट आसान नहीं है। भाजपा के सुरेश कश्यप का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। शिमला सीट में सोलन, शिमला और सिरमौर जिले आते हैं। शिमला लोकसभा में आने वाली 17 विधानसभा सीटों में से 13 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। उसके बाद भी यह सीट कांग्रेस के लिए मुश्किल लग रही है।
कांगड़ा लोकसभा सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा का मुकाबला भाजपा के डॉ राजीव भारद्धाज से है। यह सीट भाजपा का मजबूत गढ़ बन चुकी है। पिछले नौ चुनाव में भाजपा यहां सात बार जीत चुकी है और पिछले तीन चुनाव से भाजपा यहां से लगातार जीत रही है। राजपूत, ब्राम्हण, ओबीसी और एससी मतदाता यहां प्रभावशाली हैं। ब्राम्हण मतदाता कुल मतदाताओं का 20 फीसदी है।
2019 में कांगड़ा से सांसद बने किशन कपूर को 72 फीसद से अधिक वोट मिले थे। उसके बाद भी भाजपा ने उनका टिकट काट दिया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया था और कांगड़ा जिले की 10 विधानसभा सीटें जीती थी। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में कुल 17 विधानसभा सीटे हैं जिसमें से 11 पर कांग्रेस और 5 पर भाजपा के विधायक हैं। एक धर्मशाला सीट पर विधानसभा चुनाव भी होना है।
मनमोहन सरकार में मंत्री रहे और कांग्रेस के बड़े नेता आनंद शर्मा ने 1982 में हिमाचल से विधानसभा चुनाव हारने के बाद कोई चुनाव नहीं लड़ा था और अब 42 साल बाद कांगड़ा से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा के राजीव भारद्धाज भी पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं।
2019 में भारतीय जनता पार्टी को हिमाचल प्रदेश से सबसे ज्यादा 69.7 फीसद वोट मिले थे। कांग्रेस को सिर्फ 27.30 फीसद वोट मिले थे। ऐसे में इस बार वोटों में दोगुने से ज्यादा का अंतर पाटना कांग्रेस के लिए संभव नहीं लगता। सरकार पहले ही डांवाडोल स्थिति में है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू लोकसभा में कांग्रेस की जीत से ज्यादा विधानसभा की छह सीटों पर हो रहे उपचुनाव पर अपनी ताकत झोंक रहे हैं। मुख्यमंत्री को मालूम है कि वह लोकसभा की सभी चार सीटे हार जाएं लेकिन विधानसभा के उपचुनाव में सभी छह सीटें जीत जाते हैं तो वह मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
भारतीय जनता पार्टी लोकसभा की चार सीटों के साथ साथ विधानसभा की छह सीटें भी जीत कर केन्द्र में और प्रदेश में भी भाजपा की सरकार बनाने की कोशिश में है। ऐसे में हिमाचल का यह लोकसभा चुनाव प्रदेश सरकार का भी भविष्य तय करेगा। हिमाचल में कांग्रेस सरकार रहती है या भाजपा आती है, इसका फैसला 4 जून को होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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