हरियाणा में भाजपा ने खुद बुलाया है संकट
Haryana Government: भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और मौजूदा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी यह भूल गए थे कि 1999 में ओडिशा के मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग के एक वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई थी|
तब गिरधर गोमांग नए नए मुख्यमंत्री बने थे, उन्होंने तब तक अपनी लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था| सोनिया गांधी ने उन्हें दिल्ली पहुंच कर वाजपेयी सरकार के खिलाफ रखे अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में वोट करने को कहा था|

उन्हीं के एक वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई थी| नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाए जाते समय भाजपा सरकार तलवार की धार पर थी, क्योंकि खट्टर सरकार को समर्थन दे रही जेजेपी को भाजपा ने गठबंधन से बाहर करने का फैसला कर लिया था| इसके बाद इसकी कोई जरूरत नहीं थी कि मनोहर लाल खट्टर अपनी विधानसभा सीट से इस्तीफा देते|
इसके अलावा चौधरी देवीलाल के बेटे निर्दलीय विधायक रंजीत सिंह चौटाला ने भी इसलिए विधायक पद से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे| दलबदल विरोधी क़ानून के अनुसार कोई निर्दलीय विधायक किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल नहीं हो सकता, इसलिए भाजपा में शामिल होते ही उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा| भाजपा ने निर्दलीय होते हुए उन्हें मंत्री तो बना ही दिया था, वह सदन से बाहर भाजपा के सदस्य बन सकते थे, सदन के भीतर भाजपा के सहयोगी सदस्य के तौर पर रह सकते थे|

भाजपा की इन दो रणनीतिक गलतियों के कारण नायब सिंह सैनी सरकार पर अब खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि 12 मार्च को जिन छह निर्दलीय विधायकों ने उन्हें सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया था उनमें से तीन निर्दलीय विधायकों सोमबीर सांगवान (दादरी), रणधीर सिंह गोलन (पुंडरी) और धर्मपाल गोंदर (नीलोखेड़ी) ने समर्थन वापस ले लिया है|
सैनी की शपथ ग्रहण के समय भाजपा के 41 विधायक थे, उन्हें छह निर्दलीय और हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा का समर्थन था| इन 48 विधायकों में से दो इस्तीफा दे चुके और तीन समर्थन वापस ले चुके, यानी 88 के सदन में स्पीकर ज्ञान चंद गुप्ता समेत भाजपा सरकार को सिर्फ 43 सदस्यों का समर्थन बचा है| भाजपा के 40 विधायकों के अलावा दो निर्दलियों नयन पाल रावत और राकेश दौलताबाद के अलावा हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा का समर्थन ही बना हुआ है| बड़ा सवाल यह है कि विधानसभा में अल्पमत में आई नायब सैनी सरकार इस खतरे से कैसे निपटेगी|
हर गुजरते पल के साथ हरियाणा की राजनीति में नए ट्विस्ट सामने आ रहे हैं| साढ़े चार साल तक भाजपा सरकार को बचाए रखने वाली जेजेपी ही अब उसका गेम बिगाड़ने में जुट गई है| खट्टर सरकार में साढ़े चार साल उप मुख्यमंत्री रहे दुष्यंत चौटाला ने सरकार बनाने के लिए विपक्ष के नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को बाहर से समर्थन का एलान कर दिया है| जेजेपी के विधायक देवेन्द्र सिंह चौटाला ने कहा है कि भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को राज्यपाल के पास जाकर सरकार के अल्पमत में होने का सवाल उठाना चाहिए| दुष्यंत चौटाला ने कहा है कि अगर अल्पमत में आई हरियाणा की सरकार को गिराया जाता है, तो वह कांग्रेस को बाहर से समर्थन करेंगे| उन्होंने कहा कि यह कांग्रेस को सोचना है कि वह भाजपा सरकार को गिराने के लिए कोई कदम उठाएगी या नहीं|
फिलहाल कांग्रेस के पास 30 विधायक हैं, जेजेपी के दस विधायकों को मिलाकर यह आंकड़ा 40 होता है, जिन तीन निर्दलीय विधायकों ने नायाब सिंह सैनी सरकार से समर्थन वापस लेकर कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है, उनको मिलाकर विधायकों की संख्या 43 हो जाएगी| यानी दोनों तरफ 43-43 की संख्या हो गई है| बहुमत की कुंजी अब मेहम के निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू और ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी के एकमात्र विधायक अभय सिंह चौटाला के हाथ में है| अभय सिंह चौटाला अब तक तो कांग्रेस के साथ थे, लेकिन दुष्यंत चौटाला के कांग्रेस को समर्थन के बाद उनका रुख क्या होता है, यह देखना होगा| क्योंकि देवीलाल परिवार के इन दोनों वारिसों में राजनीतिक टकराव इतना ज्यादा है कि दोनों ने अपनी अलग अलग पार्टी बना रखी है|
वैसे यह थ्योरेटिकल गणित है कि सरकार अल्पमत में आ गई है, जमीनी हकीकत कुछ और है, क्योंकि दुष्यंत चौटाला के पांच विधायक देवेन्द्र सिंह बबली, राम कुमार गौतम, ईश्वर सिंह, राम निवास सुरजाखेड़ा और जोगी राम सिहाग उनके साथ नहीं है| इनमें से राज कुमार गौतम को छोड़ कर बाकी चार विधायक सैनी के शपथग्रहण समारोह में शामिल हुए थे, लेकिन उनके विश्वास प्रस्ताव पर मतविभाजन से पहले दुष्यंत चौटाला के व्हिप का पालन करते हुए वाकआउट कर गए थे|
दुष्यंत चौटाला ने अभी भी कहा है कि अगर कांग्रेस हरियाणा सरकार गिराने का कदम उठाती है, तो वह अपने विधायकों को व्हिप जारी करेंगे| हालांकि अगर उनके विधायक व्हिप का उल्लंघन करके सरकार बचा लेते हैं, तो व्हिप पर फैसला करना भाजपा के स्पीकर के हाथ में होगा| विधानसभा का कार्यकाल सिर्फ अक्टूबर तक है, तब तक तो वह व्हिप के उल्लंघन की याचिका पर फैसला टाल ही सकते हैं|
लेकिन सवाल यह है कि जब तक विपक्ष के नेता भूपेन्द्र हुड्डा राज्यपाल के सामने 45 विधायकों की परेड नहीं करवाएंगे, राज्यपाल मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए नहीं कहेंगें, या फिर हुड्डा विधानसभा सत्र का इन्तजार करें, ताकि सदन की बैठक शुरू होते ही वह अविश्वास प्रस्ताव पेश कर सकें|
नायब सिंह सैनी फिलहाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने रहेंगे, जब तक सदन में अविश्वास प्रस्ताव में उसकी हार नहीं हो जाती है, तब तक उनकी सरकार को अल्पमत में नहीं माना जाएगा| नियम के मुताबिक़ दो अविश्वास प्रस्तावों में कम से कम 180 दिन का अंतर होना चाहिए, लेकिन 13 मार्च को नायाब सिंह सैनी ने खुद विश्वास मत रखा था, न कि अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया था|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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