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देश की सौ प्रतिशत जनता देती है टैक्स

सुप्रीम कोर्ट के जज हेमंत गुप्ता ने सोमवार को कर्नाटक हिजाब विवाद मामले में सुनवाई करते हुए एक ऐसी टिप्पणी कर दी जो किसी भी नागरिक के लिए असहज करनेवाली है। जब उनके सामने यह तर्क आया कि शिक्षा भारत के हर नागरिक द्वारा दिये गये टैक्स से दी जाती है तो उन्होंने कहा कि "भारत में सिर्फ 4 प्रतिशत लोग टैक्स देते हैं।" हालांकि बाद में उन्होंने अपनी गलती सुधार ली और कहा कि सिर्फ 4 प्रतिशत लोग डायरेक्ट टैक्स देते हैं जबकि इनडायरेक्ट टैक्स तो सभी भरते हैं।

Each citizen of country pays tax to government

भारत में जीएसटी युग आ जाने के बाद अब ये बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि इस देश में कौन टैक्स नहीं देता। अब देश में शत प्रतिशत लोग टैक्स दे रहे हैं। हां, इन्कम टैक्स की परिधि में चार प्रतिशत नागरिक आते हैं। लेकिन जीएसटी युग आने के बाद अब कुछ ऐसी परिस्थिति बन गयी है कि ये 4 प्रतिशत लोग दोहरा टैक्स भर रहे हैं। इसके बावजूद जो गरिमापूर्ण व्यवहार देश की व्यवस्था, सरकारी कर्मचारी, टैक्स अधिकारी की तरफ से मिलना चाहिए वो उन्हें नहीं मिलता है। देश के विकास में इतना मौद्रिक योगदान देने के बाद भी चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस वाला, पुलिस स्टेशन में जाने पर पुलिस वाले, टैक्स विभाग के कर्मचारी नागरिकों के लिए वह न्यूनतम आवश्यक आदर और कृतज्ञता व्यक्त नहीं करते जो उन्हें मिलना चाहिये।

एक व्यक्ति या संस्था द्वारा पूरे वर्ष में दिये जा रहे सब तरह के टैक्स चाहे जीएसटी हो या आयकर हो या स्टाम्प ड्यूटी हो या अन्य कर हो, उनको मिला कर एक डाटा तैयार होना चाहिए। इस सम्मिलित राशि का एक सर्टिफिकेट उन्हें प्रदान करना चाहिये ताकि उन्हें यह महसूस हो कि इस राष्ट्र निर्माण यज्ञ के महा आयोजन में उनकी भी आहुति है। सब कुछ तो होता ही है बस इसे चिन्हित और रेखांकित करना है और सिर्फ ऐसा कर देने से देश में ना केवल राष्ट्रीय भावना मजबूत होगी, बल्कि कर संग्रह भी बढ़ेगा।

कुछ साल पहले प्रधानमंत्री ने "पारदर्शी कराधान - ईमानदार का सम्मान" व्यवस्था लागू की थी और एक नया टैक्स चार्टर भी जारी किया था जिसमें करदाताओं की गरिमा को ध्यान में रखते हुए करतंत्र की कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव किये थे। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने भी वर्ष 2016 में एक योजना चालू की थी जिसमें नियमित और ईमानदार करदाताओं को सम्मान पत्र देने की बात की थी जिसमें से कुछ चुनिंदा प्रमाणपत्र भौतिक रूप से भी दिये जाने थे। ये अच्छी शुरुआत थी लेकिन इसमें अप्रत्यक्ष कर भुगतान कर रही जनता को धन्यवाद देना शामिल नहीं था।

जैसा हमें राजपथ का नाम कर्त्तव्य पथ हुआ सुनने को मिला वैसे ही सरकार एक पहल की और शुरुआत कर सकती है। जब करदाता टैक्स का चालान भरता है तो वहां सिर्फ जीएसटी की जगह राष्ट्र निर्माण जीएसटी टैक्स, आयकर की जगह राष्ट्र निर्माण आयकर लिख दिया जाय तो भुगतान के समय भी उसे गर्व और संतोष की अनुभूति होगी। इन छोटे छोटे क़दमों से हम करदाताओं का सम्मान तो करेंगे ही, उस सरकारी कर्मचारी की सोच में भी बदलाव लायेंगे जो आम जनता के साथ आदर और गरिमा पूर्ण व्यवहार नहीं करता।

अक्सर विचार मंच, सोशल मीडिया पोस्ट और बहसों में सुनाई देता है कि देश के कुछ ही लोग लोग टैक्स देते हैं, तो उनकी जानकारी के लिए ये बताना जरूरी है कि ऐसा नहीं है। भारत में शत प्रतिशत लोग टैक्स देते हैं। यहां तक कि दूधमुंहा बच्चा, भिखारी और मजदूर की तरफ से भी इन्कम टैक्स समेत सभी करों का भुगतान होता है।

आपको एक साधारण उदाहरण से समझाता हूं। एक मजदूर 10 रूपये में किसी कम्पनी का बिस्किट खरीदता है, वह कम्पनी ऐसे ही एक-एक पैकेट बिस्किट बेचते हुये 100 करोड़ का टर्नओवर करती है। अब इस 100 करोड़ का वितरण इस प्रकार है। इन सौ करोड़ में से लगभग 15 करोड़ जीएसटी के थे जो जमा करने पड़ेंगे। बचा 85 करोड़ उसमें से 50 करोड़ गेंहू और कच्चे माल का खर्च होगा। 3 करोड़ वेतन और स्टाफ के अन्य खर्च होंगे। 1 करोड़ वित्त के खर्च होंगे। 15 करोड़ के करीब प्रशासनिक एवं अन्य खर्च होंगे। कंपनी मालिक ने अपना वेतन लिया 1 करोड़। अब लाभ बचा 15 करोड़ का। उसमें से कम्पनी का आयकर चुकता हुआ 5 करोड़। कम्पनी मालिक का लाभ बचा 10 करोड़ जो उसकी पूंजी का हिस्सा हो गई।

अब समझिये यह 100 करोड़ एक एक बिस्किट की बिक्री से बना है। मतलब वह मजदूर जो 10 रूपये का बिस्किट खरीद रहा है वह अपने इसी 10 रूपये में से डेढ़ रूपये जीएसटी खाते के लिये देता है, 5 रूपये किसानों एवं व्यापारियों के खाते हेतु देता है, तीस पैसे स्टाफ की सैलरी का भी देता है ताकि वह भी अपना घर चलाए और अपना खुद का भी आयकर उसमें से भर ले।

बैंकों के भी हिस्से का 10 पैसा अपने पास से उस मूल्य के माध्यम से देता है, डेढ़ रूपये उस कम्पनी से जुड़े अन्य खर्चों एवं छोटे मोटे सरकारी शुल्कों को पोषित करता है, 10 पैसे उस कम्पनी के मालिक के वेतन को भी पोषित करता है जिसमें उस मालिक के निजी आयकर का भी हिस्सा होता है। उस कपंनी के आयकर के हिस्से को भी अपने उसी 10 रूपये में से 50 पैसे के रूप में पोषित करता है और अंत में उस कम्पनी का मालिक जो अपनी पूंजी या संपत्ति बनाता है उसके हिस्से का भी पैसा यह मजदूर के बचे हुये एक रूपये में से देता है, तब जाकर वह मजदूर सुकून से 1 पैकेट बिस्किट खा पाता है।

इसके अलावा एक विश्लेषण और है जो बताता है कि शत प्रतिशत लोग टैक्स देते हैं। अगर देश के 140 करोड़ लोग इनकम टैक्स ना देकर सिर्फ 4 करोड़ लोग देते हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं हुआ कि सब चोर हैं। इसके कई मायने हो सकते हैं। पहला ये कि इस आबादी में बच्चे और बूढ़े और गृहणियां हैं। आप अपनी गणना में उन्हें एक संभावित करदाता के रूप में क्यों शामिल करते हैं? परिवार का मुखिया ही कमाता है ना कि दुधमुंहे बच्चे से ले उसकी बूढ़ी मां भी कमाती है। तो इस प्रकार 5 पर 1 की औसत से 28 करोड़ लोगों को इन्कम टैक्स रिटर्न भरना चाहिये।

अब भारत तो कृषि प्रधान देश है जिसमें 60 % लोग मतलब 16.8 करोड़ लोग कृषि से जुड़े हैं। उन्हें तो आयकर विभाग ने ही बोला है कि टैक्स नहीं भरना है। अब बचे 11.2 करोड़ में से सरकारी या कॉरपोरेट कर्मचारी की संख्या बड़ी है। उनका तो टीडीएस ही कट जाता होगा यदि टैक्सेबल श्रेणी में आते होंगे क्योंकि टीडीएस लगभग सब लोग काटते हैं। फिर बचते हैं बड़े दुकानदार। जीएसटी के कारण ये टैक्स से बच के जा ही नहीं सकते। फिर बचते हैं छोटे दुकानदार, रेहड़ी, पटरी, वाले इनमें से लगभग सबकी आय तो 5 लाख सालाना से कम ही होती है जिसे आपने ही बोला है कि रिटर्न नहीं भरना है। फिर अंत में बचते हैं पानी पूरी, सब्जी, मोची मजदूर जो शहरों कस्बों या गाँवों में बसते हैं। इनकी आय तो 5 लाख की क्षमता भी नहीं रखती है।

इसीलिए टैक्स को लेकर पूरा विमर्श बदलना पड़ेगा। टैक्स को लेकर आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा। व्यवसाय और वेतन पर से आयकर को ख़त्म कर इसे व्यय आधारित बनाना पड़ेगा। आयकर को संपत्ति, पूंजीगत लाभ एवं अन्य आय तक ही रखना चाहिए। HSN कोड अपने आप में प्रगतिशील है उसे ही आयकर से लिंक करके उत्पाद के मूल्य में जोड़ने के साथ सेस लगा आयकर भी ले ही लिया जाना चाहिए। यह बात हर उस व्यक्ति तक पहुंचाइये यह जो यत्र तत्र सर्वत्र लिखते बोलते रहते हैं कि इतने लोग ही टैक्स देते हैं, बाकी टैक्स के पैसे पर पलते हैं।

यह भी पढ़ेंः राजपथ का नाम कर्तव्यपथ क्यों?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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