Supreme Court on Haldwani: अवैध कब्जे के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का दोहरा मापदंड क्यों?
सुप्रीम कोर्ट फरीदाबाद में रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जा करके बसाये गये संजय नगर को गिराने का आदेश देता है तो हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जा करके बसाये गये फारुख नगर को बचाता हुआ क्यों नजर आता है?

Supreme Court on Haldwani: सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कौल और जज अभय एस ओका ने गुरुवार को आनन फानन में कुछ याचिकाओं की सुनवाई की। ये याचिकाएं ह्यूमन राइट वाले वकील कोलिन गोन्जाल्विस और कांग्रेस के नेता तथा वकील सलमान खुर्शीद की ओर से दायर की गयी थीं। इन याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट से अपील की गयी थी कि वो हल्द्वानी में रेलवे विभाग की अवैध कब्जे वाली जमीन को खाली कराने के हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दें।
इन याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस जमीन पर बसे लोगों को रेलवे द्वारा जबरन हटाया जा रहा है जबकि उनमें से कुछ के पास जमीन का पट्टा है जबकि कुछ नजूल भूमि पर बसे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने इन याचिकाकर्ताओं की बात से सहमति जताते हुए मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि 40 हजार लोगों को रातों रात इस तरह से 7 दिन में नहीं हटाया जा सकता। जस्टिस ओका ने कहा कि "यह एक मानवीय मुद्दा है।" जबकि जस्टिस संजय कौल ने कहा कि "मुद्दे के दो पहलू हैं। एक, वे पट्टों का दावा करते हैं। दो, वे कहते हैं कि वो लोग 1947 के बाद वहां आये और जमीनों की उनके नाम नीलामी की गई। लोग इतने सालों तक वहां रहे। क्या आप कह सकते हैं कि सात दिनों में उन्हें हटा दें?"
अंतत: इस संक्षिप्त विचार विमर्श के बाद सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने राज्य सरकार को कोई विकल्प तलाशने का विकल्प देते हुए तत्काल प्रभाव से अवैध कब्जे और अतिक्रमण को हटाने पर रोक लगा दी। अब राज्य सरकार पहले उनके पुनर्वास की रूपरेखा बनाये उसके बाद रेलवे अपनी जमीन को खाली करा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने मानवाधिकारवादियों की अपील पर मानवीय फैसला जरूर ले लिया लेकिन इस फैसले से देश में अवैध कब्जा करने वालों का ही मनोबल बढेगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले किसी जिला कचहरी के फैसले नहीं होते। सुप्रीम कोर्ट के फैसले देशभर की अदालतों के लिए एक संदर्भ का काम करते हैं। ऐसे में क्या अब देश में जहां भी अवैध अतिक्रमणकारी हैं वो मानवीय आधार पर वही छूट प्राप्त कर सकते हैं जो हल्द्वानी के अवैध अतिक्रमणकारियों को सुप्रीम कोर्ट ने दे दी है।
जमीनों पर कब्जा करने वाले अवैध अतिक्रमणकारी हमेशा फर्जी कागजात के सहारे ही अपने काम को अंजाम देते हैं। तो क्या अब वो भी अदालतों में अपने कागजात पेश करके 'मानवीय' आधार पर मोहलत पाने के हकदार हो गये हैं?
फिर सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने 5 जनवरी को हल्द्वानी मामले में जो आदेश दिया है उसने सुप्रीम कोर्ट के अपने पुराने फैसलों और नजीर को ही पलट दिया है। 7 जून 2021 को अरावली की पहाड़ियों पर अवैध अतिक्रमणकारियों के खिलाफ सुनवाई के दौरान इसी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भूमि हड़पने वाले कानून का संरक्षण नहीं प्राप्त कर सकते।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अरावली रेन्ज में फरीदाबाद में 10 हजार आवासीय निर्माण को हटाने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ इन आवासों में रहने वालों के वकील सुप्रीम कोर्ट में राहत मांगने पहुंचे थे। तब सुप्रीम कोर्ट के जज ए एम खानविलकर और जज दिनेश माहेश्वरी ने साफ कहा था कि "हमारी राय में याचिकाकर्ता पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों से बंधे हुए हैं। इसलिए हम राज्य सरकार और फरीदाबाद नगर निगम को दिए गए अपने निर्देशों को दोहराते हैं और उम्मीद करते हैं कि नगर निगम वन भूमि पर सभी अतिक्रमणों को 6 सप्ताह से अधिक समय नहीं देगा और सबको हटाकर हमें सूचित करेगा।"
वहां सुप्रीम कोर्ट के जजों ने मानवीय आधार का सहारा क्यों नहीं लिया? क्या उन दस हजार आवासीय घरों में लोग नहीं रहते थे जिन्हें हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती से हरियाणा सरकार और फरीदाबाद नगर निगम को आदेश दिया था।
हल्द्वानी मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने एक और टिप्पणी की थी कि अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों का सहारा लेने की बात न की जाए क्योंकि यह मानवीय मामला है। लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट ने आज से साल भर पहले फरीदाबाद के ही न्यू टाउन स्टेशन के पास की जमीन को खाली कराने का आदेश दिया था। यहां भी रेलवे की जमीन पर संजय नगर नाम से अवैध कॉलोनी बसा ली गयी थी। उस समय फरीदाबाद नगर निगम ने 700 से अधिक मकानों को तोड़ने के लिए कई जिलों से पुलिस फोर्स बुलाई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को कोई ऐतराज नहीं हुआ।
फरीदाबाद के संजयनगर वाले मामले में तीन जजों की बेन्च सुनवाई कर रही थी। इस बेंच में जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रवि शामिल थे। तीन जजों की इस बेन्च ने साफ कहा था कि रेलवे की जमीन पर कब्जा करने वालों के खिलाफ दीवानी और आपराधिक कार्रवाई करने का अधिकार है। अगर कहीं रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण की बात सामने आती है तो अधिकारियों को अतिक्रमणकारियों के खिलाफ दोनों तरह की कार्रवाई करनी चाहिए। अगर अधिकारी ऐसा नहीं करते हैं तो उन अधिकारियों के खिलाफ ही कार्रवाई होनी चाहिए।
साफ है एक ओर सुप्रीम कोर्ट रेलवे की जमीन के ही मामले में इतनी कठोर टिप्पणी करता है और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ क्रिमिनल कार्रवाई करने की अनुमति देता है जबकि दूसरी तरफ हल्द्वानी मामले में तीन सदस्यों की पीठ के फैसले को दो सदस्यों वाली पीठ पलट देती है। वह मानवीय आधार तलाशने लगती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि क्या अब सुप्रीम कोर्ट भी किसी राजनीतिक दल की सरकार की तरह मामलों को देखती है और राजनीतिक नफा नुकसान को देखकर फैसले करती है?
2021 तक अगर सुप्रीम कोर्ट को यह लगता था कि अवैध अतिक्रमण को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता तो 2022 में ऐसा क्या हुआ कि पहले दिल्ली के जहांगीरपुरी और अब उत्तराखंड के हल्द्वानी में अवैध अतिक्रमण को हटाने पर रोक लगा दी? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि ये अवैध अतिक्रमणकारी किसी समुदाय विशेष से ताल्लुक रखते हैं इसलिए उनके लिए सुप्रीम कोर्ट का नजरिया बदल गया?
यह भी पढ़ें: Haldwani Land Encroachment: देश में अवैध बस्तियों के पनप चुके हैं सैकड़ों "हल्द्वानी"
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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