Ganga Pushkaralu: दक्षिण को उत्तर से जोड़ने वाला नदी स्नान
गंगा पुष्करलु या गंगा पुष्करम मेला ऐसा ही एक अवसर है जब दक्षिण का भारत उठकर उत्तर आता है और गंगा स्नान करके भारत की आत्मा के साथ एकाकार हो जाता है।

Ganga Pushkaralu: नदियां भारत के लोगों की श्रद्धा का केन्द्र अनायास ही नहीं हैं। भारत अगर शरीर है तो नदियां इसकी धमनियां हैं। संभवत: इसीलिए भारत में नदी नहाने का बहुत महत्व है। वर्षा ऋतु को छोड़ दें जब नदियां रजस्वला हो जाती हैं तो बाकी के आठ महीने देश में कहीं न कहीं नदी स्नान का कोई न कोई पर्व त्यौहार चलता ही रहता है। अक्षय तृतीया भी एक ऐसा ही त्यौहार है जब करोड़ों श्रद्धालु नदियों के किनारे पहुंच जाते हैं। नदी में स्नान करते हैं और पूजा पाठ और दान पुण्य जो करना हो वो करते हैं।
ऐसे में एक सहज सवाल यह उठता है कि आखिर नदियों में स्नान करने को इतना महत्व क्यों दिया गया है? क्या यह सिर्फ बहते जल में नहा लेने जितनी ही सामान्य प्रक्रिया है या इसके पीछे कुछ और गहरे निहितार्थ छिपे हुए हैं। अगर आप थोड़ा भी विचार करेंगे तो पायेंगे कि नदियां एक भूभाग को ही दूसरे भूभाग से नहीं जोड़ती। वह एक भूभाग के रहनेवाले लोगों को भी दूसरे भूभाग में रहनेवाले लोगों से जोड़ती हैं। नदी स्नान, नदी नहान की जो संस्कृति विकसित हुई है उसका व्यक्तिगत लाभ चाहे जो हो लेकिन भारत की सामाजिक एकता को बनाये रखने में इनका बहुत बड़ा योगदान है।
भारत के एक छोर से व्यक्ति दूसरे छोर तक जा पहुंचता है। क्यों? क्योंकि उसे किसी खास तिथि नक्षत्र में नदी स्नान करके पुण्य लाभ प्राप्त करना है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसके जीवन का हर महत्वपूर्ण कार्य बिना नदी की गोद में गये पूरा नहीं होता। संभवत: यही कारण है कि भारतीय सभ्यता में नदियों को मां कहकर संबोधित किया गया है।
नदी रूपी मां की गोद में पहुंचकर थोड़ी देर के लिए तन मन को विश्राम देने का ऐसा ही एक पवित्र उत्सव है नदी पुष्करलु या नदी पुष्करम। पुष्कर का अर्थ जलाशय होता है। इसके साथ नदी जुड़ गयी तो अर्थ नदी का जल हो जाता है। नदी पुष्करलु मुख्य रूप से तेलुगु भाषी लोगों का नदी स्नान महोत्सव है लेकिन इसमें दक्षिण के अन्य राज्यों के लोग भी शामिल होते हैं।
नदी पुष्करलु एक प्रकार से तेलुगु और कन्नड़ लोगों का कुंभ है जो हर साल किसी न किसी नदी के किनारे आयोजित होता है। दक्षिण के श्रद्धालु हर बारह वर्ष में 12 नदियों में से एक के किनारे जाते हैं और वहां स्नान करते हैं। जैसे हर परंपरा के पीछे कोई न कोई कहानी होती है वैसे ही इस परंपरा के पीछे एक कहानी है। चौदहवीं सदी में लिखी गयी ज्योतिष की पुस्तक 'जातक पारिजात' में एक कहानी आती है कि किसी ब्राह्मण ने शिवजी की तपस्या की। शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दे दिया कि वह जल में रह सकेगा और नदियों में स्नान से पवित्र हो सकेगा। उस ब्राह्मण ने 12 नदियों में प्रवेश करने का निर्णय लिया। इस तरह उसने जिस जिस नदी में जिस जिस नक्षत्र में प्रवेश किया उस नदी में उसी नक्षत्र में स्नान का विधान बन गया।
यह तो कहानी है लेकिन 'जातक पारिजात' में इस कहानी के जरिए जो तिथि निर्धारित की गयी वो सब ज्योतिषिय गणना पर आधारित ऐसी महत्वपूर्ण तिथियां हैं जब उस नदी क्षेत्र में विशेष नक्षत्रीय परिवर्तन हो रहे होते हैं। 12 राशियों को 12 नदियों से जोड़ दिया गया है और उस कालखंड में उस नदी में स्नान के महत्व को स्थापित कर दिया गया है। वृहस्पति जिस नक्षत्र में होते हैं उस नक्षत्र के हिसाब से नदियों का निर्धारण किया गया है। इस प्रकार अब हर साल किसी न किसी न किसी नदी में पुष्कर स्नान चलता रहता है और श्रद्धालु बारह वर्षों में भारत की 12 पवित्र नदियों में स्नान भी करता है, खगोलीय घटनाओं का सूक्ष्म वाहक भी बनता है और इसी बहाने भारत देश का दर्शन भी करता है।
इस साल अक्षय तृतीया के दिन जो स्नान शुरु हुआ है वह गंगा नदी के किनारे होगा। गोमुख से गंगासागर तक जिसकी जैसी सुविधा होगी वह गंगा नदी के किनारे पहुंचकर स्नान करेगा और पुण्य लाभ प्राप्त करने के साथ ही देश समाज को जानने का लाभ भी अर्जित करेगा। लेकिन दक्षिण के अधिकांश श्रद्धालु जो गंगा पुष्करलु मेला के लिए आ रहे हैं वो या तो काशी, प्रयाग या हरिद्वार पहुंच रहे हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से आनेवाले कुछ श्रद्धालु गंगा के दूसरे घाटों पर भी पहुंचेगे और गंगा स्नान करेंगे। यह गंगा पुष्करलु मेला 22 अप्रैल से 5 मई तक 15 दिन चलेगा।
अगर उत्तर दक्षिण के मेलजोल की ऐसी समृद्ध परंपरा लगभग पांच सौ सालों से चली आ रही है तो ऐसा भी नहीं है कि शासन प्रशासन को कुछ पता ही न हो। लेकिन भारत में राजनीतिक एकता के जो नारे और उपाय हैं वो सब आयातित और अवास्तविक हैं। भारत की सामाजिक व्यवस्था में एकता के जो सूत्र छिपे हैं या तो हम उसका तिरस्कार करते हैं या आयातित सिद्धांतों के जरिए उसे नष्ट करने की कोशिश करते हैं।
नदी पुष्करलु मेले को ही देखें तो इसमें 12 नदियों में स्नान का महत्व है। इसमें गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, भीमा, ताम्रपर्णी, ताप्ती, ब्रह्मपुत्र, तुंगभद्रा, सिन्धु और प्रणिहिता नदियों में स्नान किया जाता है। जिस वर्ष जिस नदी के किनारे स्नान का महत्व होता है उस साल उसी नदी के नाम से पुष्करलु शब्द जोड़ दिया जाता है। जैसे इस साल गंगा में स्नान हो रहा है तो इसे गंगा पुष्करलु या गंगा पुष्करम् कहा जा रहा है।
इस प्रकार अगर कोई श्रद्धालु 12 वर्षों में श्रद्धापूर्वक अपने आत्मिक लाभ के लिए नदी स्नान करता है तो उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक लगभग समूचा भारत जान जाता है। इसके लिए न तो उसे कोई अतिरिक्त प्रयास करना होता है और न शासन प्रशासन को भारत जानों कार्यक्रम चलाना पड़ता है।
लेकिन दुर्भाग्य से हमारी एकता और अखंडता के ऐसे अनको धागों के बारे में हम बिल्कुल नहीं जानते। भारत की एकता और अखंडता अगर सुनिश्चित है, तथा तमाम तरह के राजनीतिक विष वमन के बाद भी भारत के लोग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं तो उसके मूल में ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव ही हैं। यही मूल भारत है जो अक्षुण्ण रूप से अपनी सनतान यात्रा पर है। आज की राजनीति ऐसे भारत के आसपास सिमट आये तो इसका सौंदर्य और बढ़ जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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