Guru Teg Bahadur Martyrdom Day: भक्ति वैराग्य और वीरता का संगम थे गुरु तेग बहादुर
Guru Teg Bahadur Martyrdom Day: बचपन से तेग बहादुर नाम नहीं था उनका। त्यागमल नाम था। गुरु हरगोविन्द के घर सबसे छोटी संतान के रुप में जन्म लेने वाले त्यागमल को तेग बहादुर नाम मुगलों के खिलाफ उनकी वीरता के कारण मिला।

पिता गुरु हरगोविन्द ने त्यागमल की वीरता और तलवार चलाने की निपुणता देखकर तेग बहादुर नाम दिया था। तेग बहादुर मतलब तलवार का बहादुर। यही तेग बहादुर पिता गुरु हरगोविन्द की मृत्यु के बाद गुरु गद्दी पर आसीन हुए और नानक पंरपरा के नौवें गुरु कहलाये। श्री गुरु तेगबहादुर।
गुरु तेग बहादुर भक्ति, वैराग्य और वीरता के अद्भुद संगम थे। उनके जीवन काल में उन्होंने एक ओर जहां अपनी वीरता से लोगों की रक्षा की, वहीं धर्म मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित भी किया।
उनके भीतर वैराग्य बोध इतना प्रबल था कि धर्म की रक्षा के लिए शीश दे दिया लेकिन सिर नहीं दिया। अर्थात सिर कट गया लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ा। मात्र 54 साल की उम्र में औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली में लालकिले के सामने चांदनी चौक में मुगलों ने उनका सिर काट दिया गया था।
गुरु तेग बहादुर का जन्म 21 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता गुरु हरगोविन्द गुरु नानक परंपरा के आठवें गुरु थे। गुरु तेग बहादुर के चार भाई और एक बहन थी।
गुरु तेग बहादुर की बहन का नाम वीरो था। उनके चार भाइयों का नाम क्रमश: गुरुदत्ता, सूरजमल, अनि राय और अटल राय था। श्री गुरु तेगबहादुर ने गुरु नानक की शिक्षाओं के साथ साथ धर्म का विस्तृत अध्ययन किया था जिसमें वेद, उपनिषद और पुराणों का अध्ययन शामिल था।
1640 में श्री गुरु हरगोविन्द अपने पैतृक स्थान बाकला वापस लौट गये। यह अमृतसर के पास ही था। उनके साथ गुरुमाता नानकी देवी और उनके पुत्र गुरु तेग बहादुर तथा उनकी पत्नी गुर्जरी देवी भी थीं। 1664 में गुरु हरगोविन्द का यहीं बाकला में निधन हुआ जिसके बाद नानक परंपरा की गुरु गद्दी पर श्री गुरु तेग बहादुर आसीन हुए।
अगस्त 1664 में गुरु नानक परंपरा के अनुयायियों ने श्री तेग बहादुर को गुरु गद्दी पर आसीन करने का निर्णय लिया। भाई दीवानमल की अगुवाई में सभी शिष्यों ने मिलकर श्री तेग बहादुर को नानक परंपरा के नौवें गुरु के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। 1606 में मुगलों द्वारा गुरु अर्जुन देव की हत्या करने के बाद यह परंपरा बन गयी थी कि गुरु के साथ एक सैन्य टुकड़ी रहती थी। यह सैन्य टुकड़ी गुरु के आसपास पहरेदार का काम भी करती थी और धर्म पर हमला करने वाले मुगलों से लड़ती भी थी। गुरु गद्दी पर नौवें गुरु के रूप में आसीन होने के बाद गुरु तेग बहादुर इस सैन्य टुकड़ी के संचालक भी हो गये।
गुरु तेग बहादुर ने धर्म रक्षा तथा गुरु नानक की शिक्षाओं का प्रचार करने के लिए पूर्वी भारत की विशेष तौर पर यात्राएं की। वो वर्तमान बिहार से लेकर ढाका और आसाम तक गये। अपनी यात्रा के दौरान, गुरु तेग बहादुर ने धर्म प्रचार के साथ साथ हिन्दुओं में आयी छुआछूत को दूर करने का प्रयास भी किया। उन्होंने जगह जगह सामुदायिक जल कुओं और सामूहिक भोजन की शुरुआत की, जिसे आज सिखों द्वारा लंगर कहा जाता है।
इन्हीं यात्राओं के दौरान ही पटना में उनके बेटे गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ जो दसवें सिख गुरु हुए। उन्होंने मथुरा, आगरा, प्रयागराज और वाराणसी के शहरों की यात्राएं भी की।
असम, बंगाल और बिहार की अपनी यात्रा के बाद बिलासपुर की रानी चंपा से मिले, जिन्होंने गुरु को अपने राज्य में जमीन का एक टुकड़ा देने की पेशकश की। गुरु तेग बहादुर ने 500 रुपये में वह जमीन खरीद ली और वहां हिमालय की तलहटी में आनंदपुर साहिब शहर की स्थापना की। इसके बाद 1672 में, गुरु तेग बहादुर ने जनता से मिलने के लिए कश्मीर और उत्तर-पश्चिम सीमांत की यात्रा की, क्योंकि उस समय मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं का उत्पीड़न नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया था।
मई 1675 में कश्मीर के 500 ब्राह्मणों का दल आनंदपुर साहिब आकर श्री गुरु तेग बहादुर से मिला। इस दल की अगुवाई पंडित कृपाराम कर रहे थे। उन्होंने गुरु तेग बहादुर से कहा कि औरंगजेब उनका जबर्दस्ती धर्मांतरण करवा रहा है।
उस समय कश्मीर का मुगल गवर्नर इफ्तिखार खान न केवल कठोरता से टैक्स वसूली कर रहा था बल्कि हिन्दुओं का उत्पीड़न भी कर रहा था। बहन बेटियां सुरक्षित नहीं रह गयी थीं। वह हिन्दुओं को जबरन इस्लाम कबूल करवाने का उपाय कर रहा था जिससे परेशान होकर कश्मीरी पंडितों का यह दल गुरु तेग बहादुर के पास अपनी रक्षा के लिए पहुंचा था।
जब कश्मीरी पंडितों ने श्री गुरु तेग बहादुर से अपनी रक्षा की गुहार लगाई तब गुरु तेग बहादुर ने कहा कि जाओ औरंगजेब से कह दो कि पहले तेग बहादुर को इस्लाम कबूल करवा दे। सारे पंडित गुरु के रास्ते पर चलेगें। यह संदेश औरंगजेब तक पहुंचा और उसने 26 जुलाई 1975 को श्री गुरु तेग बहादुर को रोपड़ में गिरफ्तार करवा लिया। नुर मोहम्मद द्वारा उन्हें गिरफ्तार करके सरहिन्द भेज दिया गया।
इसके बाद नवंबर 1975 में श्री गुरु तेग बहादुर, भाई मतिदास छिब्बर, भाई सतिदास छिब्बर और भाई दयाला को दिल्ली लाया गया। यहां औरंगजेब द्वारा उनको इस्लाम कबूल करने की दावत दी गयी। गुरु तेग बहादुर ने दावत कबूल करने से मना कर दिया। इससे खफा औरंगजेब ने गुरु के सामने ही पहले 9 नवंबर 1975 को भाई दयाला की क्रूरतापूर्वक हत्या करवा दी। उन्हें खौलते पानी में डालकर मारा गया।
इसके बाद 11 नवंबर 1975 को भाई मतिदास छिब्बर और भाई सतिदास छिब्बर को भी अत्यंत क्रूरता से मार दिया गया। भाई मतिदास छिब्बर को आरे से दो टुकड़ों में काट दिया गया जबकि भाई सतिदास छिब्बर को जिन्दा जलाकर मार दिया गया। यह सब गुरु तेग बहादुर के सामने ही हो रहा था ताकि वो टूट जाएं और इस्लाम कबूल कर लें। लेकिन न तो गुरु ने और न ही उनके साथ आये शिष्यों ने इस्लाम कबूल किया।
आखिरकार 24 नवंबर 1975 को कट्टर इस्लामी बादशाह औरंगजेब के आदेश पर सार्वजनिक रूप से शीश काटकर गुरु तेग बहादुर की भी हत्या कर दी गयी। लालकिले के सामने चांदनी चौक में उनका सिर उनके धड़ से अलग कर दिया गया। वर्तमान में यहां शीशगंज गुरुद्वारा है जो श्री गुरु तेग बहादुर द्वारा धर्म के लिए किये गये महान बलिदान की याद दिलाता है।
श्री गुरु तेग बहादुर का सिर काटने का आदेश देने से पहले औरंगजेब ने श्री गुरु तेगबहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा था। इस पर गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब से दो टूक कहा था कि अगर प्रभु न चाहते तो हम हिन्दू कैसे पैदा होते? इसलिए धर्म बदलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। श्री गुरु तेगबहादुर जी की धर्म के प्रति निष्ठा कितनी गहरी थी इसका उल्लेख 'श्री गुरु प्रताप सूरज' में संतोख सिंह निम्न प्रकार व्यक्त करते हैं:
तिन ते सुनि श्री तेगबहादर। धरम निबाहनि बिखै बहादर।
उत्तर भन्यो, धरम हम हिन्दू। अति प्रिय को किम करहिं निकन्दू।।
लोक प्रलोक बिखै सुखदानी। आन न पइयति जांहि समानी।
मति मलीन मूरख मति जोई। इस को त्यागहि पांमर ते सोई।।
दीन दुनी महिं दुख को पावै। जम सजाइ दे नहिं त्रिपतावै।
सुमतिवन्त हम, कहु क्यों त्यगहिं। धरम राखिबे नित अनुरागहिं।।
अर्थात् औरंगजेब की बातें सुनकर श्री गुरु तेगबहादुर ने कहा कि "अपने अतिप्रिय हिन्दू धर्म का निषेध हम कैसे करें? यह हमारा धर्म, लोक और परलोक दोनों में सुख देने वाला है। हिन्दू धर्म के समान कोई दूसरा धर्म नहीं दिखाई देता। जो मलिन-मति और मूर्ख-मति व्यक्ति है वही इसको त्यागने की सोचता है, वह निश्चय ही पामर है। ऐसा व्यक्ति इस लोक में अत्यन्त दु:ख पाता है और यमराज भी उसको दण्ड देते-देते तृप्त नहीं होता। हम तो सुमतिवन्त हैं, हम क्यों हिन्दू धर्म का परित्याग करें? हमारा तो धर्म में नित्य ही अनुराग है।'
गुरु तेग बहादुर की धर्मनिष्ठा और धर्मरक्षा के लिए किये गये महान कार्य और बलिदान के कारण उन्हें हिन्द की चादर भी कहा जाता है। उनको सम्मान देने के लिए इस साल अप्रैल में उनके 355वें जन्मदिन पर केन्द्र की मोदी सरकार ने उसी लालकिले पर एक रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन किया था जहां से मुगल बादशाह ने उनके कत्ल का हुक्म जारी किया था।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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