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Laxmi on Rupee: क्या हिन्दुत्व की राजनीति करना चाहते हैं केजरीवाल?

अन्ना आन्दोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी के पुरोधा अरविन्द केजरीवाल ने जब पहली बार विकासपरक राजनीति की बात की तो पारंपरिक राजनीतिक दांवपेंचों से त्रस्त जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया।

ऐसा नहीं है कि उनसे पहले किसी राजनीतिक दल ने विकास की बात नहीं की थी किन्तु गत 65 वर्षों से 'गरीबी हटाओ' के नारों के बावजूद आम आदमी पर बोझ बढ़ता रहा और राजनीतिक विकल्प की कमी ने जनता को बदलाव का अवसर नहीं दिया।

Arvind Kejriwal

दिल्ली में दशक भर से मुख्यमंत्री पद पर काबिज केजरीवाल ने मोहल्ला क्लीनिक, स्कूलों के कायाकल्प के चलते ऐसे नेता की छवि बनाई जिसे आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं का भान हो तथा वह जनता की बेहतरी के लिए कार्य करे। प्रारंभ में बिजली बिल और पानी के बिल की माफी ने भी दिल्ली की जनता को आकर्षित किया और कांग्रेस सहित भारतीय जनता पार्टी जैसे राष्ट्रीय दलों को अपनी राजनीति बदलने को बाध्य कर दिया।

केजरीवाल की लोकप्रियता यकीनन बढ़ रही थी किन्तु अफसर से नेता बने केजरीवाल ने अति-महत्वाकांक्षा में स्वयं को विकासपुरुष के खाके से निकालकर 'खादीधारी नेता' का रूप धर लिया। उनका यह नया अवतार उन्हीं नेताओं जैसा है जिससे आजिज आकर जनता ने उन्हें चुना था। अब केजरीवाल की राजनीतिक चाल से लेकर चेहरा और चरित्र तक बदल गया है।

हिंदुत्व पर सवाल उठाने वाले अब उसी के सहारे
कभी भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्व की राजनीति पर सवाल खड़े करने वाले केजरीवाल अब स्वयं उसी राह पर चलते नजर आ रहे हैं और उनका यही अवतार अब विवादों के घेरे में है। भारतीय मुद्रा पर गाँधीजी के चित्र के साथ ही भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के चित्र लगाने की मांग कर उन्होंने देश में एक नई बहस शुरू कर दी है किन्तु आश्चर्य तो इस बात का है कि ऐसा उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने की दृष्टि से कहा है।

अब कोई आम नेता ऐसी बात करता तो जनता ध्यान नहीं देती किन्तु केजरीवाल जैसे उच्च शिक्षित नेता से इस प्रकार के बयान की अपेक्षा किसी को नहीं थी। आखिर भारतीय मुद्रा पर लक्ष्मी-गणेश के चित्र से भारतीय अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी, समझ से परे है।

यह बयान विशुद्ध रूप से भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति के बरक्स खुद को स्थापित करने का एक प्रयास है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर केजरीवाल को विकास की राजनीति से हिंदुत्व की राजनीति की ओर क्यों मुड़ना पड़ रहा है?

राम मंदिर विरोध से राम भक्त तक का सियासी सफर
2014 में कानपुर में एक रैली में अपनी नानी का जिक्र करते हुए केजरीवाल ने कहा था कि मेरी नानी कहती है कि भगवान राम किसी मस्जिद को तोड़कर ऐसे मंदिर में नहीं बस सकते। वहीं 2018 में दिल्ली में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, 'मैं सोच रहा था कि यदि जवाहरलाल नेहरू स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया की जगह मंदिर बना देते तो क्या इस देश का विकास हो सकता था?'

उनके इन दोनों वक्तव्य को अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर के मद्देनजर भाजपा की राजनीति पर कटाक्ष के रूप में प्रचारित किया गया। यहाँ केजरीवाल ने यह सन्देश देने का प्रयास किया कि मंदिर से अधिक इस देश की राजनीति का मॉडल भौतिक विकास होना चाहिये।

उनके साथी मनीष सिसोदिया ने भी राम मंदिर के स्थान पर यूनिवर्सिटी और अस्पताल बनाने की वकालत की थी। किन्तु जैसे ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव आये तो केजरीवाल अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करने पहुँच गए।

हाल ही में गुजरात के दाहोद में जनसभा को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा था कि यदि आम आदमी पार्टी गुजरात में सत्ता में आती है तो रामलला के दर्शन के इच्छुक लोगों की अयोध्या यात्रा का पूरा खर्च वहन करेगी। दाहोद गोधरा के पास है। वही गोधरा जिसने 2002 के बाद भारतीय जनता पार्टी और खासकर नरेन्द्र मोदी को राजनीतिक संजीवनी दी और हिंदुत्व की प्रयोगशाला के तौर पर गुजरात को स्थापित कर दिया। गुजरात चुनाव प्रचार में केजरीवाल राम के साथ ही गाय की बात कर रहे हैं और सोमनाथ व द्वारिकाधीश मंदिर में माथा टेक रहे हैं।

हिंदुत्ववादी राजनीति पर आखिर जोर क्यों?
विपक्षी दलों से लेकर जनता तक केजरीवाल के धार्मिक पर्यटक अवतार पर तरह-तरह की बातें कर रही है, पर सवाल यह है कि क्या विकास की राजनीति एक समय बाद दम तोड़ देती है? क्या केजरीवाल स्वयं को प्रासंगिक व स्थापित करने के लिए हिंदुत्व का सहारा ले रहे हैं? दरअसल, कोरोना काल की विभीषिका ने दिल्ली के नागरिकों को बुरी तरह से हिला दिया था। जनता की ऊंची अपेक्षाएं और सरकार के दावे साथ न चलें तो राजनीति में मुश्किल हो जाती है।

हाल में, उनके मंत्री राजेंद्र गौतम ने हिन्दू देवी-देवताओं की निन्दा करते हुए नवबौद्धों का बड़ी संख्या में मतान्तरण करवाया तो गुजरात में हिंदू वोटरों पर विपरीत असर के चलते उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया। पंजाब में 'आप सरकार' ने जो लोक-लुभावन वादे किये उनके लिए बजट नहीं है। केजरीवाल जानते हैं कि विकास के नारे के नाम पर जनता अधिक समय तक साथ नहीं देती। वे यह भी जानते हैं कि जब तक केंद्र में नरेन्द्र मोदी हैं, भारत में हिंदुत्ववादी राजनीति चलेगी। तभी वे दिल्ली चुनाव में हनुमान भक्त बन जाते हैं तो गुजरात में राम-कृष्ण को भजते हैं।

जिस प्रकार 24 वर्षों से भाजपा ने गुजरात मॉडल को अपनी सफलता का चेहरा बना लिया है उसी गुजरात मॉडल को केजरीवाल ध्वस्त कर खुद को स्थापित करना चाहते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह भारत में नई राजनीति की शुरुआत होगी जिसमें हिंदुत्व, देशभक्ति, विकास, रेवड़ी जैसे तत्वों की खिचड़ी होगी और भाजपा की राजनीतिक विरासत आम आदमी पार्टी को मिलेगी।

भारत में लालफीताशाही की प्रतीक अफसरशाही से नेता बने केजरीवाल जानते हैं कि कहाँ, किस राज्य में किस मुद्दे को उठाने से चर्चा में रहा जाएगा और कहाँ, किस राजनीतिक दल की विरासत को अपनाकर वे अपनी राजनीतिक जमीन पुख्ता कर सकते हैं? उन्होंने दिल्ली में किया, पंजाब जीता और अब गुजरात के चलते वे हिंदुत्ववादी राजनीति के दूसरे नरेन्द्र मोदी बनना चाहते हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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