Gandhi as Journalist: पत्रकारिता को आजादी का हथियार बनाने वाले "गांधीजी"
Gandhi as Journalist: महात्मा गांधी ने अन्याय और शोषण के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध, मानव सेवा और करुणा, सच के प्रति आग्रह, भीरुता के बजाय आत्मबल, स्वदेशी की भावना से सर्वोदय की कामना, स्वच्छाग्रह, अछूत निषेध एवं त्यागवृति के साथ संचय की कामना एवं शाकाहार आदि विचारों को आधिकाधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पत्रकारिता को औजार बनाया।
उनका पत्रकारीय लेखन 1890 में शुरू हुआ और यह कर्म मृत्युपर्यंत चलता रहा। इंग्लैंड में बैरिस्टरी की पढ़ाई के दौरान वे शाकाहार आंदोलन के समर्थक और 'वेजीटेरियन' समाचार पत्र के संपादक जोसिया ओल्डफील्ड के संपर्क में आए। वेजीटेरियन समाचार पत्र के फरवरी और मार्च 1890 के अंकों में गांधीजी ने शाकाहार विषय पर 6 लेख लिखे। उन लेखों पर मिली प्रतिक्रिया से उन्हें बल मिला, इसीलिए उन्होंने समाचार पत्रों को लिखकर अपनी बात कहने की आदत डाल ली थी।

दक्षिण अफ्रीका के शुरुआती दौर में ही गांधीजी ने नेटाल एडवरटाइजर्स, नेटाल विटनेस, नेटाल मर्करी आदि अंग्रेजी अखबारों में प्रवासी भारतीयों की समस्याओं और अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए पत्र एवं लेख लिखे और वे प्रकाशित भी हुए। इंडियन ओपिनियन का पहला अंक 4 जून 1903 को अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी एवं तमिल भाषा में प्रकाशित हुआ। (हालांकि अपनी आत्मकथा में गांधीजी ने इसका प्रकाशन वर्ष 1904 बताया है)। प्रवेशांक का अग्रलेख 'अपनी बात' शीर्षक से गांधीजी ने खुद लिखा। प्रवेशांक के पहले पृष्ठ के पहले कॉलम में छपा है कि यह साप्ताहिक पत्र अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी एवं तमिल चार भाषाओं में प्रकाशित है जो दक्षिण अफ्रीका के ब्रिटिश भारतीयों के हित के लिए निकाला गया है।
इंडियन ओपिनियन के संपादक मनसुख लाल नजर थे, पर संपादकीय गांधीजी ने लिखा था। संपादकीय में लिखा गया कि "हमें अपनी उपस्थिति के लिए किसी प्रकार की क्षमा याचना की आवश्यकता नहीं है। दक्षिण अफ्रीका के राजनीतिक जीवन में भारतीय समुदाय की अपनी पहचान है, इसलिए उसकी भावनाओं को व्यक्त करने वाले और विशेष तौर पर उसके मकसद को समर्पित समाचार पत्र को गैर जरूरी नहीं कहा जा सकता, दरअसल लंबे समय से इसकी जरूरत थी।"
गांधीजी ने वर्ष 1905 में इंडियन ओपिनियन में 10 पवित्र स्त्री पुरुषों क्रमशः इलिजाबेथ फ्राइ, अब्राहम लिंकन, काउंट टॉल्स्टॉय, फ्लोरेंस नाइटेंगल, स्वर्गीय कुमारी मैनिंग, डॉक्टर बर्नाडो, सर हेनरी लॉरेंस, सर थॉमस मनरो, लॉर्ड मैटकाफ, माउंट स्टुवर्ट एल्फिन्टस के जीवन चरित्र प्रकाशित किये। गुजराती भाषा में गांधीजी का लेखन मुख्यतः सूचनाप्रद होता था जबकि अंग्रेजी में प्रकाशित उनकी टिप्पणियों में विषयों की विपुल विविधता थी। इंडियन ओपिनियन में गांधी को लिखे गए टॉलस्टाय के पत्र 'लेटर टू ए हिंदू' का प्रकाशन 25 दिसंबर 1909, 1 जनवरी 1910 और 8 जनवरी 1910 के अंकों में हुआ। गांधीजी ने वर्ष 1909 में हिंद स्वराज पुस्तक लिखी थी। यह पहली बार इंडियन ओपिनियन के 11 दिसंबर 1909 और 18 दिसंबर 1909 के अंकों में छपा। पुस्तक मूल रूप से गुजराती में लिखी गई थी।
पुस्तक का दूसरा गुजराती संस्करण 1914 में छपा जिसकी भूमिका गांधीजी ने लिखी। जब यह पुस्तक भारत में प्रतिबंधित कर दी गई तब गांधीजी ने इसे अंग्रेजी में अनूदित किया। अंग्रेजी संस्करण की प्रस्तावना में गांधीजी ने लिखा है कि 'हिंद स्वराज में व्यक्त विचार मेरे हैं लेकिन मैं विनम्रता पूर्वक इसे तैयार करने में भारतीय दार्शनिकों के अलावा टॉलस्टाय, रस्किन, इमर्शन और अन्य लेखकों को शामिल करने का प्रयास किया है। गांधीजी ने जॉन रस्किन की पुस्तक 'अन टू दिस लास्ट' का गुजराती अनुवाद सर्वोदय शीर्षक से इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित किया। स्वास्थ्य के मसले पर गांधीजी ने 34 कड़ियों का धारावाहिक लेख इंडियन ओपिनियन में लिखा।
इंडियन ओपिनियन के जरिए आम लोगों से संवाद करते हुए सत्याग्रह शब्द को चुना गया। इंडियन ओपिनियन पत्र के जो जोहान्सवर्ग लेटर नामक कॉलम में 11 जनवरी 1908 को पाठकों से पैसिव रेजिस्टेंस के समानार्थी शब्द के लिए सुझाव मांगे गए। कुल चार लोगों की ओर से सुझाव आए थे। दो लोगों ने सदाग्रह बतलाया था। बाद में सदाग्रह को ही सुधार कर सत्याग्रह कर दिया गया।
गांधी जी जब भारत लौटे तो मुंबई क्रॉनिकल समाचार पत्र से जुड़े। उस समय मुंबई क्रॉनिकल के संपादक बेंजामिन हॉर्नीमैन थे। हॉर्नीमैन अंग्रेज होते हुए भी भारत की स्वाधीनता के समर्थक थे। उनको देश निकाला दिए जाने के बाद क्रॉनिकल के व्यवस्थापकों ने उसे चलाने का बोझ गांधीजी पर डाल दिया। गांधीजी ने उत्साह के साथ काम शुरू किया लेकिन अंग्रेज शासन ने जल्दी ही उसे प्रतिबंधित कर बंद करा दिया।
क्रॉनिकल के बंद होने से जो रिक्तता आई थी, उसी की पूर्ति के लिए यंग इंडिया के प्रकाशन का निर्णय लिया गया। क्रॉनिकल निकालने वाले उमर सुमानी और शंकर लाल बैंकर को यंग इंडिया का व्यवस्थापक बनाया गया। यंग इंडिया अंग्रेजी में निकलता था। गांधीजी ने तत्काल यह भांप लिया कि अंग्रेजी माध्यम से देश की जनता को सत्याग्रह के बारे में ठीक से नहीं बताया जा सकता।
इसलिए गांधीजी ने नवजीवन अखबार के मालिक भाई इंदुलाल से संपर्क साधा। नवजीवन तब मासिक अंतराल पर प्रकाशित होता था। गांधीजी के हाथ में आने के बाद इसका साप्ताहिक प्रकाशन शुरू किया गया। इस तरह यंग इंडिया और नवजीवन का प्रकाशन 1919 में गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ। गांधीजी ने नियमित रूप से इन दोनों पत्रों के माध्यम से सत्याग्रह की शिक्षा देना शुरू किया और देखते ही देखते इन पत्रों की प्रसार संख्या 40 हजार का आंकड़ा पार कर गई। नवजीवन अखबार द्वारा गांधी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग और दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास प्रकाशित किया गया। यह दोनों आख्यान पहले साप्ताहिक पत्र में प्रकाशित हुए फिर बाद में इसे पुस्तक के रूप में छापा गया।
यंग इंडिया और नवजीवन बंद होने के बाद गांधीजी ने 4 फरवरी 1932 को हरिजन नामक अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला। गांधीजी हरिजनों का उद्धार चाहते थे। हरिजन सेवक संघ की स्थापना और उसके बैनर तले सेवा कार्यों से लेकर हरिजन का प्रकाशन इसका सबूत है। गांधीजी की प्रेरणा से हरिजन पत्र कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित हुआ। हिंदी में वह हरिजन सेवक, गुजराती में हरिजन बंधु और मराठी में मराठी हरिजन नाम से निकला।
11 फरवरी 1933 को निकले हरिजन के प्रवेशांक की संपादकीय में ही गांधीजी ने अस्पृश्यता शीर्षक से संपादकीय लिखी और उसमें स्पष्ट कहा कि जातीय छुआछूत शास्त्रों के खिलाफ है। प्रवेश अंक में ही गांधीजी ने सात पंडितों के हस्ताक्षर का एक पत्र प्रकाशित किया जिसमें कहा गया था कि चारों वर्णों में जो समान अधिकार है उनका अधिकार हरिजन को मिलना चाहिए। यह चार अधिकार हैं मंदिर प्रवेश, शालाओं में शिक्षा, सार्वजनिक कुओं, घाटों, तालाबों और नदियों में निस्तार सुविधा। गांधी जी ने हरिजन के लिए बाबा साहब अंबेडकर को भी लिखने के लिए कहा था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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