Haldwani Land Encroachment: देश में अवैध बस्तियों के पनप चुके हैं सैकड़ों "हल्द्वानी"
हल्द्वानी इकलौती ऐसी जगह नहीं है जहां इतने बड़े स्तर पर समुदाय विशेष द्वारा सरकारी जमीन कब्जा करने का मामला सामने आया है। देश भर में ऐसे सैकड़ों हल्द्वानी पनप चुके हैं।

Haldwani Land Encroachment: सुप्रीम कोर्ट की यह बात तार्किक है कि किसी जगह पर दशकों से बसे हजारों लोगों को आप बेघर नहीं कर सकते, जैसा कि हल्द्वानी में रेलवे की ज़मीन पर अवैध अतिक्रमण के मामले में होने जा रहा था। भले ही वे अवैध रूप से बसे हुए हों, लेकिन मानवीय पक्ष का ध्यान रखा जाना चाहिए।
लेकिन इस घटना का एक सकारात्मक पक्ष भी है और वह जागरूकता और चिंतन से जुड़ा है। हल्द्वानी कांड से पहले लोगों को अंदाज नहीं था कि करीब 50,000 की आबादी किसी सरकारी भूखंड पर कब्जा भी कर सकती है और 'कब्जे की निरंतरता' के आधार पर उसे हथिया भी सकती है।
इस मामले में ऐसा लगता है कि सरकार मुंह ताकती रह गई और उसकी जमीन उसके हाथ से निकल गई। अब रेलवे को तभी ये जमीन मिलेगी जब वह इन लोगों को वैकल्पिक जमीन मुहैया कराए और फाइलें दशकों तक दौड़ती रहेंगी और रेलवे की परियोजनाएं दशकों तक बाधित रहेगी।
कल्पना कीजिए कि वो जगह अगर सीमा क्षेत्र में हो और सुरक्षा के लिए जमीन खाली करवाना हो? जाहिर है, दुश्मन आपकी उदारता का फायदा उठा लेगा और जमीन आपके हाथ से निकल जाएगी।
यहां गलती किसकी है? अगर आपने दशकों तक अपनी जमीन को कब्जा होते रहने दिया और अचानक से 50 साल बाद जाग गए तो क्या वो जमीन आपकी हो जाएगी? बिल्कुल नहीं। भारत का इतिहास इसका उदाहरण है। 1947 में इस देश का बंटवारा हुआ क्योंकि वहां उन लोगों का शताब्दियों से बसेरा था जो इस देश को अपना मानने को तैयार नहीं थे। यह कटु है लेकिन सत्य है।
हल्द्वानी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर तो अपनी बात रखी लेकिन प्रशासनिक लापरवाही पर चुप्पी साध ली और वह गेंद सरकार के पाले में है जो अपनी निरंतरता में खुद ही इसकी दोषी है। सवाल यह है कि पिछले कई दशकों से जिन लोगों की वहां अतिक्रमण हटाने की जिम्मेवारी थी, उन पर क्या कार्रवाई हुई या होगी?
रेलवे और सामान्य नौकरशाह जो पेंशन लेकर राजधानियों में या विदेश में बाल-बच्चों के साथ आरामपूर्ण जीवन बिता रहे हैं, क्या उन पर कोई कार्रवाई होगी? वे कहेंगे, उन्होंने फाइल तो बढ़ाई थी, सरकार में बैठे नेताओं ने रोक दिया। कुल मिलाकर एक काहिल, लापरवाह, भ्रष्ट नौकरशाही और नेताओं के तंत्र ने उत्तराखंड जैसे राज्य में सिर्फ एक जगह पर करीब 50,000 लोगों को अवैध रूप से बसने दिया जिस राज्य की आबादी ही करीब एक करोड़ है।
आप कल्पना कीजिए कि पूरे राज्य में ऐसी अवैध बस्तियां कितनी होगीं और उसने डेमोग्राफी को कैसे खराब किया होगा। ये हाल सिर्फ उत्तराखंड का नहीं है, झारखंड जैसे राज्यों में भी, जहां जमीन अपेक्षाकृत ज्यादा है और आबादी कम है, वहां भी ये खेल चल रहा है। एक जमाने में आदिवासियों ने बाहरियों को 'दिकू' कहकर विरोध किया था, लेकिन वर्तमान के 'दिकुओं' के प्रति वे भी चुप्पी साधे हैं क्योंकि इसमें कथित सेक्यूलरिज्म आहत होता है।
इस देश में हल्द्वानी एक नहीं हैं, सैकड़ों हल्द्वानी पनप रहे हैं। इस कांड के चर्चा में आने का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि बाकी मामलों पर थोड़ी सतर्कता होगी और नौकरशाहों, नेताओं से लोग सवाल पूछेंगे। रही बात गरीबों को बसाने की तो उसके लिए बहुत सी योजनाएं सरकार चला रही हैं और उसका विस्तार भी करना चाहिए लेकिन 'सरकारी जमीन कब्जा करो' अभियान उसका हिस्सा नहीं है। महिला साक्षरता में सुधार कर, लक्षित वर्गों में आबादी और गरीबी को नियंत्रित करने के प्रयास करने चाहिए, जिनकी देश के कई समुदायों में सायास और अनायास कमी दिख रही है।
हल्द्वानी कांड ने ये भी साबित किया है कि इस देश में अभी तक 'स्टेट कैपिसिटी' नहीं पनप पाई है। स्टेट कैपिसिटी यानी कानून-व्यवस्था को लागू करवा पाने की राज्यतंत्र की क्षमता। देश में पुलिस सिस्टम इतना कमजोर है कि प्रतिव्यक्ति पुलिस दुनिया के निम्नतम स्तर में से एक है।
पुलिस अधिकारी कार्रवाई करते हुए डरते हैं। काम का बोझ ज्यादा है। वीआईपी सुरक्षा है। थानों में एफआईआर नहीं लिखी जाती। कोर्ट में स्टाफ कम हैं। मामले कोर्ट में दशकों तक घिसटते हैं। इसलिए दर्ज ही नहीं किए जाते। ऊपर से आदेश है कि क्राइम रेट कम करके दिखाओ। ऐसे में अधिकारी करें तो करें क्या? वे कागजी कार्रवाई भी करें तो उसका पालन कैसे होगा, इसका उपाय नहीं है। ऐसे में मामले टलते रहते हैं और अवैध बस्तियाँ बसती रहती हैं।अवैध बस्तियों
का मामला सिर्फ पुलिस, समुदाय विशेष का भी नहीं है। बल्कि केंद्रीकृत विकास का भी है। जब देश में कुछ शहरों में सारी बुनियादी सुविधाएँ होंगी तो गरीब गांव से उजड़कर आएंगे और अवैध रूप से विकास के टापू के आसपास बसना चाहेंगे। विकेंद्रित विकास में ऐसा नहीं होता।
लेकिन जिस देश का इतिहास शताब्दियों से बाहरी हमलों और लूटपाट से भरा हुआ हो, वहां का शासकवर्ग विकेंद्रित विकास से स्वाभाविक ही घबराता है। डॉ आम्बेडकर ने संविधान सभा के भाषण में ही इसकी नींव रख दी थी कि केंद्र को मजबूत होना चाहिए! यानी द्वंद हमारे समाज में भी है।
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हल्द्वानी कांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला तार्किक है। अगर कुछ तार्किक नहीं है तो वो है हमारी लापरवाही जिसमें नौकरशाही और नेताओं की लापरवाही सर्वोपरि है। देश को इससे सीख लेकर चौकन्ना रहना चाहिए और आत्मचिंतन करना चाहिए। अन्यथा सरकारी या निजी जमीनों पर इसी तरह कब्जे होते रहेंगे और न्यायालय इसी तरह प्रशासन को कब्जा हटाने से रोकता रहेगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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