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FCRA: विदेशी चंदे के धंधे पर क्यों है केन्द्र सरकार की पैनी नजर?

FCRA: इसी सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 72 साल पुराने प्रमुख थिंक टैंक इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट (आईएसआई) का विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) लाइसेंस रद्द कर दिया है।

फरवरी में आईएसआई का FCRA लाइसेंस रद्द किया गया और पिछले महीने जनवरी 2024 में वर्ल्ड विजन इंडिया और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च का FCRA लाइसेंस रद्द हुआ था। गृह मंत्रालय एनजीओ की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर है। एक रिपोर्ट के अनुसार 04 फरवरी तक 20,000 से अधिक एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए हैं। जिनमें अधिकांश तमिलनाडु से चल रहे एनजीओ थे।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सलाह देने के लिए पहली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा सोनिया गांधी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) स्थापित की गई थी। एनएसी की ताकत का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर में यह बात लोग कहते थे कि एनएसी से यूपीए सरकार नियंत्रित होती है।

एनएसी के सदस्य होने की वजह से हर्ष मंदर के एनजीओ अमन बिरादरी की जांच का साहस पिछली सरकार में जांच एजेन्सियां नहीं कर पाई। नई सरकार में अब केंद्रीय गृह मंत्रालय की शिकायत के बाद एफसीआरए के अलग-अलग प्रावधानों के उल्लंघन को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई है।

आरोप है कि उनकी संस्था को विदेशी फंड मिलता है। सीबीआई ने उनके एनजीओ के खिलाफ एफसीआरए के उल्लंघन का मामला दर्ज किया है। इसी महीने 02 फरवरी को उनके एनजीओ से जुड़े परिसरों पर सीबीआई ने रेड डाली है। सीबीआई का दावा है कि इस एनजीओ को जमकर विदेशी फंडिंग मिली है।

विवादों में रहने वाले हर्ष मंदर अपने एक पक्षीय लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने मुसलमानों के मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता के तौर पर अपनी पहचान बनाई हैं। उनकी संस्था प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की रडार पर भी है। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में उनके खिलाफ पहले से केस दर्ज करके रखा है। 2020 में उनके संचालन में चल रहा एक बाल गृह विवादों में आया था। उस वक्त राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने अपने छापे में वित्तीय और प्रशासनिक दोनों तरह की अनियमितताओं का पता लगाने का दावा किया था।

जांच एजेन्सियों ने बताया खतरा

एफसीआरए को लेकर सरकार अचानक गंभीर नहीं हुई। बताया जाता है कि देश की कई प्रतिष्ठित जांच एजेंसियों की रिपोर्ट सरकार को मिली थी। जिसमें कई गैर सरकारी संगठनों और उन्हें विदेशों से मिल रहे चंदे को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाए गए थे। बताया गया कि देश के कई प्रतिष्ठित एनजीओ और सरकारी सेवा में कार्यरत कुछ अधिकारी विदेशी पैसा लेकर, उसे देशविरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल कर रहे हैं।

विदेशी चंदे का इस्तेमाल ऐसी परियोजनाओं को लंबित करने में किया जा रहा है, जो देश के विकास के लिए आवश्यक है। इस पैसे का निवेश आंदोलनजीवियों, अराजकतावादियों और प्रदर्शकारियों पर करके जनभावना को भड़काने में किया जा रहा था। ये संस्थाएं समाज के बीच गरीब, दलित, वंचित जैसे असुरक्षित वर्ग की पहचान करती हैं और इनके आक्रोश को भड़काने पर निवेश करती। इन संस्थाओं का काम देश की फाल्ट लाइन को उभारना है। ईमानदारी से काम करने वाली संस्थाएं कम हैं। उन्हें कई बार पैसों के अभाव से गुजरना होता है।

ऐसे एनजीओ जो दलित, आदिवासी, महिलाओं के बीच काम करने के हवाला देकर समाज बांटने के काम में जुड़े हैं, उन्हें मदद करने के लिए देश विरोधी ताकतें खड़ी हो जाती हैं। जिन एनजीओ का एफसीआरए रद्द हुआ है, उन्होंने भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

इन गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि सरकार का एफसीआरए रद्द करने वाला कदम सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाली आवाज़ों को दबाने और नागरिक समाज संगठनों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने का एक साधन है। समाज के असुरक्षित वर्गो के बीच काम करने वाले संगठनों का कहना है कि वे पैसों की कमी के कारण अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे में समाज के बीच काम करना उनके लिए कठिन हो रहा है।

देश को बांटने वाला पैसा

कोई भी सरकार उन संगठनों को प्रोत्साहित कैसे कर सकती है जो विदेशों से आए धन को देश की तरक्की के लिए उपयोगी योजनाओं को लंबित कराने में कर रहे हों, जनभावनाओं को भड़काने में कर रहे हों? यह सिर्फ दावा भर नहीं है, इनका सुराग जांच एजेन्सियों को मिला है।

विदेशी पैसों का इस्तेमाल धर्मांतरण को बढ़ाने में भी किया गया है। कई क्षेत्रों की जनसांख्यिकी बीते दस पन्द्रह सालों में पूरी तरह से बदली है। यह बदलाव स्वाभाविक तरीके से नहीं हुआ। हल्द्वानी का उदाहरण हमारे सामने है, जहां अतिक्रमण हटाने के लिए गई प्रशासन की टीम पर हमला हुआ।

उल्लेखनीय है कि यहां हमलावरों के पक्ष में एनजीओ वाले चेहरे ही दिखाई पड़े। एनजीओ वालों ने सवाल खड़े किए कि कथित हमलावरों को विस्थापित किया गया तो वे कहां जाएंगे? जबकि सवाल कहां जाएंगे कि जगह यह होना चाहिए था कि आए कहां से हैं? भारत के किसी हिस्से से या फिर सरहद पार करके?

विदेशी चंदा और पारदर्शिता

एफसीआरए के धन से जुड़े षडयंत्रों को ध्यान में रखते हुए, विदेशी चंदे पर पारदर्शिता को लेकर गृह मंत्रालय सावधान हुआ। ऐसे मामलों में धांधली बंद करने के लिए एफसीआरए संशोधन से जुड़ा एक विधेयक पारित किया गया। बीते दो सालों (1 जनवरी 2022) से ऐसे गैर सरकारी संगठनों के खिलाफ कानून का असर दिखने लगा।

वर्ष 2021 में 22,762 संगठन एफसीआरए में पंजीकृत थे, कानून लागू होने के बाद एक जनवरी को ये संख्या घटकर 16,829 रह गई। अब संगठनों के पास एफसीआरए बचाए रखने का एक ही सूत्र है कि अपने कामकाज में वे पारदर्शिता लाएं। नए कानून में यह भी शामिल है कि एफसीआरए के अन्तर्गत यदि आपका एनजीओ पंजीकृत है तो आपकी संस्था को मिले विदेशी धन का इस्तेमाल कर बनाई गई किसी भी प्रकार की संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य होगा।

वर्तमान में जांच एजेन्सियों की नजर एफसीआरए के माध्यम से विदेशों से बड़ी रकम इकट्ठा कर रहे उन एनजीओ पर है, जो संस्था का इस्तेमाल हवाला कारोबार अथवा कर की चोरी में मदद पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। या फिर फंड डायवर्जन कर रहे हैं। पैसा शिक्षा में सुधार के लिए लेकर अभ्यर्थियों को तोड़ फोड़ के लिए उकसाने पर खर्च कर रहे हैं। सरकार के विरोध में चल रहे आंदोलनों को आर्थिक मदद पहुंचा रहे हैं या फिर वे धार्मिक कन्वर्जन में सक्रिय हैं। यदि ऐसे किसी भी काम में एफसीआरए मे माध्यम से पैसा लेकर कोई एनजीओ जुटा हुआ है तो इतना तय है कि वह देश की जांच एजेन्सियों की रडार पर है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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