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Mahatma Gandhi: बेमतलब है महात्मा गांधी की महत्ता पर सवाल खड़ा करना

Mahatma Gandhi: प्रायः यह सवाल पूछा जाता है कि क्या गांधीजी वर्तमान परिदृश्य में भी प्रासंगिक रह गये हैं? जहाँ तक गांधी की प्रासंगिकता का सवाल है तो उसके बरक्स अपनी ओर से कुछ कहने के बजाय कुछेक प्रसंगों, संदर्भों एवं वक्तव्यों को जानना-समझना रोचक एवं सुखद रहेगा। एक बार बराक ओबामा से एक सभा में अमेरिकन छात्रों ने पूछा: ''यदि आपको अपने समकालीन या इतिहास में से किसी एक व्यक्ति के साथ डाइनिंग टेबल साझा करने का अवसर मिले तो आप किनके साथ भोजन करना चाहेंगे?'' उन्होंने सगर्व उत्तर दिया- ''महात्मा गाँधी।''

रतन टाटा से नैनो कार की लॉंचिंग के अवसर पर पत्रकारों ने सवाल पूछा कि ''आपके जीवन का सबसे यादगार पल कौन-सा है?'' उन्होंने उत्तर देते हुए कहा कि ''जब वे अमेरिका-प्रवास पर गए हुए थे। वहाँ एक अश्वेत व्यक्ति गाँधी की प्रतिमा को संकेतों से दिखाते हुए अपने छोटे बच्चे से कह रहा था कि बेटा, ये महात्मा गाँधी हैं, ये हमारे लिए सम्मान एवं न्याय की लड़ाई लड़ने वाले महान नेता मार्टिन लूथर किंग के गुरु हैं, इन्हें प्रणाम करो।'' रतन टाटा ने कहा कि यही उनकी ज़िंदगी का सबसे यादगार और गौरवपूर्ण क्षण था।

gandhi jayanti 2023 questions over importance of Mahatma Gandhi is meaningless

प्रसिद्व उद्यमी नारायण मूर्त्ति से जब पूछा गया कि उन्हें इंफोसिस जैसी कंपनी की स्थापना की प्रेरणा किससे मिली तो उन्होंने तपाक से उत्तर दिया-'गाँधी से।' वर्गीज़ कूरियन गुजरात के आनन्द में अमूल जैसे सहकारी आंदोलनों के प्रयोग की चर्चा करते हुए गाँधी को अपनी प्रेरणा बता रहे थे। राजकुमार हिरानी अपनी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म ''लगे रहो मुन्ना भाई'' की सफलता का सारा श्रेय गाँधी जैसे मज़बूत 'कंटेंट' को देते हैं। संजय दत्त अपनी दुर्बलताओं से जूझने और उससे उबर पाने में गाँधीजी से प्रेरित-प्रभावित भूमिकाओं को एक उत्प्रेरक बताते रहे हैं। रिचर्ड एटनबरो अपनी फिल्मों को मिलने वाले सात ऑस्कर का सारा श्रेय गाँधी के करिश्माई व्यक्तित्व को देते हैं।

2023 में भारत जब ज़ी-20 की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली में तमाम विदेशी मेहमानों एवं शासनाध्यक्षों की मेजबानी करता है, तब वह शेष दुनिया को भारत का संदेश देने के लिए गाँधी और उनके समाधिस्थल को ही चुनता है। पूरी दुनिया में ऐसे कई शिखर-पुरुष रहे जो गाँधी से किसी-न-किसी स्तर पर प्रेरणा लेते रहे।

आइंस्टीन का विश्व प्रसिद्ध वक्तव्य गांधी के व्यक्तित्व की विशालता पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त है- ''आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।'' गाँधी के विचारों को लेकर सफल आंदोलन चलाने वाले मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, आँग सान सू की, एडॉल्फो को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। स्वयं गाँधी रेकॉर्ड 5 बार नोबेल के लिए नामित हुए। क्या अब भी यह सवाल बचा रह जाता है कि गाँधी प्रासंगिक हैं या अप्रासंगिक?

अपितु यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ज्यों-ज्यों दुनिया में अन्याय, अत्याचार, असमानता, निरंकुशता, आतंक, अराजकता जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ बढेंगी, गाँधी के विचारों की महत्ता और भी बढ़ती जाएगी। हिंसा, कलह और आतंक से पीड़ित मानवता को गाँधी शांति, अहिंसा और सद्भाव की राह दिखाते हैं। क्या इसमें भी कोई दो राय हो सकती है कि आँख के बदले आँख की राह पर चलकर तो एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी हो जाएगी?

गाँधी ने कार्ल मार्क्स की तरह सर्वत्र संघर्ष और कोलाहल नहीं देखा, रक्तरंजित क्रांति की बात नहीं की, धर्म को अफ़ीम की गोली नहीं माना। उन्होंने आत्मा के रूपांतरण की बात की, धर्म को आंतरिक उन्नयन का मार्ग बताया। उन्होंने सर्वत्र समन्वय और सहयोग देखा और यही भारत की सनातन जीवन-पद्धत्ति से निकला हुआ संतुलित-सुविचारित निष्कर्ष है। क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि आज छोटी-छोटी बातों पर समाज में जैसा उबाल देखने को मिलता है उसे शांत करने का मार्ग गाँधी सुझाते हैं। गुस्से, उत्तेजना और उतावलेपन का जैसा विस्फोटक रूप हर कहीं, हर दिन सामने आ रहा है, क्या उसमें गाँधी के विचार एक समाधान की तरह नहीं हैं?

क्या आज कोई ऐसा राजनीतिक नेतृत्व है जो अपने अनुयायियों को हिंसक, उच्छृंखल या अराजक होने से रोक पाने का मज़बूत माद्दा रखता हो? आज आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को स्वयं नहीं पता होता कि अंततः उसके आंदोलन की दिशा और दशा क्या और कैसी रहेगी? प्रायः विभिन्न मुद्दों पर बुलाया गया आंदोलन कालांतर में अपने ध्येय से भटक जाता है या राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता है। यह गाँधी का नैतिक प्रभाव एवं आचरणगत अनुशासन ही था कि वे अपने आंदोलन को हिंसक, उग्र या अराजक नहीं होने देते थे। साध्य को साधने के क्रम में साधन की शुचिता का सवाल उनकी आँखों से कभी ओझल न होने पाती थी।

क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, परंतु विवेकशील प्राणी प्रतिक्रिया से पूर्व सौ बार सोचता है। गाली के बदले गाली, थप्पड़ के बदले थप्पड़, हिंसा के बदले हिंसा में कौन-सी बहादुरी एवं विशेषता है? सभ्य, संयमी एवं अनुशासित समाज हमेशा धैर्य और विवेक से काम लेता है। फिर गाँधी मज़बूरी के पर्याय कैसे हुए?

गांधी के चिंतन से उपजे सुराज, राम-राज्य, स्वच्छता, स्वाबलंबन, ग्राम-स्वराज, व्रत-उपवास, प्रार्थना-परोपकार, श्रम की महिमा व गरिमा आदि आज भी अपनी महत्ता रखते हैं। उनके सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह आज भी प्रासंगिक हैं। क्या कोई पिता झूठ के चलन वाले आज के इस दौर में भी अपने बच्चे को असत्य-भाषण की सलाह देता है, लोभी और स्वार्थी बनने की प्रेरणा देता है, उन्हें अपने आत्मीयों-स्वजनों एवं परिचितों के साथ हिंसक व्यवहार के लिए उकसाता है?

जब तक माता-पिता अपनी संतानों को सत्य, अहिंसा, प्रेम, अपरिग्रह के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहेंगे, तब तक गाँधी भी प्रासंगिक हैं। हो सकता है कि अपने संत स्वभाव के कारण गाँधी से राजनीतिक निर्णयों में कुछ भूल हुई हो, उनकी नीतियों में अतिशय उदारता और भावुक आदर्शवादिता का पुट हो, पर उससे उनकी नीयत पर तो सवाल नहीं खड़े होते।

ज़रा सोचिए, उस व्यक्ति ने जब देखा कि मिल मालिक मजदूरों को जूते तक पहनने नहीं देते उसने खुद 1917 से जूते नहीं पहनने का प्रण ले लिया। उसने जब देखा कि उसकी पगड़ी में जितने कपड़े लगते हैं, उतने में चार मजदूरों के तन ढँक सकते हैं तो उसने पगड़ी पहननी छोड़ दी। उसने जब देखा कि लोगों के पास तन ढंकने तक की सामर्थ्य नहीं है तो उसने मुंडन करा छोटी धोती धारण कर ली। उसने जब देखा कि खाने के लिए घी की कमी है तो उसने प्रार्थना में घी के दीए जलाने बंद कर दिए। आज राजनीति में कोई है - संकल्प का ऐसा धनी? हम अपनों से किए वादे तो निभा नहीं पाते, देश और समाज से किए वादों की तो बात ही बेमानी है।

जो व्यक्ति औसतन रोज 18 किलोमीटर चला हो, जिसने 79 हजार किलोमीटर यात्रा में बिताए हों, जो प्रतिदिन 700 से अधिक शब्द लिखता रहा हो, जिसने एक करोड़ से भी अधिक शब्द लिखें हों, जिसके लिखे एक-एक शब्द जीवन-मंत्र बन गए हों- उसकी महत्ता पर सवाल खड़े करना बेमतलब है।

जिस व्यक्ति पर 150 से अधिक मुल्कों ने 800 से अधिक डाक टिकट ज़ारी किए हों, जिस पर 45 से अधिक फिल्में और 500 से अधिक डॉक्यूमेंट्री बनी हों, जिस पर 90,000 से अधिक किताबें लिखी जा चुकी हों, जिसका जीवन ही उसका संदेश बन गया हो, जिसे आइंस्टाइन जैसे महानतम व्यक्ति ने बीसवीं शताब्दी का सबसे महान व्यक्ति घोषित किया हो, जिसे टैगोर जैसे साहित्यकार ने महात्मा की उपाधि दी हो, जिसे सबसे तेजस्वी पुरुष नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने श्रद्धा से 'राष्ट्रपिता' कहा हो, जिसके एक संकेत पर 'लौहपुरुष' ने सर्वाधिक शक्तिशाली पद का परित्याग कर दिया हो- उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़े करना क्या नासमझी और बड़बोलेपन का परिचायक नहीं? सत्य यही है कि तमाम तरह के राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप एवं मतवाद के बीच भी गांधी प्रासंगिक थे, हैं और आगे भी रहेंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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