Guru Nanak Jayanti: धार्मिक व सामाजिक रूप से भटक रहे पंजाबवासी लें गुरु नानक देव की जीवनी से प्रेरणा
Guru Nanak Jayanti: भारतवर्ष में धर्म कर्त्तव्यबोध का द्योतक रहा है। धर्म में रूढ़ियों या अंधविश्वासों के लिए कोई स्थान नहीं होता। उसमें गत्यात्मकता होती है, जड़ता नहीं। इसीलिए भारतीय मनीषा द्वारा गति को ही जीवन तथा जड़ता को ही मृत्यु माना गया है।

हाँ, यदि काल-प्रवाह में उसमें कुछ रूढ़ियाँ, अंधविश्वास या कुरीतियाँ प्रवेश भी कर जायँ तो उसके अंतःप्रक्षालन की वहाँ पर्याप्त गुंजाईश होती है। हर सौ-दो-सौ वर्षों पर यहाँ कुछ ऐसे संत-महापुरुष हुए, जिन्होंने उन्हें दूर करने के लिए अनथक प्रयत्न किए और उसमें उन्हें अपार सफलता भी मिली तथा व्यापक जनसमर्थन भी प्राप्त हुआ।
ऐसे ही एक महापुरुष - सिखों के प्रथम गुरु एवं सिख मत के संस्थापक श्री गुरुनानक देव जी थे जिनका जन्म चौदहवीं शताब्दी में हुआ था। वे युग-प्रवर्त्तक संत थे। उनका जीवन सेवा एवं परोपकार का पर्याय था। अधिकांश भारतीय संतों के सदृश उन्होंने भी शास्त्रोक्त सत्य की तुलना में अनुभूत सत्य को स्वर दिया। उन्होंने मध्यकालीन बर्बरता एवं इस्लामिक आक्रांताओं की क्रूरता को अपनी आँखों से देखा था। छल-बल, आतंक व प्रलोभन से धर्मांतरित किए जा रहे हिंदुओं की दीन दशा उनके मन को कचोटती थी।
उस समय पूरा पंजाब व सिंध कुफ़्र-काफ़िर की अवधारणा से ग्रसित इस्लाम की चपेट में था। हिंदुओं-बौद्धों-जैनों के पूजा-स्थल उनकी आँखों के सामने ही तोड़े जा रहे थे, उनकी बहन-बेटियों की आबरू सरेआम नीलाम की जाती थीं। समाधान का कोई उपाय नहीं दिख रहा था। गुरु महाराज ने तब व्यथित एवं क्षुब्ध होकर कहा था :-
''खुरासान खसमाना कीआ हिंदुस्तान डराइया।।
आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ।।
एती मार पई करलाणे तै की दरदु न आइया।।''
अपने इन शब्दों के माध्यम से गुरु नानक देव कहते हैं कि "खुरासान की सुपुर्दगी किसी और को करके बाबर मुग़ल ने हमला करके हिन्दुस्तान को सहमा दिया है। ईश्वर अपने ऊपर दोष नहीं आने देता इसलिए मुग़ल बाबर को यमराज बना के हिन्दोस्तान पर चढ़ाई करवा दी। इतनी मार पड़ी कि वे हाय-हाय पुकार उठे। क्या ये सब कुछ देख के तुझे उन पे तरस नहीं आया?"
एकेश्वरवाद की आड़ में इस्लाम के प्रचार-प्रसार की सूफ़ियों-औलियों की मंशा भी उन जैसे दूरदर्शी मनीषियों से छुपी नहीं रही होगी! उनके प्रभाव में आकर कुछ हिंदुओं को मुसलमान बनते देखकर भी वे दुःखी एवं निराश थे। स्वाभाविक है कि उन्होंने उपनिषदों में निहित ''ईश्वर एक है, वह सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापक है तथा उसी ने नानाविध रूपों में स्वयं को अभिव्यक्त किया है'' के संदेश को अपने शब्दों में व्यक्त किया। उन्होंने मूर्ति-पूजा एवं बाह्य कर्मकांडों का विरोध करते हुए गुरु-कृपा, नाम-स्मरण एवं शुद्ध आचरण की महत्ता का प्रतिपादन किया।
अपने जीवनकाल में उन्होंने लगभग 45 हजार किलोमीटर की यात्रा की। वे हिमालय से श्रीलंका तक तथा मक्का-मदीना, ताशकंद, ईरान, ईराक, तिब्बत, अरुणाचल प्रदेश, बांग्लादेश आदि तमाम क्षेत्रों में गए और अपनी 'उदासियों' के माध्यम से तत्कालीन धार्मिक-सामाजिक नेतृत्व के साथ प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया। उन्होंने समाज को कमज़ोर करने वाले कारकों को दूर कर भारत की आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने पुरुषार्थ और परमार्थ की प्रेरणा देते हुए, किरत कर, नाम जपु, वंड छको (मिल-बाँटकर खाओ) का मार्गदर्शन दिया। उन्होंने समाज को आत्मसम्मान के साथ जीने व अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दी थी।
जिन पंजाब-सिंध, काबुल-कंधार जैसे सीमावर्त्ती प्रदेशों को गुरु महाराज ने ताक़त-तलवार या छल-प्रलोभन के बल पर धर्मांतरित होने से बचाया, आज वही पंजाब भयावह धर्मांतरण की चपेट में है। पंजाब में आज धर्मांतरण की हवा नहीं आँधी चल पड़ी है। वहाँ न केवल वंचित-शोषित-उपेक्षित वर्ग, अपितु शिक्षित व संपन्न वर्ग के लोग भी धड़ल्ले से धर्मांतरित किए जा रहे हैं।
घोर आश्चर्य है कि जिन गुरु नानक का जीवन चमत्कारों से भरा था आज उन्हीं के अनुयायी चमत्कारों से प्रभावित होकर ईसाई धर्म में जा रहे हैं। कहीं कैंसर ठीक करने, बीमारों के उपचार करने, जोड़ों के दर्द दूर करने, कहीं तनाव, अवसाद एवं नशे की लत से मुक्ति दिलाने, कहीं बाँझपन दूर करने, कहीं विवाह कराने, कहीं नौकरी व विदेशों का वीज़ा दिलाने तो कहीं भूत-प्रेत भगाने के नाम पर पूरे पंजाब में सिक्खों का धर्मांतरण चल रहा है। उल्लेखनीय है कि नए-नए पादरी या धर्मांतरित होकर ईसाई बने ये सभी 'एपोस्टल' या 'प्रचारक' चमत्कारी शक्तियों के नाम पर चमत्कारी उपलब्धियों का बढ़-चढ़कर दावा करते हैं।
चमत्कारी शक्ति का ऐसा दावा करने वालों या उसके झाँसे में आने वालों में अशिक्षित या कम पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, अपितु डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पुलिस व सरकारी अफसर, कारोबारी, बड़े जमींदार आदि भी सम्मिलित हैं। पंजाब में पेंटेकोस्टलवाद का उदय धार्मिक क्षेत्र की एक ऐसी परिघटना है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इसे दुनिया भर में ईसाई धर्म की सबसे तेज गति से बढ़ती शाखा के रूप में देखा जा रहा है।
इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 2008 में ईसाई धर्म में दीक्षित हुए अंकुर योसेफ़ नरूला की संस्था 'चर्च ऑफ साइंस एंड वंडर्स' का दावा है कि आज दुनिया भर में उसके 3 लाख से अधिक अनुयायी हैं और अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन आदि देशों में उसकी अनेक शाखाएँ व सेंटर्स हैं।
ध्यान रहे कि नरूला पंजाब में फैल रहे ईसाईयत के इकलौते सारथी नहीं हैं, वहाँ उनके जैसे दर्जनों नव-ईसाई प्रचारक या उपदेशक सक्रिय हैं, सबके पास तमाम सेंटर्स, ढेर सारे अनुयायी और लाखों की संख्या में यूट्यूब फ़ॉलोअर्स हैं। एक अनुमान के मुताबिक पंजाब के 23 जिलों में लगभग 65000 पादरी हैं, जिनका घोषित उद्देश्य धर्मांतरण है।
पंजाब के शोषित, वंचित, दलित एवं आदिवासी समुदाय इन ईसाई प्रचारकों के आसान शिकार हैं। ये अपने ईसाई-प्रचार में पंजाबी प्रतीकों मसलन पगड़ी, लंगर, गिद्दा, टिप्पा आदि का खुलकर प्रयोग करते हैं ताकि नव-दीक्षित ईसाइयों को अपनी परंपरागत सांस्कृतिक धारा से कटने का एहसास न सताए। ग़ौरतलब है कि जहाँ मिशनरियों ने जनजातीय एवं आदिवासी क्षेत्रों में सेवा-शिक्षा-चिकित्सा की आड़ में मतांतरण का धंधा चलाया, वहीं उसने पंजाब में कथित चमत्कारों का सर्वाधिक सहारा लिया।
सिखों के लिए जरूरी है कि वह गुरु नानक देव जी के 553 वें प्रकाशोत्सव पर इस बारे में विचार करे कि वो गुरु नानक की शिक्षाओं को छोड़कर किसके पास जा रहे हैं? इस मौके पर अगर वो यह विचार करते हैं तो श्री गुरुनानक देव जी के प्रति उनके अनुयायियों की यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
यह भी पढ़ें: Guru Nanak Gurpurab: कैसा था गुरु नानकदेव के समय का भारत और विश्व?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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