द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति होना राजनीतिक संकेतवाद नहीं, सामाजिक व सांस्कृतिक क्रांति का प्रतीक है
राजनीतिक और सामाजिक जीवन में संकेतों की अपनी जगह होती है। बड़े लक्ष्य के लिए यदि संकेत के तौर पर किसी को कोई पद दिया जाये तो इसमें कोई बुराई भी नहीं हैं। पंजाब में आतंकवाद की पृष्ठभूमि में जब ज्ञानी जैलसिंह 1982 में देश के सातवें राष्ट्रपति बने थे तो यह भी राजनीतिक संकेत ही था। उस समय ज्ञानी जी सर्वानुमति से राष्ट्रपति चुने गए थे। तब का विपक्ष इंदिरा जी का धुर विरोधी था। पक्ष और विपक्ष एक दूसरे को फूटी आँखों नहीं सुहाते थे लेकिन आज के विपक्ष की तरह एक "छद्म वैचारिक संघर्ष" के नाम पर ज्ञानी जी के नाम का विरोध तब के विपक्ष ने नहीं किया था।

अच्छा होता कि वनवासी समाज की पहली बेटी जब देश के प्रथम नागरिक के तौर पर देश के सर्वोच्च पद पर बैठी तो ये बिना चुनाव के होता। पर संभवतः विपक्ष के नेताओं का व्यर्थ का अहंकार और हर कीमत पर मोदी के विरोध ने उनकी आँखों पर एक पट्टी बांध दी है। अन्यथा वे एक बनावटी वैचारिक संघर्ष के आधार पर यशवंत सिन्हा को इस चुनाव में खड़ा नहीं करते।
श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के चुनाव को सिर्फ एक राजनीतिक संकेतवाद मानना उन भागीरथ प्रयासों की अनदेखी करना होगा जो पिछले कई दशकों से देश के अनुसूचित जनजातीय इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठन चला रहे हैं। ये देखना हो तो वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा सुदूर क्षेत्रों में बालकों और बालिकाओं के लिए चलाये जा रहे सैंकड़ों छात्रावासों में से किसी में जाइये। नहीं तो किसी एकल विद्यालय में होकर आइये।
मैं स्वयं मणिपुर में वनवासी कल्याण आश्रम के एक हॉस्टल में कुछ दिन सपरिवार रहा। भाषा की दिक्कत होने के बावजूद उन बच्चियों के साथ मेरी बेटी दीक्षा और पत्नी सीमा का अपनेपन का एक सहज और निर्मल नाता जुड़ गया। कुछ साल बाद उनमें से भी कोई बच्ची किसी जिम्मेदारी को संभालेगी तो वह राजनीतिक संकेत मात्र नहीं होगा।
इस परिवर्तन को एक तरह अपनों का लम्बे समय बाद मिलना या सम्मिलन कहा जा सकता है। हम ही अपने वनवासी भाई बहनों से अलग हो गए थे अथवा हमें दूर कर दिया गया था। परिवर्तन की एक व्यापक लेकिन निश्चित लहर ऊपर के अराजनीतिक उद्वेलन के प्रतिकूल समाज रुपी नदी के गंभीर आँचल में बह रही है। श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जमीनी स्तर पर चल रही इस व्यापक क्रांति की प्रतीक हैं।
वे भारत की उस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से निकली हैं जिसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक विरासत में हैं। दिखने में विविध होते हुए भी यह एकात्म धारा ही है। एक अध्यापिका से पार्षद, उड़ीसा में मंत्री, झारखण्ड में राज्यपाल और अब देश की राष्ट्रपति - परत दर परत और कदम दर कदम उन्होंने एक लम्बी और संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है। जो पद और सम्मान उन्हें मिला है वे उसकी बराबरी की हकदार हैं।
देश का वनवासी समाज इस राष्ट्र के बृहत् समाज का अभिन्न अंग है। वह भी देश की शताब्दियों से चली आ रही विरासत की अविरल धारा का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना कि मुंबई अथवा दिल्ली जैसे बड़े और आधुनिक शहरों में रहने वाला कोई नागरिक। समाज के इस एकात्म भाव में इन्हें आदिवासी नाम देकर इन्हें पिछड़ा अथवा असंस्कृत नहीं घोषित किया जाता। उन्हें कथित मुख्यधारा में जोड़ने के नाम पर अपनी जड़ों से अलग करने का गोरखधंधा नहीं चलता। इस सोच के अनुसार भारतीय समाज का एक हिस्सा वनों में रहता रहा है और एक हिस्सा शहरों और गांवों में। लेकिन व्यापक समाज मूल रूप से एक ही है।
अंग्रेज़ों के आने के बाद इन वनवासियों को असंस्कृत घोषित कर उनका धर्म और रहन सहन बदलने का सुनियोजित षड्यंत्र किया गया जो आज भी बदस्तूर जारी है। उनको भारत और अन्य भारतीयों से अलग दिखाने के लिए कभी उन्हें मूल निवासी और कभी आदिवासी कहा गया। इसी आधार पर बड़े पैमाने पर उनका धर्म परिवर्तन किया गया। सैमुअल पी हंटिंगटन "सभ्यताओं के संघर्ष" नाम की अपनी पुस्तक में पिछड़े समाजों को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि ऐसा समाज वो है - 1) जो पढ़ा लिखा नहीं है, 2) जिसका शहरीकरण नहीं हुआ है और जो, 3) एक जगह पर स्थापित नहीं है।
ऐसा हर समाज इस पाश्चात्य अवधारणा के अनुसार "आदिम" और "असभ्य" है। इस आदिम और असभ्य समाज को सभ्यता सिखाने के नाम पर उसका नरसंहार, उत्पीड़न और मतांतरण बड़े पैमाने पर दुनिया में किया गया। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में तो लाखों "इंडियन" और वहाँ रहने वाले "एबोरीजन्स", यानि मूलवासियों को मार ही डाला गया। वनवासियों को इस निगाह से देखने का ये नजरिया पाश्चात्य दर्शन की देन है। हैरत की बात है कि इस तरह की सोच रखने वाले आज हमें मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रताओं पर भाषण देते हैं।
अफ़सोस, अपने ही देश के बुद्धिजीवी वर्ग का एक हिस्सा ऐसे लोगों की इन भेदभावपूर्ण और सिरे से नस्लीय बातों पर तालियाँ पीटता है। भारत की सोच यह नहीं है। पौराणिक काल से लेकर गांधीजी तक और गुरु गोलवलकर से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक वनवासी समाज को अपना ही अभिन्न हिस्सा मानते हैं। रहने का स्थान जंगल में होने के कारण कोई भिन्न कैसे हो सकता है?
फिर भी यह बताने का अर्थ कदापि नहीं कि वनवासी समाज की अनदेखी नहीं हुई। इस समाज के साथ कतिपय कारणों से भेदभाव हुआ है। ये सही है कि दूरस्थ इलाकों में रहने के काऱण समाज का ये हिस्सा आज की शिक्षा और अन्य विकासमूलक गतिविधियों में पिछड़ता गया है। लेकिन इसके लिए संविधान में अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग प्रावधान किये गए। जो बिलकुल उचित ही हैं।
ये देखते हुए राष्ट्रपति मुर्मू का पहला भाषण बहुत ही प्रेरणादायक और उत्साहित करने वाला था। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायकों के साथ रानी चेन्नमा और रानी गाइडिल्यू तथा संथाल, भील और कोल क्रांति को भी स्मरण किया। वे लगातार राष्ट्रपति पद के दायित्व बोध की बात करती रहीं। वे संयम, शालीनता, स्वाभिमान और स्वचेष्टा से परिपूर्ण रहीं। लगातार उन्होंने भारत की अविछिन्न लोकतान्त्रिक परम्परा और अविरल बहती सांस्कृतिक धारा का उल्लेख अपने भाषण में किया।
उन्हें देखकर लगा कि वे राष्ट्रपति भवन का मान और मर्यादा दोनों ही बढ़ायेंगी। उनके राष्ट्रपति बनने पर समूचे भारत को बधाई! पुरातन काल से अविछिन्न उसकी लोकतान्त्रिक विरासत को बधाई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी भारत की प्राचीनतम समय से चली आ रही अविरल सांस्कृतिक धारा की प्रतीक हैं। हम सबको बधाई क्योंकि हम भी उसी महान विरासत की एक कड़ी हैं।
यह भी पढ़ेंः क्या विदाई बेला में सचमुच कोविंद व मोदी के संबंधों में खटास आ गयी?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
वर्ल्ड कप जीत के बाद ट्रेन से घर पहुंचा भारतीय क्रिकेटर, टिकट चेक में लगभग पकड़ा गया, बीवी ने झूठ बोल बचाया -
Weather Delhi NCR: दिल्ली में मौसम का डबल अटैक! अगले 72 घंटों में आने वाला है नया संकट, IMD का अलर्ट -
Rahul Gandhi Wedding Visit: कौन है दुल्हन तनु, जिसकी शादी में पहुंचे राहुल गांधी? तोहफे में क्या-क्या दिया? -
Gold Rate Today: जंग के बीच भारत में लगातार सस्ता हो रहा सोना, इतना गिरा भाव, अब क्या है 22k, 18K गोल्ड का रेट -
Balen Shah Caste: पिता मधेशी और मां पहाड़ी, आखिर किस जाति से हैं बालेन शाह, इंटरनेट पर क्यों हो रहा विवाद? -
धोनी ने उड़ाया मजाक, तो अब आया गौतम गंभीर का बेबाक जवाब, हेड कोच ने किया कभी नहीं हंसने का खुलासा -
Hansika Motwani Divorce: 4 साल में ही इन 4 गलतियों से टूटी हंसिका की शादी? कितनी Alimony मिली-कितने बच्चे? -
Love Story: IFS की ट्रेनिंग के दौरान हिंदू लड़की को दिल दे बैठे थे Hardeep Puri, शादी लिए मिली थी धमकी -
जीत के बाद भी टीम इंडिया से वापस ली जाएगी T20 World Cup की ट्रॉफी? सामने आई बड़ी वजह, फैंस हैरान -
Kim Yo Jong Profile: किम जोंग उन की ‘सबसे ताकतवर बहन’ कौन? ईरान जंग के बीच अमेरिका को खुली धमकी, दुनिया अलर्ट -
Essential Commodities Act: क्या है ECA? ईरान-इजराइल तनाव के बीच भारत में क्यों हुआ लागू -
LPG Gas Price Today: आज आपके शहर में कितने बढ़े एलपीजी गैस के दाम? सिलेंडर बुक करने से पहले चेक करें कीमत












Click it and Unblock the Notifications