Women Voters: महिलाओं को टिकट नहीं, रेवड़ियां बांट रही हैं पार्टियां
Women Voters: नये संसद भवन में नारी शक्ति वंदन विधेयक पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा था कि 'यह सपना अधूरा था जिसे पूरा करने के लिए ईश्वर ने मुझे चुना।' इस विधेयक के कानून बनने के बाद इस बात की उम्मीद की जा रही थी कि नवंबर में होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव में बीजेपी महिला उम्मीदवारों की संख्या 33 प्रतिशत के आसपास रख सकती है। ऐसा करके वह यह संदेश दे सकती है कि महिला आरक्षण कानून भले ही 2029 में लागू हो, भाजपा ने उसे 2023 के विधानसभा चुनावों से ही लागू करने का तय कर लिया है।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भाजपा अभी तक मध्य प्रदेश की 230 सीटों में से 136 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुकी है जिसमें मात्र 17 महिलाओं को ही टिकट दिया गया है। राजस्थान में 41 उम्मीदवारों की पहली सूची में मात्र 4 महिलाओं को टिकट दिया गया है। छत्तीसगढ़ में दूसरी सूची के बाद कुल 14 महिला उम्मीदवार मैदान में है। छत्तीसगढ़ में सिर्फ 5 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित होना बाकी है।

टिकट बंटवारे में भाजपा ने भले ही महिलाओं को 33 प्रतिशत हिस्सा न दिया हो लेकिन मध्य प्रदेश में भाजपा इस बार महिला वोटरों को केन्द्र में रखकर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सिर्फ पिछले चार महीनों में ही महिलाओं के लिए 21 हजार करोड़ से अधिक की घोषणाएं की हैं। इस मामले में मुख्यमंत्री रहे और फिर से मुख्यमंत्री बनने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे कांग्रेस के नेता कमलनाथ ने भी महिलाओ के लिए 30 हजार करोड़ के वादे कर डाले हैं। इन वादों को देखे तो यह सरकार की कुल कमाई के 30 प्रतिशत के आसपास बैठता है।
भारतीय जनता पार्टी ने तय किया है कि वह मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार और मोदी के किए गए कामों को लेकर महिला मतदाताओं के बीच जाएगी। भाजपा महिलाओें को यह बताना चाहती है कि डबल इंजन की सरकार होने का मतलब महिलाओं को डबल बोनस। मोदी के रक्षा बंधन के दिन गैस सिलेडर में 200 रूपये की कटौती और 2016 में शुरू की गई उज्वला योजना को 75 लाख घरों तक बढ़ाने के साथ ही महिलाओं के लिए स्वच्छ जल मिशन, सुकन्या समुद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं महिलाओं को समर्पित हैं।
मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी महिला मतदाताओं का दबदबा लगातार बढ़ रहा है। पिछले चार विधानसभा चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरूषों के मुकाबले लगभग दो गुना तेजी से बढ़ा है। 2018 के चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरूषों के लगभग बराबर पहुंच गया है। ऐसे में आधी आबादी पर राजनीतिक दलों का फोकस भी पूरा है। अशोक गहलोत सरकार ने चुनावी साल में अपनी तीन बड़ी योजनाएं महिलाओं पर ही केन्द्रित रखी। बचत-राहत-बढ़त और स्मार्ट फोन वितरण। यही नहीं, सरकारी योजनाओं के प्रचार पोस्टरों का रंग भी महिलाओं की पसंद को ध्यान में रखते हुए गुलाबी रखा गया है।
इससे पहले वसुंधरा सरकार ने भी आधी आबादी के लिए भामाशाह योजना, पंचायत राज में 50 प्रतिशत आरक्षण जैसे बड़े कदम उठाए थे। राजस्थान के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2013 के मुकाबले 2018 में पुरूष वोटिंग 4.85 प्रतिशत व महिला वोटिंग 10.46 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। लोकतंत्र के उत्सव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने का ही नतीजा है कि इस बार विधानसभा चुनावों में महिलाएं सियासी दलों के केन्द्र में है। हालांकि मतदान में महिलाओं की भागीदारी भले ही लगातार बढ़ रही हो लेकिन पार्टी में पद, चुनाव में टिकट और उसके बाद मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल सरकार ने महिलाओं को ध्यान में रखते हुए महिला कोष ऋण योजना में महिलाओं को ऋण देने की सीमा चार लाख से बढ़ाकर छह लाख कर दी है। इसके अलावा भूपेश बघेल ने कौशल्या मातृत्व योजना के अंतर्गत दूसरी बेटी के जन्म होने पर महिलाओं को 5 हजार की सहायता राशि दिए जाने का प्रावधान किया है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल महिला वोटर्स पर फोकस इसलिए भी कर रहे हैं क्योकि छत्तीसगढ़ गठन के बाद पहली बार महिला मतदाताओं की संख्या पुरूष मतदाताओं से ज्यादा हो गई है। राज्य निर्वाचन आयोग के जारी किए गए आंकड़ों में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश के कुल 33 जिलों मे से 18 में महिला मतदाताओं की संख्या पुरूषों से अधिक हो गई है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव भी महिलाओं को लुभाने में पीछे नहीं रहना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने अपने राज्य तेलंगाना में कल्याण लक्ष्मी और शादी मुबारक योजनाएं लागू की है। इसके अंतर्गत दुल्हनों को शादी के समय एक लाख रूपये की एक बार वित्तीय सहायता दी जाती है। कांग्रेस ने तेलंगाना में सरकार आने पर महालक्ष्मी गारंटी योजना के तहत बेटियों को एक लाख रूपये और एक तोला सोना देने का वादा किया है।
टिकट बंटवारे में भले ही 33 प्रतिशत हिस्सेदारी देने की बाध्यता 2029 में आये लेकिन उससे पहले ताजा विधानसभा चुनावें में सभी राजनीतिक दल महिलाओं को ध्यान में रखकर योजनाएं बना रहे हैं और सत्ता में आने पर महिलाओं के लिए नई योजनाए लागू करने का वादा कर रहे हैं। महिला आरक्षण विधेयक को संसद से पारित करवाने वाली बीजेपी यह बताना चाहती है कि मोदी के कारण महिलाओं को जीवनयापन में आसानी तथा आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी विधानसभा चुनाव में इस बात को फोकस में रखना चाहती है कि मोदी की योजनाओं की सबसे बड़ी लाभार्थी महिलाएं रही हैं और मोदी सरकार ने साढ़े नौ साल के कार्यकाल में नारी शक्ति पर विशेष ध्यान दिया है इसलिए यह बात अधिक से अधिक महिला वोटरों तक पहुंचाई जाए।
असल में बीजेपी महिला आरक्षण के असर को इस चुनाव में महिला वोटर्स के माध्यम से देखना चाहती है। यदि महिलाएं भाजपा के पक्ष में एकतरफा वोटिग करती है तो तय है मोदी और भाजपा की राज्य सरकारें 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए महिलाओं के लिए और नई योजनाएं लाकर आधी आबादी के वोट को सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी।
कांग्रेस महिला वोटरों को साधने के साथ साथ ओबीसी आरक्षण की मांग और जातिगत सर्वेक्षण कराने का वादा करके भाजपा के वोट बैक में सेंध लगाने की कोशिश में है। महिला वोटर्स ओबीसी के नाम पर बंटती है या एकमुश्त वोट करती हैं यह चुनाव परिणाम के बाद पता चलेगा लेकिन एक बात तय है कि यह पहला विधानसभा चुनाव है जिसे महिलाओं को केन्द्र में रखकर लड़ा जा रहा है। महिला वोटर्स के लिए सभी दल पूरी ताकत झोंक रहे है। भाजपा हो या विपक्षी दल सभी महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए हर संभव कदम उठा रहे हैं। लेकिन महिलाओं को टिकट देने में राजनैतिक दलों की हिचक अभी भी स्पष्ट दिख रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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