Film Music Rights: म्यूजिक कंपनियों की दादागीरी से बेसुरा होता बॉलीवुड
बॉलीवुड में बड़ी म्यूजिक कंपनियों की दादागीरी से गीतकार, संगीतकार और गायक सब परेशान हैं। जिस तरह से बार बार कॉपीराइट के सवाल उठाये जा रहे हैं उससे बॉलीवुड के ही बेसुरा हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।

Film Music Rights: बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब सोनू निगम ने म्यूजिक कम्पनियों की 'बपौती' को लेकर खुलकर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि केवल दो कम्पनियों ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री पर कब्जा कर लिया है, टी-सीरीज और जी म्यूजिक। ये बात बाकायदा उन्होंने आंकड़ों के साथ समझाई कि कैसे 2019 में हिंदी की 113 फिल्में जो रिलीज हुईं, उनमें से 52 के म्यूजिक राइट्स जी म्यूजिक के पास थे, टी-सीरीज के पास 33 मूवीज के थे, जबकि सारेगामा के हिस्से में केवल 8 और सोनी म्यूजिक के हिस्से केवल 4 थे।
उनके सुर में सुर मिलाने आ गए थे अदनान सामी। उन्होंने आरोप लगाया कि नए गायकों का शोषण हो रहा है और रीमिक्स कल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस सारी लड़ाई के जड़ में केवल पैसा है। चाहे वो गायक हों, गीतकार हों, संगीतकार हों, लेखक हों या निर्देशक, सबको लगता है मूवी में उन्होंने कुछ ना कुछ तो रचा ही है। उसका फायदा उन्हें जिंदगी भर मिलना चाहिए। लेकिन फिल्म का कॉपीराइट प्रोडयूसर के नाम होता है, गानों का भी प्रोडयूसर के ही पास। गीतकारों, संगीतकारों और यहां तक कि गायकों को भी लगता है कि उनके गाने के कॉपीराइट में से कुछ हिस्सा उनका भी होना चाहिए, आखिर उनकी लेखनी, उनके म्यूजिक, उनकी आवाज से ही वो इतना मधुर बना है।
गायकों के बीच तो अरसे से ये बहस चली आ रही है कि उनको भी कॉपीराइट का कुछ हिस्सा मिले। एक बार तो ये विवाद इतना बढ़ था कि लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी में सालों तक बात ही नहीं हुई। उन लोगों ने एक साथ गाना भी नहीं गाया। दरअसल लताजी चाहती थीं कि खाली गाने की फीस लेकर क्यों चुप रहा जाए, जब प्रोडयूसर और बाद में उसके बच्चे दशकों तक कमाते रहते हैं। उनको भी हिट गाने से आए पैसे में से हिस्सा मिलना चाहिए। लेकिन मोहम्मद रफी का कहना था कि हमने एक बार पैसा ले लिया तो अब बार बार मांगने की क्या जरुरूत? लेकिन लोगों का मानना था कि मोहम्मद रफी चूंकि साउथ में फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन का भी बिजनेस करते थे, सो उनके पास काफी पैसा था। उन्हें पैसों की कमी नहीं रहती थी, इसलिए फिल्म निर्माताओं से संबंध बनाकर रखना चाहते थे।
जो काम फिल्म इंडस्ट्री में असंगठित रूप से चलता था, समय के साथ वो प्रोफेशनल तरीके से होने लगा, लेकिन जितने भी सीईओ या लीगल एडवाइजर टाइप के लोग इन फिल्म या म्यूजिक कम्पनियों से जुड़े, उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसा कल्चर विकसित किया जहां मानवीय संबंधों के ऊपर कॉन्ट्रेक्ट और मोनोपॉली हावी होने लगी। ये कम्पनियां केवल कुछ सुपरस्टार्स का ही लिहाज करती थीं, बाकी सबको उंगलियों पर नचाने लगीं। उनको ऐसे ऐसे कांट्रेक्ट्स में बांधने लगीं कि ये तक तय होने लगा कि किसको उठाना है और किसको गिराना है। पूरा फोकस पैसे पर हो गया।
दिक्कत तो तब होने लगी जब दस दस सेकंड की फुटेज चलाने के चलते न्यूज चैनल्स को नोटिस भेजे जाने लगे। सबसे ज्यादा यह काम यशराज फिल्म्स ने किया। फिल्म स्टार अपने ही गाने पर किसी शो में बिना इजाजत परफॉर्म नहीं कर सकते थे। इसका बैकफायर भी हुआ। मीडिया ने कई प्रोडक्शन हाउस की कवरेज बंद कर दी। फिल्में पिट गईं तो थोड़े बैकफुट पर आईं ऐसी कम्पनियां, लेकिन क्रिएटिव राइट्स को लेकर सवाल उठने बंद नहीं हुए।
'मिस्टर इंडिया' के निर्देशक शेखर कपूर ने जावेद अख्तर द्वारा उसके रीमेक बनाने पर सवाल उठा दिए कि क्या डायरेक्टर का अपनी फिल्म पर कोई राइट नहीं होता है? तो वहीं अमिताभ बच्चन के पास आज तक उनके ही बैनर अमिया प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी मूवी 'अभिमान' के राइट्स नहीं हैं, क्योंकि प्रॉक्सी के तौर पर सामने नाम उनके सेक्रेटरीज के थे।
ऐसे में इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसायटी (आईपीआरएस) नाम की एक संस्था बनी जिसने 2012 के कॉपीराइट एक्ट के तहत गीतकार और संगीतकार के 25-25 फीसदी अधिकार मांगे। हर बार जब भी गाना कहीं बिकेगा, उन्हें ये हिस्सा मिलेगा। सबसे दिलचस्प था मुंबई की इकोनोमिक क्राइम विंग में यशराज फिल्म्स के आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा के खिलाफ एफआईआर। करीब 100 करोड़ का दावा किया गया और ये आरोप लगाया गया कि ना तो रॉयल्टी यशराज फिल्म्स देता है और ना ही टेलीकॉम कम्पनियों, रेडियो स्टेशन्स और म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स से लेने ही देता है।
इस बीच जी स्टूडियो ने कंगना की फिल्म 'थलाइवा' के प्रोडयूसर्स को 6 करोड़ का नोटिस भेजा है, तो 'हेराफेरी 4' की शूटिंग शुरू होते ही टी-सीरीज का नोटिस अखबारों में छप गया है कि इस मूवी के ऑडियो विजुअल म्यूजिक राइट्स टी-सीरीज के पास हैं।
टी-सीरीज और जी स्टूडियोज के ये लीगल नोटिस बताते हैं कि बॉलीवुड में आसानी से कुछ बदलने वाला नहीं है। जी स्टूडियोज के पास जयललिता की जिंदगी पर बनी कंगना की मूवी 'थलाइवा' के वर्ल्ड वाइड राइट्स थे। कहा जाता है कि प्रोडयूसर्स का ये ऐलान कि दो हफ्ते बाद थलाइवा को नेटफ्लिक्स पर रिलीज करेंगे, मूवी के लिए दिक्कत बन गया। थिएटर में भीड़ आई ही नहीं। मूवी बुरी तरह पिट गई। जी स्टूडियोज एडवांस दे चुका था। अब वो नुकसान की भरपाई के लिए निर्माताओं से जवाब ना मिलने पर प्रोडयूसर्स की संस्था इम्पा में चला गया है।
जबकि अपनी नई फिल्म 'इमरजेंसी' के लिए जी स्टूडियोज से ही टाईअप कर चुकीं कंगना पूरी खबर को बोगस और प्रोपेगेंडा बता रही हैं। इधर टी-सीरीज का एक नोटिस एक ट्रेड मैगजीन में छपा है, जिसके मुताबिक हेराफेरी सीरीज के म्यूजिक और ऑडियो विजुअल सोंग्स के कॉपीराइट केवल उनके ही पास हैं। लोगों की समझ नहीं आता कि जब सीधे बात निर्माता या निर्देशक से कर सकते थे, तो ऐसा खुला नोटिस मीडिया में छपवाने की जरुरत क्या थी।
लेकिन जो भी हो, जिस तरह से लेखकों के लिए स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन (SWA) और गीतकारों, संगीतकारों की मदद के लिए इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसायटी (IPRS) जैसी संस्थाएं लड़ना शुरू हुई हैं, उम्मीद है कि एक दिन मुंबई फिल्म इंडस्ट्री सही मायने में प्रोफेशनल बनेगी और मोनोपोली की अकड़ को खत्म करेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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