NCERT Books: क्या एनसीईआरटी की पुस्तकें एक जमाने में मजाक बनकर रह गयी थी?
एक जमाना था जब एनसीईआरटी की पुस्तकों के जरिये बच्चों को हिंसक, असामाजिक और अमर्यादित नागरिक बनाया जा रहा था।

मोहम्मद अली जिन्ना, भारत के विभाजन के जिम्मेदार थे। यह बात हम सभी को मालूम है। मगर एनसीईआरटी को अपनी 12वीं क्लास की पुस्तकों में इस तथ्य को लिखने में पूरे 58 साल लग गये। यानी साल 2007 में पहली बार पाठ्यक्रम में यह बताया गया कि मोहम्मद अली जिन्ना के साम्प्रदायिक मंसूबों के चलते भारत का सांप्रदायिक विभाजन हुआ।
गौर करने वाली बात यह है कि भारत विभाजन के गुनाहगार को लगभग छह दशकों तक देश के विद्यार्थियों से छुपाने का एकमात्र कारण सिर्फ 'पोलिटिकल करेक्ट' होना बताया गया था। हालांकि, यह कोई पहला और आखिरी मामला नहीं था, जब एनसीईआरटी की पुस्तकों में इस तरह गड़बड़ी मिली हो। अब जैसे 2007 में ही सातवीं क्लास के पाठ्यक्रम में 'लोकतंत्र में समानता' का एक अध्याय हुआ करता था। उसमें विद्यार्थियों को अपनी गरिमा को बनाये रखने का पाठ पढ़ाया जाता था।
इस गरिमा को बनाये रखने का उस दौर के 'इतिहासकारों' को एकमात्र उदाहरण बॉलीवुड की दीवार फिल्म के एक डायलॉग से मिला। हम सभी जानते हैं कि उस फिल्म में अमिताभ बच्चन का एक सीन था जिसमें वह फेंके हुए पैसे उठाने से मना कर देते हैं। एनसीईआरटी ने फिल्म के इसी डायलॉग को अमिताभ बच्चन का नाम लिए बिना अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया। अब इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि जिस देश का हजारों सालों का समृद्ध इतिहास रहा है उसके पाठ्यक्रमों में ऐसी फिल्म के सीन को शामिल किया जाता हैं जिसकी पृष्ठभूमि अपराध, माफिया, गोलीबारी और हत्या से जुड़ी हुई हो। इससे भी बड़ी विडम्बना देखिये, 3 जुलाई 2007 को इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने बाकायदा 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' को बताया कि एनसीईआरटी द्वारा इस तरह के फिल्मी सीन का इस्तेमाल करना एक अच्छा कदम है।
अब हम खुद सोच सकते हैं कि आजादी के बाद से देश में शिक्षा का स्तर किन लोगों के हाथों में था और किस तरह का पाठयक्रम पिछली पीढ़ियों को पढ़ाया गया। अभी कुछ दिनों पहले मुगल इतिहास के कुछ अध्याय पाठ्यक्रम से हटाये गए। इस पर कथित इतिहासकारों का कहना था कि अकबर को हटा दिया तो महाराणा प्रताप को कैसे पढ़ाया जायेगा? यानी इस तर्क के मुताबिक मुगलों और राजपूतों का इतिहास उतना ही है जब उनकी सेनायें एक-दूसरे के सामने आती थी। उससे पहले और उससे बाद का कोई इतिहास मायने ही नहीं रखता!
दरअसल, एनसीईआरटी को अपनी नियति में विशेषज्ञों से ज्यादा राजनैतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले एक्टिविस्ट अधिक मिले। इसमें एक बड़ा उदाहरण योगेन्द्र यादव का है जोकि तब पोलिटिकल साइंटिस्ट हुआ करते थे। साल 2006 के आसपास वह इस बात को लेकर मुखर रहा करते थे कि एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में 1984 के दंगे, अयोध्या में बाबरी विध्वंस और 2002 के गुजरात दंगों को शामिल किया जाए।
यह कोई मजाक नहीं है कि बच्चों को आखिर दंगे के बारे में पढ़ाने से क्या हासिल होगा? अगर यही एक आखिरी विकल्प था तो उस इतिहास को भी शामिल करना चाहिए जब मध्य एशिया से कत्लेआम करती हुई सेनायें आती थी और पंजाब, दिल्ली के रास्ते, कन्नौज होते हुए राजस्थान तथा गुजरात में नरकंकालों एवं मंदिरों के विध्वसं छोड़कर वापस लौट जाती थी। 1947 में विभाजन के दौरान अकेले पंजाब में क्या हुआ उसकी पीड़ा को कौन बताएगा? यही नहीं, कुछ दंगों का ही क्यों चयन किया गया? जबकि इस देश में 11वीं-12वीं शताब्दी से लेकर आजादी के बाद तक हजारों दंगे हुए हैं।
इस बात को कौन भूल सकता है कि एनसीईआरटी की पुस्तकों में अरबिंदो घोष, बालगंगाधर तिलक, भगत सिंह और चंद्रशेखर जैसे महान क्रांतिकारियों एवं स्वतंत्रता-सेनानियों को आतंकवादी और मिलिटेंट कहकर संबोधित किया जाता था। इस गलती का एहसास 2008 में जाकर हुआ और 20 ऐसे अमर्यादित शब्दों को हटाया गया जोकि राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल किये जाते थे।
यहीं नहीं, इन कथित इतिहासकारों ने तो एकबार जाट समुदाय को बच्चों के पाठ्यक्रम में 'लुटेरा' तक कहकर संबोधित कर दिया था। यह लोग यही नहीं रुकें। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी क्लास के मासूम बच्चों को कविता के माध्यम से हिटलर के बारे में पढ़ाया जाता था। नक्सली हिंसाओं में लिप्त लोग कहानियां लिखते थे। एक पुस्तक 'अंतरा' नाम से साल 2006 में एनसीईआरटी ने प्रकाशित की। उसमें एक कविता मोचीराम हुआ करती थी जिसमें एक पंक्ति इस प्रकार हुआ करती थी, 'तो रामनामी बेचकर या रण्डियों की दलाली करके रोज़ी कमाने में कोई फर्क नहीं है।' आज भी इस कविता के बारे में एनसीईआरटी की वेबसाइट पर जानकारी उपलब्ध है। इसी प्रकार, भंगी, चमार, ब्राह्मणों के घर राक्षस पैदा होना जैसे अनगिनत अमर्यादित शब्दों से एनसीईआरटी की पुस्तकें भरी रहती थी।
अब सवाल यही पैदा होता है कि आजादी के बाद जिन लोगों के पास इस देश के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने उसके साथ कितना न्याय किया? आज अगर पाठयक्रमों में इन गलतियों को ठीक किया जाता है तो यह लोग एकदम परेशान होने लगते हैं। शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगाते हैं। जबकि यही वह लोग थे जोकि बच्चों को रंडी, हिटलर, हत्यारा, आतंकवादी, दंगे, नक्सलियों के बारे में पढ़ाते और माफिया पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों का गुणगान करते रहते थे। आखिर इस तरह की शिक्षा को किस खांचे में रखा जाना चाहिए, इस पर विचार करने की जरुरत है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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