Gujarat Elections: गुजरात में भाजपा के सामने दलित आदिवासी वोटरों को साधने का संकट
Gujarat Elections 2022: गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा भले ही अभी न हुई हो लेकिन भाजपा ने गुजरात चुनाव की तैयारी सितंबर 2021 में ही शुरु कर दी थी। उसने उस समय विजय रुपाणी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया था। गुजरात में मोदी और शाह का यह प्रयोग जितना विजय रूपाणी के लिए तगड़ा झटका था उससे ज्यादा आश्चर्यजनक फैसला भूपेन्द्र पटेल को मुख्यमंत्री के रूप में चुनना था।

जानकार बताते है कि प्रधानमंत्री मोदी ने प्रदेश में पटेलों को साधने और रूपाणी को लेकर कार्यकर्ताओं में बढ़ रही नाराजगी की खबर मिलने के बाद पहली बार विधायक बने 59 वर्षीय भूपेन्द्र पटेल को कमान देने का मन बनाया था। पहली बार विधायक से मुख्यमंत्री बने भूपेन्द्र पटेल को पार्टी के दिग्गज और स्थापित नेताओं से तकलीफ और दबाव न झेलना पड़े इसके लिए पटेल को पूरा नया मंत्रिमंडल भी दिया गया।
अनुभवहीन भूपेन्द्र पटेल पर दांव
तमाम तगड़े दावेदारों को किनारे लगाते हुए मोदी ने भूपेन्द्र पटेल पर दांव खेला। गुजरात की रग रग से वाफिक मोदी का यह दांव कितना सटीक था यह इसी साल होने जा रहे गुजरात विधानसभा चुनाव परिणामों से पता चल जाएगा। हालांकि यह सर्वविदित है कि गुजरात चुनाव मेें मुख्यमंत्री पटेल की नहीं प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव प्रबंधन में माहिर अमित शाह की साख दांव पर लगी है। प्रदेश स्तर पर मजबूत नेतृत्व की कमी का अहसास अब केंद्रीय नेतृत्व को हो रहा है।
भाजपा करीब तीन दशक से गुजरात में राज करती आई है। परंतु सत्ता विरोधी लहर भ्रष्ट्राचार के बढ़ते मामले और नेताओं के अंहकार ने भाजपा की छवि को गुजरात में कुछ हद तक धूमिल किया है।
इसके बाद भी गुजरात का चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में जाएगा यह लगभग तय है। इसका प्रमुख कारण हमेशा की तरह चमकदार छवि वाले मोदी, मजबूत संगठन, संघ के समर्पित स्वयंसेवकों की फौज और सबसे अहम बात मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस का बेहद कमजोर स्थिति में होना।
कांग्रेस के कमजोर होने का एक कारण यह भी रहा कि भाजपा ने पिछले साढ़े चार साल में कांग्रेस के 77 में से 13 विधायकों सहित कई वरिष्ठ नेताओं को अपने पाले में करने में सफल रही है।
कांग्रेस के लिए गुजरात में इस बार अहमद पटेल का न होना भी उसके बिखरे होने का एक बड़ा कारण है। कांग्रेस में सोनिया के राजनीतिक सचिव बनने के बाद कांग्रेस के कद्दावर नेता अहमद पटेल ही गुजरात को लेकर सोनिया की सहमति से सभी निर्णय लेते थे। पटेल के निधन के बाद गुजरात कांग्रेस में फिलहाल संगठन की दृष्टि से शून्य उभर आया है जिसे अभी तक भरा नहीं जा सका है।
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अनुभवहीन मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल ने गुजरात की कमान संभालने के बाद से खुद को आम आदमी का प्रतिनिधि बताने की कोशिश की है। चुनावी मौसम में बंटी रेवड़ियों में राज्य के कर्मचारियों को मंहगाई भत्ते में तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी और राज्य के 250 तालुकों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पंजीकृत 71 लाख राशन कार्ड धारकों को रियायती दर पर एक किलो दाल दिया जाना शामिल है।
मोदी की लोकप्रियता और विपक्ष केे कमजोर होने से गदगद भाजपा ने इस बार कम से कम 150 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। लेकिन भाजपा के इस लक्ष्य से रोकने और सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस और आम आदमी ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस ने 2017 में गुजरात में पार्टी के चुनाव प्रभारी रहे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को फिर से गुजरात का चुनाव प्रभारी बनाया है।
दलित आदिवासियों के खिसकने का डर
पंजाब में दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाने के बाद आम आदमी पार्टी ने मोदी और शाह के गढ़ गुजरात पर नजरे गड़ा दी हैं। आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार गुजरात का दौरा कर रहे है और रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। आप पार्टी को गुजरात में मिल रहा समर्थन निश्चित रूप से मोदी के साथ साथ मुख्यमंत्री पटेल के लिए भी परेशानी का कारण बन सकता हैं।
आम आदमी पार्टी ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर फोकस किया हैं। भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती गुजरात की 6 फीसदी अनुसूचित जातियों को और प्रदेश की 15 फीसदी अनुसूचित जनजातियों को अपने साथ बनाए रखना है।
गौरतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की 182 सीटों में से 13 अनुसूचित जाति और 26 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इन 39 सीटों में से 21 सीटें मिली थी, जिसमें से 8 एससी और 13 एसटी सीटें थी। कांग्रेस भी इन आरक्षित सीटों में से 15 सीटें जीतने में सफल रही थी। 3 सीटें निर्दलीयों के खातें में गई थी।
लेकिन पांच साल बाद एसटी और एससी समुदाय का भाजपा से भरोसा डगमगाने लगा हैं। आदिवासी केन्द्र सरकार की पारतापी और नर्मदा को जोड़ने की योजना का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। वो इसे अपनी जमीन से बेदखल करने की योजना मान रहे हैं। इस योजना का ऐलान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में किया था। केन्द्र सरकार का मानना है कि इससे महाराष्ट्र और गुजरात में सिंचाई सुविधाएं बढ़ जाएंगी। इस योजना से दलित और आदिवासी समुदाय में उत्पन्न नाराजगी को भांपते हुए और चुनाव में होनेवाले नुकसान के डर से राज्य सरकार ने 30 मार्च को केन्द्र सरकार से इस योजना को लंबित करने की गुजारिश की थी।
राजनैतिक मोर्चे पर भाजपा आदिवासी इलाकों में क्षेत्रीय ताकत बनकर उभरी भारतीय ट्राइबल पार्टी से कड़ी चुनौती का सामना कर रही हैं। आम आदमी पार्टी और भारतीय ट्राइबल पार्टी के संभावित गठबंधन ने भाजपा के कान खड़े कर दिए हैं। बीटीपी के अध्यक्ष और डेडियापाडा के विधायक महेश वसावा ने भाजपा के खिलाफ आक्रामक अभियान छेड़ दिया हैं। आदिवासियों का आरोप है कि भाजपा तमाम आदिवासियों को माओवादी करार देने में जुटी हैं।
ऐसे में 1 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी आदिवासियों के बड़े आस्था केन्द्र बांसवाड़ा के मानगढ जा रहे हैं। यह राजस्थान और गुजरात का सीमावर्ती जिला है और यहां से मोदी आदिवासियों को साधने का प्रयास करेंगे। भाजपा भी यहां मोदी की रैली को सफल बनाने के लिए पूरी तैयारी कर रही है और अनुमान है कि 1 नवंबर को मोदी की रैली में एक लाख आदिवासी शामिल होंगे।
मोदी और शाह भी इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि गुजरात चुनाव का जो भी परिणाम आएगा, उसका ठीकरा या सेहरा उनके ही सिर पर बंधना हैं। इसलिए छिटकते वोट को बांधना हो या फिर प्रदेश में संगठन को चुस्त दुरूस्त करने की कवायद हो, दोनों गुजरात को लेकर हर स्तर पर गंभीर है। पिछली बार नाराज पटेलों को इस बार बीजेपी ने साध लिया है लेकिन इस बार संकट दलित आदिवासी वोटर और आम आदमी पार्टी का बढता प्रभाव है। जमीनी स्तर पर आम आदमी पार्टी की बढ़ती पहुंच भाजपा को विचलित करने वाली है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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