Ghosi Bye-Election: सपा की जीत से ज्यादा भाजपा की हार की चर्चा
Ghosi Bye-Election: उत्तर प्रदेश में बहुप्रतीक्षित घोसी उपचुनाव के नतीजे आ चुके हैं। सत्ताधारी भाजपा चारों खाने चित्त हो गई है। समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह ने बड़े अंतर से भाजपा प्रत्याशी एवं इस सीट से निवर्तमान विधायक दारा सिंह चौहान को पटखनी दी है। सपा की जीत से ज्यादा चर्चा भाजपा की हार की है।
पिछड़ों के भारी नेता बताकर भाजपा में फिर से शामिल कराये गये दारा सिंह चौहान के प्रचारित जनाधार का सच सामने आ चुका है। दलबदल के महारथी दारा सिंह से घोसी की जनता बेहद नाराज थी, लेकिन भाजपा नेतृत्व इसे भांप नहीं पाया। दूसरी तरफ, सपा नेता एवं चुनाव प्रभारी शिवपाल सिंह यादव ने बाहरी एवं स्थानीय का चुनाव बनाकर इस जंग को और रोचक बना दिया था, जिसकी काट भाजपा आखिर तक नहीं ढूंढ पायी।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के घोसी विधानसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत केवल भाजपा की हार नहीं है, बल्कि उस रणनीति की हार है, जिसको आधार बनाकर दिल्ली ने 2024 के लोकसभा चुनाव में विजय प्राप्त करने का सपना पाल रखा है। घोसी का नतीजा उस जातिवादी राजनीति की हार है, जिसको उत्तर प्रदेश की जनता वर्ष 2007 के बाद से ठुकरा चुकी है।
यह नतीजा दिल्ली की उस हठधर्मिता की भी हार है कि वह जिसे भी भाजपा के सिंबल पर लड़ा देगी वह जीतकर आ जायेगा। यह परिणाम अपने कार्यकर्ताओं से ज्यादा दूसरे दलों से आये नेताओं पर भरोसे की हार है। घोसी के जरिए जनता ने एक बार फिर संदेश दे दिया है कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की आड़ में दलबदलुओं एवं जातिवादियों के लिये यूपी और देश की राजनीति आसान नहीं रहने वाली है।
घोसी में 42,500 हजार वोटों के अंतर से भाजपा की पराजय ने एनडीए के जाति आधारित गठबंधन सहयोगियों की वोट जुटाऊ क्षमता पर बड़ा सवाल पैदा किया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा उम्मीदवार के तौर पर दारा सिंह चौहान ने भाजपा प्रत्याशी विजय राजभर को 22 हजार वोटों के अंतर से हराया था। तब सुभासपा सपा गठबंधन की हिस्सा थी। इस बार सुभासपा एनडीए के साथ थी, इसके बावजूद हार का अंतर लगभग दोगुना हो गया है। ओम प्रकाश राजभर अपनी पहली ही परीक्षा में फेल हो गये हैं। दरअसल, भाजपा जिस पिछड़े जातीय समीकरण के सहारे अपनी जीत पक्की मानकर चल रही थी, उसी भरोसे ने सारे समीकरण ध्वस्त कर दिये हैं।
भाजपा को समझना पड़ेगा कि उत्तर प्रदेश में 2017, 2019, 2022 का चुनाव जातिवाद और केवल पिछड़ों की राजनीति के जरिये नहीं जीते गये थे। इस जीत में सवर्ण वोटरों का भी योगदान था, जो अब तक हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा को वोट देता आ रहा था। अपने अपमान से नाराज क्षत्रिय मतदाता भी इस बार भाजपा से छिटककर सपा खेमे में चला गया। यह भाजपा के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि मुलायम सिंह यादव के दौर की तरह क्षत्रिय वोटर सपा से जुड़ गया तो यूपी भगवा पार्टी के लिये एकतरफा नहीं रह जायेगा।
यूपी में सभी को साथ लेकर चलने की बजाय यूपी में केवल पिछड़ों को साधने की रणनीति घोसी में भारी पड़ गई है। भाजपा जाति आधारित राजनीति की चैम्पियन नहीं रही है कभी। हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद ही उसका कोर मुद्दा रहा है। भाजपा में पिछड़े वर्ग के ही नेताओं के ऐसे कई उदाहरण हैं। कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार जैसे नेता जब तक हिंदुत्व के आवरण में रहे, लोकप्रियता बनी रही, लेकिन जैसे ही ये नेता जाति और पिछड़ों की खोल में शामिल हुए, औंधे मुंह गिर गये। बीते कुछ समय में भाजपा भी खुद को पिछड़ों की राजनीति पर केंद्रित कर रही है तथा दूसरे दलों से आये लोगों को अपने कैडर पर वरीयता दे रही है।
घोसी उपचुनाव में बसपा से आने वाले डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का पूरा उपयोग किया गया, लेकिन अपने कैडर के बेहद सज्जन एवं ईमानदार नेता डा. दिनेश शर्मा को घोसी भेजने की जरूरत नहीं समझी गई। डा. महेंद्रनाथ पांडेय को भी घोसी से दूर रखा गया। विजय बहादुर पाठक जैसे स्थानीय नेता को भी जिम्मेदारी से वंचित रखा गया। अपने कैडर के पिछड़े नेताओं को भी घोसी में नहीं लगाया गया।
भाजपा नेतृत्व द्वारा घोसी के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझने का प्रयास नहीं किया गया कि विधानसभा चुनाव में जिस दारा सिंह चौहान के खिलाफ कार्यकर्ताओं ने प्रचार किया था, मात्र 16 महीने में ही उसी के लिये वोट कैसे मांगेंगे? ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान को शामिल करने से पहले दिल्ली दरबार ने लखनऊ को भरोसे में लेने की जरूरत भी नहीं समझी, जिसका नतीजा सामने है।
लखनऊ को बाईपास करके लिये गये दोनों फैसलों को मास्टर स्ट्रोक बताकर प्रचारित किया गया, लेकिन दोनों फैसले उल्टे पड़ गये हैं। दरअसल, विधानसभा चुनाव में मोदी-योगी और भाजपा को खुलकर अपशब्द बोलने वाले दोनों पिछड़े नेताओं को एनडीए और भाजपा में शामिल करना भाजपा काडर और जनता दोनों को रास नहीं आया। मऊ का पूरा भाजपा काडर ही शिथिल हो गया। पुराने नेताओं की बजाय ब्रजेश पाठक, कैबिनेट मंत्री एके शर्मा जैसे लोगों को वरीयता दी गई, जो ऊपर से थोपे गये हैं। एके शर्मा अपनी पूरी ताकत लगाने के बावजूद भूमिहार वोटरों को भाजपा के पाले में नहीं कर पाये।
डिप्टी सीएम केशव मौर्य और भूपेंद्र चौधरी भी पिछड़ों को एकजुट करने में जुटे रहे, लेकिन नाकाम हो गये। यहां तक कि योगी आदित्यनाथ ने भी घोसी जाकर प्रचार किया लेकिन उनका हिन्दुत्व और बुलडोजर भी घोसी में मतदाताओं को प्रभावित करने में बेअसर रहा। आश्चर्य की बात यह भी है स्वयं योगी के घोसी जाने के बाद भी क्षत्रिय मतदाताओं की भाजपा से नाराजगी दूर नहीं हुई।
भाजपा के लिए यह बड़ी परेशानी का सबब है कि पिछड़ा बाहुल्य सीट पर उसका पिछड़ा कैंडिडेट पार्टी के पिछड़े नेताओं की पूरी ताकत लगाने के बावजूद सपा के अगड़े नेता से पिछड़ गया। दूसरी तरफ, शिवपाल की रणनीति कारगर रही। उन्होंने इस चुनाव को ध्रुवीकरण से बचाने के लिए अपने किसी भी मुस्लिम नेता को घोसी में नहीं उतारा। उन्होंने पूरे चुनाव को बाहरी एवं स्थानीय पर ही केंद्रित रखा जिसकी काट भाजपा के दिग्गज नेता एवं मंत्री तक नहीं तलाश पाये।
भाजपा ने इस सीट को जिताने की जिम्मेदारी अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी, महामंत्री एवं प्रभारी अनूप गुप्ता, महामंत्री सुभाष यदुवंश, महामंत्री अमरपाल मौर्या, क्षेत्रीय अध्यक्ष सहजानंद राय जैसे नेताओं को दे रखी थी, जो कभी जनता के बीच से चुनकर आये ही नहीं। शिया मुस्लिम बहुल घोसी में मोहसिन रजा की जगह केवल सुन्नी समुदाय के मंत्री दानिस आजाद अंसारी को वरीयता दी गई। वैचारिक कार्यकर्ताओं से ज्यादा जातीय पार्टियों के नेता ओम प्रकाश राजभर तथा संजय निषाद पर भरोसा किया गया।
बीते चुनाव में जनता ने दल बदलने वाले ज्यादातर नेताओं को धूल चटा दी थी। इसके बावजूद भाजपा नेतृत्व ने कोई सबक नहीं लिया। चुनाव परिणाम से सरकार की सेहत पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन 2024 से पूर्व इस जीत ने उत्तर प्रदेश में सपा और इंडिया गठबंधन को ताकत जरूर दे दी है। नतीजे से सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर एवं निषाद पार्टी के संजय निषाद की वोट जुटाऊ क्षमता पर भी सवाल उठ गया है, जो लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा नेतृत्व के लिए चिंता का कारण हो सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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