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Election Expenses: लोकतंत्र के लिए मंहगा सौदा बनती राजनीति

Election Expenses: जैसे-जैसे चुनावी खर्च बढ़ा है, राजनीतिक पार्टियों की हैसियत भी बढ़ते हुए हजारों करोड़ की हो गई है। चुनावी बांड के जरिए भारतीय लोकतंत्र के गले में पड़ी पूंजी की फांस को लेकर देश की सुप्रीम अदालत के फैसले के बाद अब सबकी नजर चुनाव आयोग पर लगी है।

मालूम हो कि बीते 15 फरवरी को उच्चतम न्यायालय ने चुनावी बांड को असंवैधानिक करार देते हुए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को राजनीतिक पार्टियों को मिले चुनावी चंदे की जानकारी देने का निर्देश दिया है। अदालत ने बैंक को कहा है कि वह तीन सप्ताह के भीतर सारी जानकारी चुनाव आयोग को मुहैया कराए और चुनाव आयोग इस जानकारी को 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा।

Election Expenses

वर्ष 2022-23 के लिए आंकड़ा मोटा-मोटी 16 सौ करोड़ रुपए का है, जो राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में मिला है। देखना यह है कि चुनाव आयोग आधिकारिक तौर पर कितना पैसा दर्शाता है और सभी पैसा देने वालों के नाम उजागर करता है या नहीं?

साफ सुथरे संसाधन के साथ चुनाव लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य माना गया है। लेकिन बाजार की दखलंदाजी के कारण चुनाव लगातार मंहगे होते जा रहे हैं। राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं से अधिक भरोसा पेशेवर लोगों पर कर रहे हैं। पार्टियां अपने चरित्र और कार्यशैली को पॉलिटिकल एंटरप्रेन्योर के रूप में बदल रही हैं। टेक कंपनियां भी इस मौके को खूब भुना रही हैं और राजनीतिक दलों को अपना क्लाइंट बनाकर मोटी कमाई कर रही हैं।

इस संकट को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहले ही भांप लिया था। वर्ष 1962 में अटल बिहारी वाजपेयी ने कॉर्पोरेट से चुनावी चंदे के प्रचलन को खत्म करने के लिए लोकसभा में निजी सदस्य बिल पेश किया था। तर्क दिया गया था कि संभव है कि सभी पक्षों को कॉर्पोरेट से चंदा लेना मंजूर न हो, इसलिए उनकी सहमति लिए बिना कॉर्पोरेट से चंदा लेने को मंजूरी देना अनैतिक होगा।

वाजपेयी का कहना था कि ऐसे चंदों से केवल कॉरर्पोरेट के हित सधेंगे। जहां सभी राजनीतिक पार्टियों ने बिल का स्वागत किया वहीं तत्कालीन सत्तारुढ कांग्रेस पार्टी ने इसके पक्ष में वोट नहीं किया। उसके बाद ऐसा बिल कभी पेश नहीं हुआ। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29 बी के तहत राजनीतिक पार्टियां विदेशी स्रोतों को छोड़कर किसी से भी चंदा ले सकती हैं। इससे दो निष्कर्ष निकालते हैं, पहला- धन में राजनीतिक एजेंडा को प्रभावित करने की क्षमता है। दूसरा, विदेशी चंदा चुनावी शुचिता को खंडित करता है। यह दोनों बातें उस व्यक्ति, गैर मतदाता पर भी बराबर लागू होती है जिसका चुनाव प्रक्रिया से कुछ लेना देना नहीं है।

विदेशी स्रोत से चंदे के साथ जैसी चुनौतियां जुड़ी है, वैसी ही चिंताएं कॉर्पोरेट से मिलने वाले चंदे के साथ भी जुड़ी होती है। अंतर सिर्फ इतना है कि जहां विदेशी चंदा न्यायिक परिधि से बाहर है तो दूसरा यानी कॉर्पोरेट चुनाव में प्रतिभागी न होने से चुनावी प्रक्रिया के लिए बाहरी तत्व हैं। लेकिन पार्टीगत हितों के चलते इस कानून को ठोस नहीं बनाया गया।

वाजपेयी ने अपने बिल में कॉर्पोरेट बनाम आम नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी जिक्र किया था। आमतौर पर कॉर्पोरेट ग्रुप अपने सदस्यों, जिन्हें व्यापार की स्वतंत्रता है, के आर्थिक हितों को साधने वाले संगठन होते हैं। इसलिए उनके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से तात्पर्य कारोबारी स्वतंत्रता से होता है। यकीनन यह स्वतंत्रता व्यावसायिक उद्देश्य वाली होती है। दूसरी तरफ नागरिकों के पास अभिव्यक्ति की निर्वाध स्वतंत्रता है, जो राजनीतिक क्षेत्र तक विस्तार ले लेती है।

चूंकि कॉर्पोरेट मतदाताओं की भांति लोकतंत्र में प्रतिभागी नहीं होते, इसलिए उनका राजनीतिक भाषण और अभिव्यक्ति के लिए कोई दावा नहीं होता। इसीलिए जहां नागरिक मतदाता अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी राजनीतिक पार्टी को चंदा दे सकते हैं, वहीं कॉरपोरेट को किसी राजनीतिक पार्टी को चंदा देने से बचना चाहिए। वाजपेयी जी ने सदन में जो प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था उसका मूल मकसद चुनाव सुधार से जुड़ा था।

अदालत के हालिया निर्णय के बाद चुनाव सुधार का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। भारतीय लोकतंत्र को दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्र के रूप में देखा जाता है तो उसके कारणों में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता भी शामिल है। भारत में समय-समय पर इस प्रक्रिया की कमियों को दूर करने के लिए सुधार किया जाता रहा है।

टीएन शेषन जैसे निर्वाचन आयुक्तों ने अपने कुछ कड़े निर्णय से बड़े सुधार किये और ख्याति प्राप्त की। उस दौर में धनबल के साथ बाहुबल का प्रयोग कर पंचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनाव को प्रभावित किया जाता रहा। तब बूथ कैपचरिंग जैसे हथकंडे अपनाने वाले अपराधी प्रवृत्ति के लोग चुनकर संसद और विधानसभाओं में पहुंचने लगे थे, लेकिन उनके समर्थकों पर जब शेषन और के जे राव की शक्ति का डंडा चला था, तब बाहुबली जड़ मूल से खत्म हो गये।

चुनाव सुधार के लिए शेषन के समय में गठित दिनेश गोस्वामी समिति, राजनीति के अपराधीकरण पर बोहरा समिति आदि की सिफारिशों पर ढेर सारा सुधार किया गया, जिसका सकारात्मक प्रभाव सीधे रूप से दिखाई पड़ता है। लेकिन अब तक के तमाम सुधारों के बावजूद धन बल के प्रयोग की स्थिति इतनी भयावह बन चुकी है कि छोटे से छोटे चुनाव में भी प्रत्याशियों द्वारा करोड़ों रुपया खर्च किया जा रहा है। पिछले कुछ चुनाव आंकड़ों को देखें तो कानून सम्मत और असल खर्च के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। ऐसे मे अगर खर्चे ज्यादा है, तो बगैर चंदा, बगैर सहयोग के कोई प्रत्याशी या कोई राजनीतिक दल चुनाव में कैसे हिस्सा ले सकता है?

यही कारण है कि वास्तविक राजनीतिक अर्थों में किसी भी पार्टी को चंदा संबंधी कानून में सुधार से कोई फायदा नजर नहीं आता। सत्तारूढ़ दल के साथ-साथ मुख्य विपक्षी पार्टी तक को उम्मीद होती है कि जब वह सत्ता में आएगी तो इस सहूलियत से लाभान्वित हो जाएगी।

इसलिए जरूरी है कि अनुच्छेद 324 के तहत चुनावी चंदा संबंधी मामले को निर्वाचन आयोग को सौंप दिया जाए। राजनीतिक दलों को निष्पक्ष और पारदर्शिता से चंदा मुहैया कराने के लिए जरूरी है कि बेहिसाबी पैसे और कॉरपोरेट और गैर मतदाता द्वारा राजनीतिक दलों को सीधे चंदा दिए जाने का नियमन हो। इस क्रम में मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को सरकार की तरफ से धन मुहैया कराना भी कारगर विकल्प हो सकता है। इस तरह की योजना प्रत्यक्ष करों पर एक प्रतिशत का उपकार लगाकर कारगर बनाई जा सकती है। निर्वाचन आयोग एक राष्ट्रीय निर्वाचन कोष बना सकता है, जिसमें उपकार से संग्रहित धन जमा किए जाए।

उपकर प्रगतिशील होने के कारण गरीब उम्मीदवारों के लिए भी चुनाव लड़ना आसान हो जाएगा। इसके साथ ही राजनीतिक पार्टियों को मतदाताओं से सीधे चंदा लेने की छूट हो। जो मतदाता नहीं है वह अपना योगदान तटस्थ रूप से निर्वाचन कोष में दे सकते हैं। कॉर्पोरेट द्वारा अगर इस कोष में पैसा दिया जाता है तो उससे चुनाव प्रक्रिया पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि चुनाव में लोगों की निष्ठा में इजाफा होगा। राजनीतिक पार्टियां भी सत्ता में आने के बाद अधिक से अधिक समावेशी एजेंडा को क्रियान्वित करने के लिए प्रेरित होंगी। मतदाताओं का महत्व बढ़ेगा और तभी लोकतंत्र वास्तव में लोगों का, लोगों के लिए और लोगों द्वारा बन सकेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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