क्या विदाई बेला में सचमुच कोविंद व मोदी के संबंधों में खटास आ गयी?
नई दिल्ली, 25 जुलाई: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बॉडी लैंग्वेज का बड़ा महत्व है। शब्दों से ज्यादा महत्व कई बार नेताओं के हाव-भाव और उनके उठने बैठने, हाथ मिलाने, एक दूसरे से मिलने को दिया जाता है। लेकिन भारतीय राजनीति में भी इसका महत्व कम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की ही तरह राजनीतिक पंडितों द्वारा भारतीय राजनीति में दो नेताओं के संबंध को उनके शारीरिक व्यवहार से समझने की कोशिश की जाती है।

ताजा मामला राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की विदाई से जुड़े दो वीडियो हैं जिनके जरिए सोशल मीडिया पर बॉडी लैंग्वेज के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके रिश्तों के बारे में चर्चा की जा रही है। पहला वीडियो है रविवार, 24 जुलाई का जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद में दोनों सदनों के सांसदों को संबोधित किया था। यह उनका विदाई भाषण था जिसके बाद उन्होंने मंच से नीचे उतरकर सांसदों का अभिवादन स्वीकार किया। इस मौके पर एक समय ऐसा भी आया जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हाथ जोड़े प्रधानमंत्री मोदी के सामने खड़े रहे लेकिन मोदी की निगाह कैमरों की ओर लगी थी। हालांकि इसके पहले दोनों में अभिवादन हो चुका था लेकिन संभवत उस समय रामनाथ कोविंद एक बार औपचारिक बात करना चाहते थे लेकिन पीएम मोदी का ध्यान उनकी ओर न जाकर कैमरों की ओर रहा। यह घटनाक्रम कैमरे में कैद हुआ तो यही क्लिप सोशल मीडिया पर दिनभर घूमती रही।

अगले दिन यानि आज 25 जुलाई को राष्ट्रपति भवन में एक बार फिर प्रधानमंत्री और निवर्तमान राष्ट्रपति का तब सामना हुआ जब रामनाथ कोविंद को गार्ड आफ ऑनर देकर औपचारिक रूप से राष्ट्रपति भवन से विदा किया जा रहा था। इस बार रामनाथ कोविंद नरेन्द्र मोदी से बहुत औपचारिक अभिवादन करते हैं। दूरदर्शन के वीडियो में स्पष्ट दिख रहा है कि मोदी हाथ जोड़े खड़े रहे लेकिन रामनाथ कोविंद उनके ठीक पहले खड़े उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू का हाथ अपने हाथों में लिए बात करते रहे। इसके बाद वो आगे बढते हैं। मोदी के अभिवादन का हाथ जोड़कर जवाब देते हैं और आगे निकल जाते हैं। वीडियो में स्पष्ट दिख रहा है कि इस बार रामनाथ कोविंद ने मोदी के पास खड़े होने की कोशिश नहीं की, न ही उनसे कोई बातचीत करने का प्रयास किया जैसा कि संसद भवन में उन्होंने किया था।
तो क्या 24 जुलाई को संसद भवन में जो हुआ, उसका असर 25 जुलाई को राष्ट्रपति भवन के अहाते में कोविंद के व्यवहार में दिख गया? अगर दोनों वीडियो को सामने रखकर देखेंगे तो कहेंगे कि हां, विदाई लेते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का बॉडी लैंग्वेज और हावभाव मोदी के प्रति उतना उत्सुकता भरा नहीं था, जैसा कि संसद भवन में दिखा था। यह एक तात्कालिक तल्खी भी हो सकती है या फिर सोशल मीडिया पर हुई बहस का परिणाम भी। लेकिन कोविंद के व्यवहार में दो दिनों के भीतर "जैसे को तैसा" वाला व्यवहार साफ तौर पर देखा जा सकता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेन्द्र मोदी मीडिया और सोशल मीडिया को लेकर बहुत जागरुक रहते हैं। वहां क्या चर्चा चलती है उसका असर उनके व्यवहार में दिखता है। याद करिए पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के उद्घाटन पर योगी आदित्यनाथ का मोदी की गाडी के पीछे पैदल चलनेवाला वह वीडियो जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। अगली बार मोदी लखनऊ गये तो योगी के साथ टहलते हुए उन्होंने दो फोटो जारी करवाए। इसमें एक फोटो में उन्होंने योगी के कंधे पर हाथ रखा हुआ था। यानी अगर किसी एक फोटो से गलत संदेश गया था तो अगली फोटो से उस संदेश को ठीक कर लिया गया। संसद भवन में राष्ट्रपति कोविंद के अभिवादन का वह वीडियो वायरल हुआ जिसमें कोविन्द मोदी के सामने हाथ जोड़े खड़े हैं और मोदी कैमरे के सामने देख रहे हैं तो मोदी ने अगले दिन यानी 25 जुलाई को अपनी इस "गलती" को ठीक करने के लिए "अतिरिक्त समय" तक कोविन्द के सामने अभिवादन में हाथ जोड़े रखा। हालांकि यहां कोविंद ने मोदी के अभिवादन के प्रति बहुत उत्सुकता नहीं दिखाई।
नरेन्द्र मोदी एक ऐसे राजनेता हैं जो प्रतीकों की राजनीति करते हैं। कैमरे के सामने उनका हाथ भाव और बॉडी लैंग्वेज बहुत संतुलित और सधा हुआ होता है। फिर भी कैमरामैन कुछ न कुछ ऐसा निकाल ही लेते हैं जो चर्चा का विषय बन जाता है। जैसे, 2014 के दशहरे में रामलीला के मंच पर सोनिया गांधी के सामने दोनों हाथ बांधकर किसी और तरफ देखनेवाला फोटो एक समय में खूब वॉयरल हुआ था। उस समय कहा गया कि मोदी ने सोनिया गांधी को भाव नहीं दिया। इसी तरह आडवाणी का मोदी के सामने हाथ जोड़कर खड़े रहनेवाला फोटो भी खूब शेयर होता है। वह तो सोशल मीडिया पर मीम बनाने का सबसे बड़ा साधन बन गया है। इसलिए इन दो अभिवादनों के बीच संबंधों की तलाश करते लोग इतनी भी बेबुनियाद बात नहीं कर रहे हैं जैसा कि मोदी के समर्थक बताने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन यहां एक बात समझने वाली है कि रामनाथ कोविन्द और नरेन्द्र मोदी एक दूसरे के पुराने परिचित हैं। इमरजंसी के दिनों में दोनों ने साथ काम किया है। मोदी उन्हें राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं इसकी तैयारी उन्होंने बहुत पहले से कर दी थी। उन्हें पहले बिहार का राज्यपाल बनाया ताकि भविष्य में राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया जा सके। इसलिए सिर्फ एक अभिवादन वाले वीडियो से दोनों के संबंधों की तल्खी या खटास नहीं ठहराया जा सकता लेकिन इतना तो तय है कि 24 जुलाई को अपनी उपेक्षा से कोविंद जरूर थोड़े आहत हुए होंगे जिसके लक्षण 25 जुलाई को राष्ट्रपति भवन वाले वीडियो में साफ दिखाई देता है। बहरहाल, ये खटास दिखती भी है तो अब इसका कोई राजनीतिक महत्व नहीं है।
राष्ट्रपति की कुर्सी पर रहते अगर दोनों के संबंधों में कभी कुछ ऐसा दिखता तो जरूर इसकी चर्चा का महत्व होता। रामनाथ कोविन्द राष्ट्रपति भवन छोड़कर भूतपूर्व हो चुके हैं। वो भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर थे इसलिए भविष्य में उन्हें किसी प्रकार के राजनीतिक हानि लाभ की चिंता करनी नहीं है। जहां तक मोदी की बात है तो पहले भी रामनाथ कोविंद से उनका "मित्रवत परिचय" था, आगे भी शायद ये बना ही रहेगा। हां, वो जो इसमें राजनीतिक निहितार्थ खोज रहे हैं उनके लिए कुछ घण्टों की राजनीतिक गपशप वाली बातें जरुर निकल आयेंगी जो कि राजनीतिक गलियारों में होती ही रहती हैं। कुल मिलाकर यह एक ऐसा प्रकरण है जिसकी सोशल मीडिया पर चर्चा करने से अधिक कोई राजनीतिक महत्व नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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