External Pressure: अमेरिका, यूरोप के निशाने पर क्यों हैं मोदी?
External Pressure: अप्रेल और मई में होने वाले भारत की लोकसभा के चुनावों में अमेरिका, यूरोप और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र की दिलचस्पी 2014 के चुनावों से भी ज्यादा है| 2014 में भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद भारत के विपक्षी नेताओं ने दुनिया भर के मीडिया में उनके खिलाफ अभियान चलाया था| उनके प्रधानमंत्री चुने जाने बाद भी यह अभियान चलता रहा है।
पिछले कुछ सालों में विपक्ष के प्रमुख नेता राहुल गांधी अपने विदेशी दौरों में मोदी सरकार पर संविधान और लोकतंत्र को कुचलने और अपने विरोधियों के खिलाफ संवैधानिक संस्थाओं के दुरूपयोग का आरोप लगाते रहे हैं| यहाँ तक कि भारतीय संसद से पारित कई बिलों को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी गई, और सुप्रीमकोर्ट के फैसलों पर भी सवाल उठाए जाते रहे|

भारत के विपक्ष के उकसावे पर विदेशी मीडिया ने भी नागरिकता संशोधन क़ानून और कृषि कानूनों की गलत व्याख्या करने से परहेज नहीं किया| कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 हटाए जाने को भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की गई, जिसका पाकिस्तान ने लाभ उठा कर इसे संयुक्त राष्ट्र में उठाया|
राहुल गांधी को जब मानहानि के एक केस में दो साल की सजा हुई और सुप्रीमकोर्ट के पूर्व के फैसले और जन प्रतिनिधित्व क़ानून के मुताबिक़ उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म हो गई, तो उसकी भी विदेशी मीडिया और विदेशी सरकारों ने गलत व्याख्या की| राहुल गांधी ने देश से बाहर जाकर कहा कि उन्होंने संसद में नरेंद्र मोदी से उद्योगपति गौतम अडानी से उनके रिश्तों पर सवाल पूछे थे, इसलिए उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई|

अमेरिकी सरकार ने तथ्यों की जानकारी लेने के बजाए राहुल गांधी के बयान को ही सच मान कर भारत के लोकतंत्र पर चिंता प्रकट की| यह कहा गया कि विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए राहुल गांधी की सदस्यता रद्द की गई| जबकि कोर्ट के फैसले के कारण ही उनकी सदस्यता गई थी, और कोर्ट के फैसले से ही उनकी सदस्यता बहाल हो गई|
अब अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी के मामले में भी अमेरिका, जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र ने अज्ञानता भरा वही रूख अपनाया है| अज्ञानता नहीं, बल्कि जानबूझकर भारत के खिलाफ बड़ी साजिश के तहत प्रतिक्रिया दी गई है| अमेरिका और जर्मनी ने आधिकारिक तौर पर भारतीय लोकतंत्र पर चिंता प्रकट की है|
स्वाभाविक है कि यह भारत के आंतरिक मामलों में बेवजह का दखल है, जिस पर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इन दोनों देशों के दूतावास के अधिकारियों को तलब करके न सिर्फ नाराजगी का इजहार किया, बल्कि भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देने की नसीहत भी दी| लेकिन अमेरिका और जर्मनी के बयान राहुल गांधी के पिछले साल ब्रिटेन में दिए गए बयान की तर्ज पर ही हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि खुद को लोकतंत्र का झंडाबरदार समझने वाले अमेरिका और यूरोपियन देशों को भारत में लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरे पर आँख मूंदे नहीं रहना चाहिए|
अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने अमेरिका और ब्रिटेन में दिए भाषणों में मोदी के नेतृत्व में भारत में लोकतंत्र खत्म होने की बात कही थी| राहुल गांधी के अमेरिका और यूरोप के दौरे के बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस और पंजाब प्रदेश कांग्रेस के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने अरविन्द केजरीवाल को विपक्षी गठबंधन में शामिल किया| जिस तरह अमेरिका ने राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म होने पर सवाल खड़ा किया था, ठीक उसी तरह अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी पर भी सवाल खड़ा किया|
संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी और भी ज्यादा आपत्तिजनक है, जिसमें कहा गया कि लोकसभा चुनावों से पहले उनकी गिरफ्तारी के बाद दुनिया को उम्मीद है कि भारत में संसदीय चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे| संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटरेस के प्रवक्ता स्टीफन से एक प्रायोजित सवाल पूछा गया था| सवाल पूछने वाला बांग्लादेशी पत्रकार मुश्फिकुल फजल अंसारी पहले भी भारत विरोधी सवाल पूछता रहा है| वह बांग्लादेश में कई मामलों में वांछित है|
अंसारी ने कांग्रेस के बैंक खाते सील होने और केजरीवाल की गिरफ्तारी को भारत में "राजनीतिक अशांति" करार देते हुए सवाल किया था| क्या भारत के क़ानून के अंतर्गत हुई ये दोनों घटनाएं राजनीतिक अशांति है? कांग्रेस के बैक खातों को सील किए जाने पर अदालत ने कोई राहत नहीं दी, अलबत्ता आयकर विभाग की कार्रवाई को उचित ठहराया है| क्योंकि कांग्रेस ने आयकर से छूट हासिल करने के लिए समय सीमा में रिटर्न नहीं भरा और अपनी आय को छुपाया|
उसी तरह अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी पर भी कोर्ट ने कोई स्टे नहीं दिया, जबकि उनसे पूछताछ के लिए रिमांड दिया गया है| इसलिए पत्रकार का सवाल ही राजनीति से प्रेरित और प्रायोजित था, और जवाब उससे भी अधिक प्रायोजित और राजनीति से प्रेरित था| संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफन ने पहले से लिखा हुआ जवाब पढ़ते हुए कहा कि भारत या जहां कहीं भी चुनाव होते हैं, वहां सभी के नागरिक अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए|
संयुक्त राष्ट्र के इस बयान को भारत में एक बड़ा मुद्दा बनाकर पेश किया गया| क्या यह संयोग है कि अरविन्द केजरीवाल के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी दिल्ली हाईकोर्ट में लगातार नागरिक अधिकारों का हवाला दिया था| विपक्ष के लगभग सभी नेताओं और केजरीवाल के वकील ने कोर्ट में भी लोकसभा चुनावों के समय उनकी गिरफ्तारी पर सवाल उठाया था| अमेरिका, जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र भी केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनावों से जोड़कर देख रहा है|
आखिर यह एक जैसी भाषा कैसे आ रही है, जबकि केजरीवाल को पहला सम्मन तो अक्टूबर 2023 में गया था, गिरफ्तारी से पहले उन्हें 9 सम्मन जा चुके थे | सम्मन का सम्मान न करने के लिए उन पर केस दायर हुआ, जिसमें उन्हें जमानत लेनी पड़ी| यहाँ तक कि जब केजरीवाल खुद राहत पाने के लिए हाईकोर्ट गए थे, तो हाईकोर्ट ने उन्हें कोई राहत नहीं दी थी| गिरफ्तारी के बाद भी वह जांच में ईडी को सहयोग नहीं दे रहे, उन्होंने ईडी को अपने फोन और अन्य इलेक्ट्रोनिक डिवाईस के पासवर्ड देने से इंकार कर दिया है|
चुनावों से ठीक पहले विदेशों से नरेंद्र मोदी सरकार पर अचानक हमले तेज नहीं हुए हैं| इसकी पटकथा पिछले दो साल से लिखी जा रही थी| अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाईडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी को सबसे ज्यादा फंडिंग करने वाले जार्ज सोरोस ने कुछ महीने पहले कहा था कि भारत में लोकतंत्र तब पुनर्जीवित होगा, जब नरेंद्र मोदी चुनाव हारेगा|
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के समय जार्ज सोरोस का एक प्रतिनिधि उनसे मिलने भी पहुंचे था, जिसकी राहुल गांधी के साथ चलते हुए तस्वीर वायरल हुई थी| राहुल गांधी जब भारत जोड़ो यात्राओं के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन गए थे, तो उनके सारे कार्यक्रमों का आयोजन जिन एनजीओ ने किया था, उनको जार्ज सोरोस फंडिंग करते हैं| जार्ज सोरोस ने मोदी को चुनावों में हराने के लिए असीमित पैसा खर्च करने का एलान किया हुआ है|
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन की पार्टी को सबसे ज्यादा फंडिंग जार्ज सोरोस ही करते हैं, और वह अमेरिका की नीतियों को भी प्रभावित करते हैं| सवाल यह है कि क्या अमेरिका का बाईडेन प्रशासन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं देखना चाहता| खबर यह है कि अमेरिका मोदी के मुकाबले लचीले रूख वाला प्रधानमंत्री देखना चाहता है, ताकि वह आसानी से भारत की राजनैतिक और आर्थिक नीतियों को प्रभावित कर सके| अमेरिका को यह कतई पसंद नहीं आया कि उसके विरोध के बावजूद भारत ने यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस से तेल खरीदा| मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से इंकार कर दिया था|
अमेरिका का आकलन यह था कि भारत में मोदी विरोधी लहर चल रही है, इसलिए हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस जीती है| उन्हें राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा के हारने की उम्मीद थी| लेकिन इन तीनों राज्यों में मतदान के बाद जब भाजपा की जीत की खबरें आने लगी, तो चुनाव नतीजों से तीन दिन पहले 30 नवंबर 2023 को अमेरिका ने खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश में भारत का हाथ होने का आरोप लगा कर मोदी सरकार के खिलाफ खुली कूटनीतिक जंग का बिगुल बजा दिया था| इसके बाद भारत ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी| भारत ने दो टूक पूछा था कि अमेरिका में कितने खालिस्तान समर्थक रहते हैं|
चुनावों से ठीक पहले अमेरिका से भारत विरोधी गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है| जिनका मकसद चुनाव से पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को "राजनीतिक रूप से कमजोर" करना है| इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि अमेरिका अपने चीन विरोधी अभियान में भारत को मोहरा बनाना चाहता था, लेकिन मोदी सरकार ने इससे इंकार कर दिया| मोदी सरकार ने कहा कि भारत किसी का विरोध या समर्थन अपने हितों को ध्यान में रख कर ही करेगा|
इसलिए मोदी इस चुनाव को भारतीय अस्मिता का चुनाव बना कर लड़ रहे हैं| ताकि अमेरिका अपनी मर्जी का कठपुतली प्रधानमंत्री बनवा कर भारत की नीतियों को प्रभावित न कर सके| भारत की सात प्रतिशत विकास दर के अनुमान से भी अमेरिका चिंतित है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े बाजार वाला लोकतांत्रिक देश भारत आने वाले दशकों में अमेरिका की दादागिरी के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है|
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का विरोध करने वाले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस भविष्यवाणी को ही गलत बता दिया है कि भारत सात प्रतिशत विकास दर हासिल कर रहा है| संयोग से रघुराम राजन भी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे| हाल ही में राहुल गांधी ने उनके साथ एक पोडकास्ट भी किया था|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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