Hindi Language: संसद में हिन्दी भाषा का स्वर्णकाल
Hindi Language: अभी अभी समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र में बहुत गहमा गहमी रही। खूब हंगामा हुआ। निलंबन, निष्कासन, बहिष्कार ही नहीं अविश्वास प्रस्ताव तक लाया गया। लेकिन एक बात की ओर कम ही लोगों की नजर गयी, वह यह कि पहली बार संसद के दोनों सदनों में ऐसा दिख रहा है कि हिन्दी की कमान गैर हिन्दी भाषी राज्यों से आने वाले नेताओं ने उठा रखी है। डेरेक ओ ब्रायन जैसे एकाध नेताओं को छोड़ दें तो गैर हिन्दी भाषी नेताओं के द्वारा लगभग समूची बहस, आरोप प्रत्यारोप और सवाल जवाब हिन्दी भाषा में ही हुआ है।
बीजेपी के दो बड़े नेता जो गुजरात से आते हैं वो तो पहले दिन से अपना सारा काम काज हिन्दी में ही कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी हों या अमित शाह, दोनों ही अपना समूचा काम काज, भाषण, बहस, सवाल जवाब हिन्दी में ही करते हैं। यहां तक कि संसद में सवालों के लिखित जवाब देते समय भी अमित शाह हिन्दी भाषा का ही उपयोग करते हैं। इन लोगों के लिए अंग्रेजी में बोलना ज्यादा कठिन काम नहीं होगा। ऊंचे पदों पर बैठे नेताओं के पास विभाग या मंत्रालय के पास से जिस भाषा में चाहें लिखित नोट मिल जाता है और उन्हें सदन में सिर्फ पढ़ना होता है। फिर भी दोनों ही नेता न केवल सदन के बाहर बल्कि सदन के भीतर भी लिखित या मौखिक भाषण के समय हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं।

इन दोनों की हिन्दी में गुजराती का प्रभाव भी खूब दिखता है, लेकिन समय के साथ उन्होंने इसमें सुधार भी किया है। फिर भी मानव की जगह मानवी, स्थिर की जगह स्थीर शब्दों का प्रयोग उनकी भाषा को एक गुजराती टच देता है जो उनकी हिन्दी को और अधिक आकर्षक बनाता है। लेकिन भाजपा से बाहर कांग्रेस की ओर देखें तो इस बार संसद के मानसून सत्र में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस की शुरुआत आसाम से सांसद गौरव गोगोई ने की। उन्होंने हिन्दी में ही अपनी पूरी बात रखी।
इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे न केवल सदन में हिन्दी में अपनी बात कहते हैं बल्कि कुछ ऐसे मुहावरों का भी इस्तेमाल करते हैं जो ठेठ हिन्दीभाषी राज्यों में बोले जाते हैं। जैसे राज्यसभा में सभापति धनखड़ के साथ नोंक झोंक में उन्होंने 'काल करै सो आज कर' वाली कहावत का इस्तेमााल किया जिसकी कर्नाटक से आनेवाले किसी नेता से उपयोग की उम्मीद नहीं थी।
बंगाल से आने वाले कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी तो अपनी भाषा को लेकर ही विवादों में रहते हैं, फिर भी वो अधिकांश समय बोलते हिन्दी में ही हैं। संसद में उनके विवादित हो जानेवाले बयान हों या फिर बाद में प्रेस कांफ्रेस करके दी गयी सफाई। वो एक अलग ही अंदाज में हिन्दी बोलते हैं जो निश्चय ही सुननेवाले को आकर्षक लगती है। एक बार जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को उन्होंने राष्ट्रपत्नी कह दिया था तब उन्होंने यह कहते हुए क्षमा मांग ली थी कि उनकी हिन्दी की समझ अच्छी नहीं है। लेकिन इस बार सदन में जब उन्होंने प्रधानमंत्री की तुलना मुहावरे के रूप में धृतराष्ट्र से की तो उसके लिए माफी नहीं मांगी। फिलहाल वो अपने इसी मुहावरे के कारण लोकसभा से सस्पेंड हो चुके हैं।
लेकिन यहां किसी का निलंबन या नोंक झोंक मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि पहली बार संसद में ऐसा नजारा दिख रहा है जब पक्ष विपक्ष दोनों ओर से गैर हिन्दी भाषी राज्यों से आनेवाले नेता हिन्दी में बोलकर मोर्चा संभाले हुए हैं। मोदी शाह की जोड़ी तो नौ साल से संसद में है और वो हिन्दी के अलावा किसी और भाषा में कम ही बोलते हैं लेकिन पहली बार विपक्ष से गौरव गोगोई हों, मल्लिकार्जुन खड़गे हों या फिर अधीर रंजन चौधरी। वो भी अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में ही अपनी बात रखते हुए नजर आये।
संसद का माहौल ऐसा हो गया है कि अब कम ही नेता हैं जो अंग्रेजी में बोलकर अपनी बात कहना चाहते हैं। खासकर भाजपा और कांग्रेस से। इसका एक बड़ा कारण संभवत: लाइव प्रसारण के जरिए वोटरों तक अपनी बात पहुंचाना है। भारत के हिन्दीभाषी राज्य ही नहीं गैर हिन्दी भाषी राज्यों महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, बंगाल, आसाम, अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में भी अच्छी खासी संख्या में लोग हिन्दी समझते हैं। स्टैट्स ऑफ इंडिया के डाटा के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश में 62 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 52 प्रतिशत, पंजाब में 51 प्रतिशत, गुजरात में 43 प्रतिशत, आसाम में 25 प्रतिशत, उड़ीसा में 19 प्रतिशत, बंगाल में 14 प्रतिशत तथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में 12-12 प्रतिशत लोग हिन्दी समझते और बोलते हैं। बाकी गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी हर जगह कुछ न कुछ लोग थोड़ी बहुत हिन्दी बोलने या समझने वाले मिल जाएंगे।
हालांकि 2011 के बाद नयी जनगणना अभी तक नहीं हुई है लेकिन उसी के आधार पर जो अनुमान लगाया गया है उसके अनुसार देश में लगभग 70 करोड़ लोग हैं जो हिन्दी समझते हैं और बोल भी सकते हैं। पहली, दूसरी और तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी का इस्तेमाल करनेवाले लोगों का आंकड़ा देखें तो वह देश की कुल जनसंख्या का लगभग 57 प्रतिशत बैठता है। इसका अर्थ है कि अगर सदन में खड़े होकर नेता हिन्दी में बोलते हैं तो वह देश की आधी जनसंख्या तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं।
विभिन्न गैर हिन्दी भाषी राज्यों के जो क्षेत्रीय दल हैं उनके लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है इसलिए वो अपनी भाषा या अंग्रेजी में ही अपनी बात रखना पसंद करते हैं। संसद में जब तक कम्युनिस्ट नेताओं का प्रभाव रहा वो पूरी बहस अंग्रेजी में करते रहे। दक्षिण से आनेवाले नेता भी अंग्रेजी में ही बोलना पसंद करते थे। लेकिन पहली बार ऐसा दिख रहा है कि न केवल भाजपा बल्कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों से आनेवाले कांग्रेस के भी सांसद हिन्दी में बोलने को महत्व दे रहे हैं।
इसमें सबसे अधिक प्रभावित किया है मल्लिकार्जुन खड़गे ने। जब तक वो कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बने थे सदन में आमतौर पर अंग्रेजी में ही बोलते थे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद न केवल उनका पहनावा लोगों को प्रभावित करता है बल्कि हिन्दी में बोलने की कला से भी वो लोगों को प्रभावित करते हैं। उन्हें इस बात का अहसास है कि अब उन्हें कर्नाटक की जनता तक ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों तक अपनी बात पहुंचानी है और इसके लिए हिन्दी से बेहतर दूसरा कोई विकल्प नहीं हो सकता।
संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी ने संसद में जो जगह बनायी है उसे देखते हुए कह सकते हैं कि संसद में यह हिन्दी का स्वर्ण काल है, जब गैर हिन्दी भाषी राज्यों से आनेवाले नेता हिन्दी को नया आयाम दे रहे हैं। एक संपर्क भाषा के रूप में शायद हिन्दी ने अब संसद में वह जगह बना ली है जिसकी लंबे समय से प्रतीक्षा थी। ऐसे में गैर हिन्दी भाषी नेताओं की हिन्दी में भाषा, वर्तनी और व्याकरण का खोट खोजने की बजाय उनका उत्साहवर्धन और सम्मान करना चाहिए। यही वह रास्ता है जिस पर चलते हुए एक दिन हिन्दी वास्तविक रूप से भारत के लोगों की संपर्क भाषा बन पायेगी जैसे आज वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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